मैंने कब और क्या गलती की? मैं अपने बच्चों को कैसे समझाऊँ कि मैंने बहुत प्रयत्न किया? कैसे मनाऊँ कि मैं एक बुरा अभिभावक बनना नहीं चाहता था? कैसे समझाऊँ कि मैंने उन्हीं को प्राथमिकता दी और उन्हीं का हित चाहा? प्राय: मैं ऐसे माता-पिता से मिलता हूँ जिन को ऐसा प्रतीत होते है कि सालों साल उनकी इच्छाओं का बलिदान देकर भी उन्होंने अपनी संतान की उत्तम परवरिश नहीं की है। उन्हें लगता है कि उन का कोई तो दोष है। उन को ऐसा प्रतीत होता है कि वे बुरे माता-पिता रहे हैं (प्राय: उनकी संतान ने उन्हें यह विचार दिया है)। मैं देखता हूँ कि वे अत्यन्त व्याकुल हैं क्योंकि उनके बच्चों ने इशारों एवं शब्दों के माध्यम से उन्हें समझाया है कि वे अच्छे माता या पिता नहीं हैं।

मैं इस बात से सहमत हूँ कि कई परिवार तनाव के कारण खंडित होते हैं। निस्संदेह कभी कभी माता-पिता लापरवाह होते हैं विशेष रूप से वे जो अपनी संतान के साथ भावनात्मक या शारीरिक रूप से दुर्व्यवहार करते हैं। भावनात्मक दुर्व्यवहार कई प्रकार के हो सकते हैं, उदाहरणार्थ संतान के माध्यम से स्वयं की आकांक्षाओं को जीने का प्रयास करना अथवा बच्चों का तिरस्कार करना तथा उन्हें नीचा दिखाना। परंतु मैंने जहाँ तक देखा है अधिकतर परिवारों मैं ऐसा नहीं है। ये सब भले परिवार हैं जहाँ माता-पिता बच्चों तथा एक दूसरों की देखभाल करते हैं तथा अक्सर आवश्यकता से अधिक संतान की देखभाल कर उत्तम माता-पिता बनने का भी प्रयास करते हैं। फिर भी उनके बच्चे प्रसन्न नहीं हैं। उनके अनुसार उनके माता-पिता उनकी अच्छी परवरिश नहीं कर रहे हैं। वे बार-बार दूसरों के माता-पिता का उदाहरण देते हैं यह कहते हुए कि वास्तव में दूसरों के माता-पिता ही उत्तम हैं। माता-पिता भी अपनी संतान की बातों का विश्वास करने लगते हैं।

मैं आप को एक दिलचस्प तथ्य बताता हूँ। वे युवा जो आलसी होते हैं तथा लापरवाही से जीवन व्यतीत करते हैं वे ही सर्वप्रथम अपने माता-पिता को अथवा अपनी परवरिश को दोष देते हैं। उदाहरणार्थ यदि एक भले परिवार में चार बच्चे हैं जिसमें से दो जीवन में सफल अथवा सकारात्मक रहते हैं, वे कभी ऐसा नहीं कहते कि उनके माता-पिता ने उनका जीवन नष्ट कर दिया है। उस परिवार के अन्य दो बच्चे जो व्यावसायिक या व्यक्तिगत जीवन में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं वे यह सोचते हैं कि उनके माता-पिता के कारण वे असफल रहे हैं।

एकल माता या पिता द्वारा परवरिश किये गये कई बच्चे कहते हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें हताश किया क्योंकि वे साथ नहीं रह सके। जो साथ में रहते हैं उन की संतान शिकायत करती है कि उनके माता-पिता लड़ते रहते हैं और वे अलग रहते तो बेहतर होता। विनम्र एवं कोमल माता-पिता को संतान कहती है कि वे दृढ़ या महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले पाते थे। जो माता-पिता अपने बच्चों के लिए सदा उपस्थित रहे वे बच्चे मुझसे कहते हैं कि उनके माता-पिता सदैव उनकी निरीक्षण करते रहते हैं। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को स्वतंत्रता एवं छूट दी उनकी संतान यह कहती है कि उनके माता-पिता ने उनकी निरीक्षण नहीं की और उन्हें सुरक्षित नहीं रखा।

हर माता या पिता इस कभी न जीतने वाले प्रतियोगिता के अनिच्छुक प्रतियोगी हैं। यदि अपनी बेटी को पियानो के पाठ अवश्य लेने की मांग करो तो बाद में वह शिकायत करेगी कि आप ही के कारण पियानो के प्रति उस का प्रेम नष्ट हो गया। उसके पियानो की शिक्षा को बंद करने की अनुमति दो क्योंकि वह अभ्यास नहीं करना चाहती तो बाद में वह शिकायत करेगी कि आप को उस पर दबाव डालना चाहिए था कि वह पियानो अवश्य सीखे – क्योंकि अब वह बिल्कुल पियानो नहीं बजा सकती। अपने पुत्र का दोपहर के हीब्रू स्कूल अवश्य जाने की मांग करो और वह आप को दोष देगा कि आप ने उसे एक सफल खिलाड़ी बनने से रोक दिया। अपने पुत्र को हीब्रू स्कूल को छोड़ने की अनुमति दो और वह बाद में अपनी संस्कृति के विषय में न जानने के लिए आप को दोष देगा। बेट्सी पीटरसन ने “डेनसिंग वित डेडी” नामक अपनी जीवनी में उसके माता पिता को केवल तैराने, ट्रेमपोलिन, घुड़सवारी तथा टेनिस की शिक्षा देने के लिए किन्तु बेले नृत्य की शिक्षा ना देने के लिए दोष दिया है। उसने लिखा कि “वे मुझे वह एक ही वस्तु नहीं देते जो मैं चाहती थी”। अपने माता पिता को दोष देना एक लोकप्रिय एवं सुविधा जनक कार्य है क्योंकि वह लोगों को उनकी कमियों से जूझने में मदद करता है।
(कैरल टेवरिस और इलियट आरन्सन। मिस्टेक्स वेर मेड (बट नाट बय मी)।)

यदि आप ऐसी संतान हैं जो अपनी जीवन शैली एवं स्थिति के लिए अपने माता या पिता को उत्तरदायी मानते हैं तो आप को संभवतः अपने बचपन में किए गए चुनावों पर विचार करना चाहिए। अपने अतीत पर पुनर्विचार करना चाहिए तथा आप किस प्रकार के मित्रों के साथ समय बिताते थे उस के विषय में सोचना चाहिए। यदि आपने कोई गलती की है तो उसे स्वीकार करें तथा अपने माता या पिता को सब कुछ के लिए दोष ना दें। आत्म स्वीकृति स्वयं के जीवन के अभाव के उपर उठने में आप की सहायता करेगी। अपनी कमियों की घोषणा करने की आवश्यकता नहीं है। आप को केवल उन्हें स्वीकार करना है ताकि आप को मानसिक शक्ति मिले और जीवन में अागे बढ सकें।

यदि आप एक माता या पिता हैं और आप की संतान उनके जीवन में आने वाली हर समस्या के लिए आप को उत्तरदायी मानती है तो इस का अर्थ यह नहीं कि आप वास्तव में एक बुरे माता या पिता हैं। इस का अर्थ यह है कि वे अपने जीवन को समझने एवं सुधारने के बजाय स्वयं के लिए गए निर्णय और विकल्पों का दोष दूसरों को दे रहे हैं। स्वयं को विद्वेष, पछतावा अथवा अपराध बोध की भावना से मुक्त करें। और यदि आप को यह प्रतीत होता है कि वास्तव में आप ने कोई भयानक पाप किया है (आप की संतान के कहने के आधार पर नहीं परंतु आप के स्वयं की जानकारी के आधार पर) तो क्षमा माँग कर आगे बढ़ें क्योंकि हम अतीत को बदल नहीं सकते। यदि आप ने एक भूल की है तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप की संतान के जीवन की हर अवांछनीय समस्या उस भूल का ही परिणाम है।

एक समय की बात है कुछ अतिथि भोजन के लिए घर आये। मेज पर जब सब खाने के लिए बैठे एक छ: वर्ष की बच्ची की माँ ने उस से कहा, “तुम भोजन के पहले प्रार्थना करना चाहती हो?”
“परंतु, मुझे क्या कहना है यह पता नहीं!”
“मैं जो कहती हूँ केवल वही कहो,” माँ ने कहा।
“हे भगवान! मैंने इन लोगों को खाने पर क्यों बुलाया!” भोलेपन में लड़की ने कहा।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है – यदि आप चाहते हैं कि आप की संतान किसी विशिष्ट विधि से अपना जीवन जिए तो यह आवश्यक है कि आप पूरे दिल से उसी प्रकार का जीवन जिएं। यदि वे यह देखें कि आप उस प्रकार का जीवन जीते हुए बहुत प्रसन्न रहते हैं तो स्वत: ही वे भी आप के जीवन की विधि से आकर्षित हो जाएंगे। आप को जिस कार्य करने में आनंद आता है वे भी उसी कार्य को करने लगेंगे। कभी कभी यह विधि भी सफल नहीं होती है क्योंकि हर व्यक्ति अलग होता है। परंतु चिंता ना करें, यह सामान्य बात है।

संतान की परवरिश में निश्चित रूप से कोई उचित अथवा अनुचित मार्ग नहीं होता है। प्रकृति हमें कुछ छूट देती हैं। कुछ भूल करने की या गलत विकल्प या बुरे निर्णय लेने की अनुमति देती है। यह तो मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। हमारे जीवन की सुन्दरता हमारी कमियों, हमारी विशिष्टता, हमारी गलतियों तथा हम जो समझ नहीं पाते उस में है। यदि उस समय आप को लगा कि आप ने जो किया वह उचित था परंतु तत्पश्चात उसका परिणाम प्रतिकूल निकला तो परेशान ना हों क्योंकि वह केवल एक भूल थी। अपने आप को क्षमा करें।.

आप केवल अपनी संतान का मार्गदर्शन कर सकते हैं। आप केवल पालन-पोषण कर सकते हैं। अंत में बच्चों को ही श्रम करना होगा। उन्हीं को सही मार्ग पर चल कर अपने जीवन को सही ढंग से जीना होगा। यदि आपने पूरे दिल से उन्हें प्रेम किया और पूरी क्षमता अनुसार उनका पालन-पोषण किया तो मेरा विश्वास कीजिए आपने सब सही किया।

शांति।
स्वामी