आस्था की ही भाँति प्रेम भी तर्क या बुद्धि से परे है। यह वह चीज़ है जो हमें विकसित होने, रूपांतरित होने और असम्भव को सम्भव बनाने हेतु प्रेरित करती है। मुझे इस बात का  तो निश्चय नहीं है कि प्रेम  पर्वतों को चलायमान कर सकता है, लेकिन यह विश्वास अवश्य है कि यदि प्रेम की धारा आपके हृदय से निकल रही है तो आप सारे ब्रह्मांड को हिला सकते हैं। कठोपनिषद में नचिकेता और महाभारत में सावित्री की कहानी मनुष्य की इस क्षमता की  यदि साक्षी नहीं है तो इसे इंगित अवश्य  करती है । वैसे  प्रेम क्या है? क्या इसका  आरम्भ और समापन जिस व्यक्ति का आप ध्यान रखते हैं  उसके प्रति तीव्र भावना के साथ होता है। अभी कुछ दिनों पूर्व मैंने  ग़ौर गोपाल दास की  हृदय स्पर्शी  कहानी “ ए वुमन इन लाइफ़स अमेजिंग सीक्रेट्स” पढ़ी थी।  यह मुझे यह बहुत ही सुंदर लगी है  इस कारण इसे मैं यहाँ अक्षरशः उद्धृत कर रहा हूँ ।

एक ६५ वर्षीया महिला    लता खरे और उनके पति महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में रहा करते थे। वे अत्यंत निर्धन थे, उनकी  तीनों बेटियों का विवाह उन्होंने कर दिया था और अपनी आजीविका कमाने के लिए वे खेतों में काम किया करते थे। एक दिन सुबह लता के पति को कुछ असहज अनुभव हुआ क्योंकि उनको कुछ संक्रमण हो गया था। गाँव के डाक्टर के पास जाने पर उन्होंने ने उनको बारामती शहर के अस्पताल ले जाने के लिए कहा क्योंकि उनके उपचार  हेतु एकमात्र यही रास्ता था। लेकिन उनके पास वहाँ तक जाने और डाक्टर को देने के लिए पैसा नहीं था। फिर भी किसी प्रकार उन्होंने आवश्यकता अनुसार थोड़ा पैसा उधार लिया  और दोनों पति पत्नी चेक अप के लिए बारामती गए।

वहाँ जाकर उनको  कुछ आरंभिक टेस्ट कराने के लिए कहा गया जिसमें उनके  कुछ सौ रुपए ख़र्च हो गए, और कुछ घंटों प्रतीक्षा करने के बाद आख़िरकार उनका नम्बर आया तो डाक्टर ने वृद्ध पति का चेक अप  किया और लता बाहर साँस रोके किसी अच्छी ख़बर मिलने का इंतज़ार करती रही। लेकिन   जब डाक्टर ने और नए टेस्ट करवाने की माँग की जिनका ख़र्च कुछ हज़ार रुपए था, तो उनकी  बेचैनी  की सीमा नहीं रही। अब वे इन रुपयों की कहाँ से व्यवस्था करते?  आँखों में आँसू लिए उन्होंने डाक्टर से प्रार्थना की ताकि कोई रास्ता निकल सके, किंतु न अस्पताल और न डाक्टर ने ही उनकी कोई सहायता की। अब दोपहर  बीत चुकी थी और उनको अपने गाँव वापस भी जाना था। हताश और निराश उन दोनों ने  डरते हुए एक दूसरे की ओर इस भाव से  देखा कि अब वे अधिक समय के साथी नहीं है। अस्वीकार और अविश्वास के क्षणों में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने सुबह से कुछ भी नहीं खाया  था , यहाँ तक कि एक गिलास  पानी भी नहीं  पिया था।

गाँव जाने के लिए बस स्टॉप को  वापस आते समय वे एक ठेलेवाले के के पास रुके जो समोसे बेच रहा था। लता ने  एक रूमाल निकाला जिसमें उसमें कुछ दस रुपए के सिक्के बाँध रखे थे और ठेले वाले से दो समोसे देने को कहा । ठेलेवाले ने एक समाचार पत्र में लपेट कर उसे समोसे दे दिए। तेल और सॉस में लिपटे समाचार पत्र के टुकड़े में लता ने उसमें पढ़ा “ “ बारामती मैराथन रेस कल”

संयोगवश यह मैराथन दौड़ अगले  दिन होने वाली थी और इसका ईनाम था ५००० रुपए।

उसने अपने पति से कहा मैं मैराथन  में दौड़ने जाऊँगी।

तुम पागल हो गयी हो। तुम भी मरना चाहती हो।

मैं इसमें भाग लूँगी। लता ने कहा।

लता ने गाँव के किसी भी व्यक्ति की बात नहीं मानी। उसके पति और बेटियों की भी नहीं। वह अगले दिन मैराथन में भाग लेने के लिए गयी। उसने प्रतियोगिता में भाग लेने के कपड़े जैसे कि टी शर्ट  पैंट आदि नहीं पहने थे उसने  मात्र वही साड़ी पहनी थी जो वह ज़िंदगी भर पहनती रही थी। उसने जूते  भी नहीं पहने थे। वह नंगे पाँव थी। कहीं उसे चोट न लग जाए इसलिए उसे प्रवेश देने से मनाही कर  दी गयी।

प्राचीन ग्रंथों में एक स्त्री की संकल्प शक्ति को राजाओं के समान कहा गया है, जिसे स्त्री हठ  या राज हठ  भी कहा जाता है , इसका अर्थ यह हैं कि  जब एक स्त्री कुछ करने का संकल्प ले लेती है तो उसे कोई भी रोक नहीं सकता। लता खरे ने इस बात को उस दिन सिद्ध कर दिया। आयोजकों ने उसकी कहानी और निवेदन को सुना और उसे शांत करने के लिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने दिया।

अनेक देखने वालों ने उसे प्रोत्साहित किया, कुछ सच में और कुछ व्यंग्य करते हुए चिल्लाये  ‘आगे बढ़ो आंटी।’

लता खरे ने घुटनों से ऊपर अपनी साड़ी खोंसी  और सभी बाधाओं  के विरुद्ध ऐसे दौड़ी जैसे कि कोई कल नहीं। उसने पूरी ४२ किलो मीटर ( २६ मील)  की मेराथान पूरी करी। ऐसा करना कोई  ऐसी  चीज़ नहीं है , जिसकी तैयारी एक रात में की  जा सके । जीतना तो भूल ही जाइए, बिना किसी पूर्व तैयारी के और पर्याप्त पोषण के बिना, अधिकांश लोग तो इसे पूरी भी नहीं कर पाते। साथ ही साथ इसे पूरी करना मात्र पर्याप्त न था, उसे इसे  जीतना था जिससे कि वह पुरस्कार का रुपया प्राप्त कर सके ,क्योंकि  उसके पति को जीवित रखने के लिए  उसके लिए यह  एकमात्र रास्ता था। वह किसी प्रसिद्धि या ट्रोफ़ी के लिए नहीं दौड़ रही थी, वस्तुतः  वह जीवन के लिए दौड़ रही थी। यह वह नहीं थी बल्कि उसका अपने पति के लिए प्रेम था , जो उस पथरीली सड़क पर  दौड़ा, जहाँ जूते का  न होना और साड़ी  क़दम क़दम पर  बाधक थे। दर्शकों ने कहा वह रास्ते कंकड़, पत्थर, गड्ढे आदि की परवाह न करते हुए , यथा सम्भव पूरा दम लगाकर दौड़ी ।

पुनः  प्रेम क्या कर सकता है, यही वह है । इसने वही किया जो मात्र प्रेम कर सकता है- यह आपको अपनी सीमाएँ पार  कर देने योग्य बनाता है।

अब प्रश्न  यह है कि : क्या लता जीती? महत्वपूर्ण यह नहीं है कि वह जीती या नहीं , या यदि वह न जीतती तो  इस कहानी का अर्थ न रहता । महत्वपूर्ण यह है कि  एक वृद्ध महिला नंगे पाँव दौड़ रही थी, वह उनके साथ प्रतियोगिता कर रही थी जो उससे शारीरिक रूप से अधिक स्वस्थ थे जिनको अच्छा पोषण मिला था और उत्तम संसाधनों से लैस थे। मुझे संदेह है कि एक ट्रोफ़ी की अनुपस्थिति में  उसके प्रेम को कम आँका जा सकता है। वह गहरा प्रेम जो  निरंतर आपकी नसों में अत्यंत तीव्र गति से दौड़ता रहता है उसके बिना  जो लता ने अपने पति के लिए किया उसे करने की आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

प्रेम एक अवस्था है जहाँ आप अपने हित को अन्य व्यक्ति के लिए  परे रख देते हैं और  देखभाल किसी के प्रेम का एकमात्र सच्चा पैमाना है । अंततः, यदि मात्र  बोलने के द्वारा अभिव्यक्त प्रेम पर्याप्त होता तो शायद सारे सम्बंध प्रेम से पूर्ण होते। यदि  आपके कार्य यह दर्शाते हैं कि आप अन्य व्यक्ति की  प्राथमिकताओं, आदर और  कल्याण की ( और अन्य व्यक्ति  आपके प्रति  इन सबकी ) चिंता करते हैं , तो ये मात्र प्रेम को संकेत करते  हैं।

हाँ लता खरे जीती, उसे जीतना था और उसने यह कर दिखाया। नीचे देखिए

Image source: steemitimages

मैं इस लेख  को यहीं समाप्त करना  चाहता था, लेकिन लता की कहानी पूरे चित्र को नहीं दिखाती। इसका एक अन्य पहलू  है, जिस पर थोड़ा ध्यान देने की आवश्यकता है। क्या यह नहीं अच्छा होता या यह प्रेम नहीं होता  कि अनेक दर्शक आगे बढ़ते और आपस में मिल जुल कर उस स्त्री को  ५००० रुपए भेंट कर देते। क्या एक वृद्ध स्त्री को अपने पति को बचाने के लिए दौड़ना चाहिए? क्या यदि मेरी माँ इस तरह दौड़ेगी तो मैं यही करूँगा? आयोजकों ने या किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसा उस वृद्ध स्त्री से क्यों नहीं कहा, कि “आप जो कर रही हैं माँ, हमें उसके लिए बहुत दुःख है । हम आपके लिए ५ हज़ार रुपए  इकट्ठा कर देंगे।”

यह संसार दानी लोगों से भरा है। मुझे इसमें संदेह नहीं है कि आयोजक यदि वहाँ घोषणा करते तो अनेक लोग आगे आते और इससे भी अधिक धन दान में दे देते। यहाँ तक कि सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों में भारत में लाखों लोगों द्वारा अरबों रुपए  दान किए जाते हैं। इसलिए जब प्रेम की बात आती है तो प्रश्न यह नहीं है कि क्या  आप देखभाल कर सकते हैं, वरन यह है कि क्या आप देखभाल का आरम्भ कर सकते हैं? क्योंकि यदि आप ऐसा करेंगे तो संसाधनों की कमी नहीं होगी। और यदि आप ऐसा करेंगे तो यह प्रेम होगा।

अगली बार जब आप किसी लता खरे को देखें तो  दर्शकों की भाँति तालियाँ न बजायें ,बल्कि उसकी समस्या के भीतर जाएँ और उसे अपनायें । अपने हृदय और हाथ खोल दें। जो अपने हाथ दूसरों की सहायता के लिए फैलाता है वह ब्रह्मांड के आशीर्वादों को ग्रहण करने के लिए अधिक अच्छी तरह तैयार है,  क्योंकि उसके हाथ तो पहले से ही फैले हुए हैं। एक क्षण  भी व्यर्थ न गवाएँ  । जिस प्रकार आप अपनी पेंशन या सेवा निवृत्ति के लिए नियमित रूप से पैसा इकट्ठा करते हैं, उसी प्रकार थोड़ा सा चाहे यह अत्यंत थोड़ा ही क्यों न हो दूसरों की सहायता के लिए नियमित रूप से निकालें। आपको  कभी भी पश्चाताप नहीं होगा।

जियें, प्रेम करें, हंसें, दें।

शान्ति,

स्वामी