क्या क्रोध प्रेम का दूसरा पक्ष है? सच में नहीं। यह तो स्वीकृति के विपरीत और शांति का दूसरा पक्ष है। आप तभी क्रोधित हैं जब अपने अंतर्मन में शांत नहीं हैं। मसीह ने क्रोध नहीं किया जब उन्हें सूली पर लटकाया गया, बुद्ध ने क्रोध नहीं किया जबकी उनके ऊपर थूका गया, सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेगबहादुर, को गर्म तवे पर बैठाया गया और उनके शरीर पर दहकता हुआ रेत डाला गया। उन्होंने क्रोध नहीं किया। क्या इसका ये अर्थ है की इनलोगों को जो प्रताड़ना सहनी पडी वो ठीक था? बिलकुल नहीं। कोई तो अवश्य कारण होगा कि इन महान संतों ने क्रोध त्याग दिया और सब कुछ के ऊपर शांति को चुना।

आप किसी व्यक्ति या उसके कार्यों को स्वीकार करते हैं इसका ये अर्थ नहीं कि आप उनसे सहमत हैं, बल्कि आप कोई धारणा नहीं बना रहे। अपने स्वयं के शांति के लिए, अपने अन्तःमन को शांत और मौन रखने के लिए, जब आपको लगता है कि आपके साथ गलत हुआ है, तब आपके पास दो विकल्प है अपने आप को क्रोध के वश में आने से रोकने के लिए, स्वीकार या उपेक्षा। उपेक्षा करना व्यवहारिक हो सकता है पर स्वीकृति दिव्य। जबकि स्वीकृति को झुठलाया नहीं जा सकता, ये केवल स्वीकार करने की बात नहीं है, आप अपने आप को शांत नहीं रख सकते यह कहकर कि आप दूसरे के कर्म को स्वीकार कर रहे हैं विशेषकर जब आप आश्वस्त हैं कि दूसरे की गलती है।

इससे पहले कि मैं अपना सन्देश आपको दूं, मैं आपको एक बहुत ही सुन्दर कहानी बताता हूँ जिसे मैंने पढ़ा था …..

एक ऋषि, अपने शिष्यों के साथ, गंगाजी के किनारे प्रातःकाल की सैर कर रहे थे इश्वर के नाम का जप करते हुए। थोड़ी दूर पर एक दम्पति था, वे व्यथित थे और एक दूसरे के ऊपर चिल्ला रहे थे। पता चला कि पत्नी ने अपना सोने का हार खो दिया गंगाजी में दुबकी लगाते समय। उसके पति ने बहुत सी गालियाँ निकालीं और पत्नी भी समान रूप से चिल्ला रही थी।

ऋषि रूक गए, अपने शिष्यों की तरफ मुड़े और पूछे – जब लोग क्रोधित होते हैं तो एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं? एक शिष्य ने कहा – जब हम अपने मन की शान्ति खो देते हैं तभी चिल्लाते हैं।

“बिलकुल ठीक” ऋषि ने कहा, “लेकिन किसी को चिल्लाने की आवश्यकता क्या है जब दूसरा आपके पास में है? ऐसा नहीं कि वो सुन नहीं रहा। आप अपनी बात बिना स्वर के उंचा किये भी कह सकते हैं।”

शिष्यों ने ढेरों उत्तर दिए पर कोइ भी रहस्योद्घाटन के जैसा नहीं।

अंत में ऋषि बोले, “क्रोध तत्क्षण ही दूरी बना देता है। जब दो व्यक्ति एक-दूसरे पर क्रोधित होते हैं तब उनके ह्रदय पास नहीं होते, उनकी भावनाएं विभाजित होती हैं और वो मीलों दूर हो जाते हैं। उस दूरी को तय करने के लिए वो चिल्लाते हैं। जितने वो क्रोधित होंगे उतने ही ऊँचे स्वर से वो चिल्लाते हैं। वो अब प्रेम, स्वीकृति, निकटता की स्थिति में नहीं हैं। वो एक दूसरे को सुन नहीं पा रहे, चिल्लाकर ही उन्हें लगता है वो एक-दूसरे को सुन सकते हैं।

और क्या होता है जब दो व्यक्ति प्रेम में बंधे होते हैं? वो एक दूसरे पर चिल्लाते नहीं हैं बल्कि मंद स्वर में बोलते हैं, वो लगभग फुसफुसाकर बात करते हैं क्योंकि उनके ह्रदय बिलकुल निकट हैं। उनके बीच में नहीं के बराबर की दूरी होती है।

“जब उन दोनों में और भी अधिक प्रेम होता है, वो और भी कम शब्दों का आदान-प्रदान करते हैं, अधिक कोमल, फुसफुसाकर, परन्तु एक दूसरे को और अच्छी तरह से सुनते हैं, उनके बंधन और सशक्त होते हैं, उनका प्रेम और भी बढ़ता है। अंत में, वो फुसफुसाकर भी बात नहीं करते, केवल एक दूसरे को देखते हैं, मौन शब्दों से अधिक सशक्त हो जाता है, इस तरह एक दूसरे के निकट दो व्यक्ति हो जाते हैं जब उनमें प्रेम होता है।
“इस तरह जब आप विवाद करें तो ऐसे शब्द न कहें जो आपके प्रेम के बंधन को तोड़ दे और एक दूसरे के बीच में दूरी बना दे।”

क्रोध अक्सर निराशा या कुंठा से उपजता है, और कुंठा आशा या अपेक्षा के नहीं पूरा होने से। मैं ये नहीं कह रहा कि आपकी कुंठा सही है या गलत, आप स्वयं ही निर्णय कीजिये। जब आपको दूसरे व्यक्ति से आशाएं हैं और वो पूरी नहीं होतीं तो आपको दुख या संताप होता है। पर कारण कोई भी हो, यदि आप क्रोधित होते हैं, उसी क्षण आप निर्णय की क्षमता खो देते हैं, आप स्वयं के वश में नहीं होते। शब्दों के द्वारा की हुयी क्षति समय के साथ भर सकती है परन्तु वह अपूरणीय एवं अटल होती है।

जब दो व्यक्ति एक दूसरे के समीप आने का प्रयास करते हैं, एक दूसरे पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जब वो समान सतह पर होते हैं, दूरी अपने आप घट जाती है। जब वो दूर ही नहीं हैं, चिल्लाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। फिर भी कोई विवाद हो सकता है, असहमति हो सकती है, पर उसका प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

क्रोध वास्तव में आपका क्वथनांक यानी उबलने का तापमान है। यदि जल चूल्हे पर हो तो उबलना स्वाभाविक प्रतिफल है, उसे सामान्य अवस्था में रखने के लिए चूल्हे को बुझाना होगा। जब आप उबल लगें तो नियंत्रक को अपने हाथ में रखें। हो सकता है दूसरा व्यक्ति इंधन डाल रहा है, पर ये वो आप हैं जिनके हाथ में नियंत्रक है तापमान को नियंत्रित करने का। आप चुन सकते हैं कि कितना तापमान रखना है – गुनगुना, उष्ण या उबलता हुआ।

अंत में गर्मी आपको वाष्पित कर देगी, पदार्थ ही नहीं रहेगा। यह पसंद की बात है। स्वीकार करना कठिन है और कभे तो अव्यवहारिक भी। फिर अपने आप को प्रकृतिस्थ रखने के लिए आप क्या कर सकते हैं? क्या कुछ ऐसा है जिसे आप अपना सकते हैं जब तक आप उस उत्कृष्ट स्थिति तक न पहुँच जाएँ जहां पर अपने को अडिग रख पायें बजाये आपके ऊपर क्या फेंका जा रहा है? उत्तर है – हाँ।

लेकिन इससे पहले कि हम वहाँ पहुंचें, शायद यह उचित होगा दो प्रकार के क्रोध का वर्णन करना। इसे काबू में करना आसान होगा यदि समझ लें। मैं इसे अगले पोस्ट में लिखूंगा।

शांति।
स्वामी