एक पाठक ने निम्न प्रश्न भेजा –

हम कैसे व कब अपने अंतर्मन के आह्वान को लेकर भ्रमित हो जाते हैं? हम एक वास्तविक आह्वान एवं एक इच्छित जीवनशैली में अंतर कैसे करें? क्या हो यदि वह इच्छित मार्ग अथवा जीवनशैली आपके लिए उपयुक्त न हों? फिर क्यों हमें ऐसी शक्तिशाली अनुभूति होती है कि हमें पग आगे बढ़ाना चाहिए? जब आप यह कहते हैं कि आपका वर्तमान में लिया गया निर्णय आपके भविष्य का प्रतिबिंब है – तो हम स्वयं को इससे जोड़ कर कैसे देखें? कृपया समझाएँ।

जब भी कहीं कोई उलझन है, तब वह वास्तविक आह्वान नहीं है।

वास्तविक प्यास व काल्पनिक प्यास में क्या अंतर है? वास्तविक प्यास को केवल कुछ समय के लिए ही रोका जा सकता है, जबकि काल्पनिक प्यास उसी क्षण लुप्त हो जाती है जिस क्षण आप उसे अपने विचारों से निकल देते हैं। जब आह्वान वास्तविक होता है, उस समय, चाहो या न चाहो, निर्णय लेने की क्षमता कथित व्यक्ति के हाथ में होती ही नहीं। प्रकृति स्वयं उस व्यक्ति को उसके नियत स्थान तक खींच ले जाएगी। वास्तविक आह्वान कभी भी मन से नहीं उपजता। इच्छित शैली अवश्य विचार विमर्श के उपरांत लिया गया निर्णय होता है, जिसमें व्यक्ति अनेकों उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन कर लेता है। वास्तविक आह्वान हृदय की गहराइयों से जुड़ा होता है। यह हर प्रकार के चिंतन से पूर्णत: ऊपर है।

यदि आप अपने लिए ‘इच्छित मार्ग’ चयन करते हैं, किंतु कुछ समय उस पर चलने के उपरांत, आपको वह उपयुक्त नहीं लगता, तो आप अपने इच्छित मार्ग को त्याग दें। सरल सी बात है। ऐसा अनिवार्य तो नहीं कि अपना संपूर्ण जीवन किसी एक रूप में ही बिताया जाये! इसे जानने का सरल परीक्षण यह है कि आप चुपचाप उस शैली के अनुरूप जीना आरंभ कर दें। बिना उद्घोष किए अपने मार्ग पर चलते रहें व अनुभव करें कि क्या वास्तव में आपकी इच्छा यही है। आरंभ में एक अल्पावधि के लिए उसे पूर्ण रूप से अपना कर देखें। यदि आपको स्वयं निश्चय हो जाए कि यही शैली आपके अनुरूप है, तब आप चाहें तो अपना निर्णय सार्वजनिक कर सकते हैं। वर्षों पूर्व मैंने एक हास्यास्पद किंतु प्रभावशाली उक्ति पढ़ी थी, “यदि आप प्रथम चरण में सफल नहीं होते, तो किसी को भी न बताएँ।”

किसी नये मार्ग के अनुसरण के लिए पुराने मार्ग का त्याग आवश्यक हो जाता है। सीढ़ियाँ चढ़ने की कल्पना करें। एक क्षण ऐसा अवश्य आता है जब आप पहली सीढ़ी से अपना पैर पूर्णतः हटा लेते हैं, ताकि अगली सीढ़ी पर चढ़ सकें। एक पैर एक सीढ़ी पर व दूसरा दूसरी पर टिकाए रखने से सीढ़ियाँ चढ़ पाना असंभव है। असंतुष्टि की भावना प्रायः तभी आती है जब साधक अपने अतीत को भी संभालते हुए, वर्तमान की चयनित जीवन शैली से संपूर्णता की आशा करता है। यह उपयुक्त ढंग नहीं है। एक नवीन जीवन शैली का अर्थ पूर्ण रूप से नवीन शैली ही होता है। इसमें अतीत का कोई भी चिन्ह ठहर नहीं पाता। एक पूर्णतः संयमित व एकाग्र मन सुगमता पूर्वक व्यवस्थित हो जाता है, वहीं बाह्य जगत की ओर केंद्रित मन को अतीत व वर्तमान, दोनों का मिश्रित रूप चाहिए। वस्तुतः यह तथ्य भौतिक जगत के पहलुओं पर भी सटीक बैठता है। आपका मन सदा अतीत व वर्तमान की तुलना में ही उलझा रह कर, तत्कालिक अथवा सुदूर भविष्य का चित्र बनाता रहता है।

यदि आप त्याग के लिए तत्पर हैं – संसार का नहीं, वरन आपकी इच्छाओं के संसार का त्याग – तब किसी भी मार्ग पर चलना सुगम हो जाता है। वैराग्य भाव ( भौतिक सुखों के प्रति विरक्ति ) के बिना किसी भी आध्यात्मिक मार्ग पर चलना संभव नहीं, व अभ्यास ( आध्यात्मिक अनुशासन ) के बिना कोई फल पाना असंभव है। मार्ग दुष्कर है, किंतु अथक प्रयास द्वारा ही अमूल्य रत्न प्राप्त होते हैं!

शांति।
स्वामी