जीवन एक चलचित्र के समान है। वह अच्छा है या बुरा, लंबा है या छोटा, यह तो व्यक्तिगत पसंद पर ही निर्भर है। कुछ फ़िल्म दुःखान्वित फ़िल्मों की श्रेणी में आती हैं जबकि कईं अन्य हास्यप्रधान फ़िल्म कहलाती हैं। कुछ क्रियाकलाप एवं उत्तेजना से भरपूर होती हैं तो कुछ धीमी गती से चलती हैं। कुछ डरावनी होती हैं तो कुछ में आतंक ही आतंक होता है। एक बार आप सिनेमा हाल में चले गए तो ऐसा लगता है कि आप के पास और कोई विकल्प ही नहीं हैं। फ़िल्म जितनी भी बेकार हो संभवतः आप उसे देख ही लेते हैं। आप को लगता है कि पैसा खर्च किया है तो इसे बैठ कर देख ही लेते हैं। हाँ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो फ़िल्म को आधे में छोड़ कर चले जाने का चुनाव करते हैं। कभी कभी फ़िल्म बहुत अच्छी होती है। ओह! परंतु कुछ असभ्य व्यक्ति फ़िल्म के समय निरंतर टिप्पणी करते रहते हैं तथा अपने पैरों से लगातार आप के सीट को लात मारते रहते हैं। आप के निकटवर्ती सीट पर बैठे व्यक्ति के विषय में तो पूछिए भी मत। ऐसा प्रतीत होता है कि उस ने संसार के सारे चिप्स भंडार को समाप्त करने की ठान ली है। चिप्स को वह ऐसे कोलाहल पूर्वक चबाता है मानो कोई प्रलय आ गया हो। आप के सामने वाले सीट में कुछ शिष्ट व्यक्ति भी होते हैं। परंतु वह अपने कोका कोला को ऐसे चूसते हुए पीते हैं जैसे कोई अजगर फुफकार रहा हो। आप बेबस, लाचार एवं कुंठित हो जाते हैं। इन व्यक्तियों को अनदेखा करने के आप के सारे प्रयत्न असफल हो जाते हैं।

जीवन भी कुछ इस प्रकार ही होता है। कुछ पहलू आप के वश में होते हैं परंतु कुछ पूरी तरह से आप के वश के बाहर होते हैं। आप कुछ पहलुओं के साथ आसानी से जीना सीख लेते हैं और कुछ दूसरे विषयों पर संघर्ष करते रहते हैं। मैं आप को एक रहस्य बताता हूँ – आप जब भी चाहें इस फ़िल्म को बदल सकते हैं। वह भी आप की इच्छा अनुसार। फ़िल्म में परिवर्तन आते ही आप के चारों ओर बैठे हुए दर्शकों में भी परिवर्तन आ जाएगा। उदाहरणार्थ आप अपने छोटे बच्चों को वयस्कों के लिए बनी एक डरावनी फ़िल्म के लिए तो नहीं लेकर जाएंगे। उसी प्रकार आप शोर मचाने वाले लोगों को एक भावुकताजनक फ़िल्म में संभवतः नहीं पाएंगे।

बाहर एक बड़े पर्दे पर प्रदर्शित आप के जीवन की फ़िल्म निस्संदेह आप के स्वयं के हाथ में ही है। आप का मन आप के विचारों की रील को पेश करने वाली शक्तिशाली प्रोजेक्टर है। और यह प्रोजेक्टर आप के सांस में उपस्थित महत्वपूर्ण जीवन शक्ति (प्राण) द्वारा संचालित है। आप का मन नियंत्रित है तो आप अपने पसंद के अनुसार रील बदल सकते हैं। और आप की सांस नियंत्रित हो तो आप इस प्रोजेक्टर को रोक सकते हैं या पूरी तरह बंद भी कर सकते हैं। मैं ने अभी आप को न केवल एक महत्वपूर्ण रहस्य बताया है परंतु संक्षेप में योग के सबसे महत्वपूर्ण रहस्य को प्रकट किया है।

जाइए और फ़िल्मों का आनंद ली जिए! किंतु किसी और के फ़िल्म को छोड़िए। अपनी स्वयं की फ़िल्म देखिए जो आप को पसंद हो, जो आप को प्रसन्न करे और जो आप को प्रगति की ओर ले जाए। इस को अपनी शर्तों पर पेश करिए। अपने पसंदीदा माहौल में पेश कीजिए। इस को अपने वैयक्तिक सिनेमा हाल में देखिए। आप के पसंद अनुसार व्यवस्थित और सेवित। मैं ऐसे ही देखता हूँ!

क्या आप भी मेरे साथ देखना चाहेंगे?

शांति।
स्वामी