जीवन चार ऋतुओं के चक्र समान है। हर ऋतु निर्धारित रूप से अपने समय पर आती है और उसकी अवधि समाप्त होते ही स्वयं चली जाती है, जैसे मानव मन में एक विचार का अंत होते ही अगला विचार तुरंत प्रकट हो जाता है। चार ऋतुओं में आप प्रकृति का हर रंग देख सकते हैं – ठंड में सिकुड़ना, शरद ऋतु में झड़ना, गर्मियों में खुलना तथा वसंत में खिलना। ऐसा प्रतीत होता है कि हम जिस ऋतु को नापसंद करते हैं वह बहुत लंबी अवधि के लिए चलती है। वसंत में फूल खिलते हैं और वर्षा ऋतु में बारिश होती है। तापमान सर्दियों में गिर जाता है और गर्मियों में तापमान ऐसे उठता है मानो सांस में प्राण की स्थिति से प्रभावित होकर चेतना उठ रही हो। यह एक निर्धारित प्रणाली है – आप चाहे पसंद करें या ना करें।

इसी प्रकार हम जीवन के विभिन्न रंगों का अनुभव करते हैं। आप शरद ऋतु के पश्चात वसंत का अनुभव करते हैं या वसंत के पश्चात शरद ऋतु का यह इस पर निर्भर करता है कि आप वर्ष के किस महीने में पैदा हुए। क्या आप वर्ष के अधिकांश भाग में सुखद धूप का आनंद लेते हैं या कड़कड़ाती ठंड का सामना करते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आप कहां रहते हैं। आप मौसम का सामना करना सीख जाते हैं – सर्दियों में अपने को ढक कर और बरसात में छाता का उपयोग कर कर। वैसे देखा जाए तो हम सदैव मौसम से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करते हैं। प्रकृति के साथ एक होने का अर्थ है उसकी हर देन को स्वीकार करना तथा उस का आनंद लेना। कभी कभी आप बारिश का आनंद लें, उस में भीगें – संभवतः वह ईश्वर का ही अनुग्रह हो जो आप पर बरस रहा हो। ठंड का भी अनुभव करें – यह आप को और दृढ़ बनायेगा।

जब कठिनाईयों के सूर्य द्वारा आप के जीवन में असहनीय भीषण गर्मी हो जाए, तो संभवतः आप को एक ठंडी जगह जाने पर विचार करना पड़े। जीवन जब शरद ऋतु के वीरान पेड़ के प्रकार उदासीन लगे, तो आप को संभवतः सब्र करना पड़े। वसंत की प्रतीक्षा करें या दुनिया के ऐसे हिस्से में चले जाएं जहाँ शरद ऋतु ना हो। परिवर्तन तो निरंतर होता ही रहेगा। यह छोटी मात्रा में होता है, जिस प्रकार भारी वर्षा भी पानी की छोटी बूंदों के द्वारा ही निर्मित होती है। परंतु ऐसा हो सकता है कि यह वह परिवर्तन नहीं जिस की आप को प्रतीक्षा है। यदि आप किसी प्रकार का परिवर्तन चाहते हैं तो आप को उसके अनुसार कदम उठाने होंगे। वास्तव में, यदि आप परिवर्तन चाहते हैं तो आप को स्वयं ही वह परिवर्तन आरम्भ एवं पूर्ण करना होगा। एक उग्र निर्णय द्वारा आप एक विशाल परिवर्तन ला सकते हैं, परंतु एक सामान्य निर्णय द्वारा केवल एक छोटे से परिवर्तन की ही आशा की जा सकती है।

दूसरा विकल्प यह है कि आप स्वयं के भीतर झांक कर देखें और यह जानने का प्रयत्न करें कि सभी सांसारिक वस्तुओं का अनुभव केवल एक अल्पकालिक शारीरिक अनुभव है। आप के भीतर परमानंद कूट कूट कर भरा है। यह एक अनंत महासागर के समान है। इस में आप सदैव सुरक्षित और आनंदित रह सकते हैं – हर प्रकार के मौसम और विचलन से पूरी तरह सुरक्षित। बाहर शरद ऋतु ही क्यों ना हो, किंतु भीतर की दुनिया में आप सदैव वसंत ऋतु का आनंद ले सकते हैं। अनगिनत प्रकार के सुंदर फूलों को अनाहत नाद की मधुर ध्वनि पर नाचते हुए देख सकते हैं। भीतर के संसार में ना तो कठोर ठंड है ना असहनीय गर्मी, सदैव सही तापमान और एक अवर्णनीय सौंदर्य!

छुट्टी के लिए तैयार हो जाएं ! भीतरी सुख सागर की यात्रा पर निकल जाएं। रास्ता दिखाने में मैं आप की मदद कर सकता हूँ। मुझे विश्वास है कि गंतव्य पर पहुँचने पर आप को कभी लौट के आने की ना तो इच्छा होगी ना आवश्यकता।

सुख के महासागर में स्कूबा डाइविंग के लिए तैयार हो जाएं!

शांति।
स्वामी