मैक्सिम गोर्की ने कहा “एक बार एक कौआ था। वह उड़ता रहता था। पहाड़ों से खेतों तक। इस झाड़ी से उस झाड़ी तक। इस प्रकार उसने अपना संपूर्ण जीवन जी लिया। फिर वह मर गया और उसका शरीर नष्ट हो गया। ऐसे जीवन का क्या औचित्य व अर्थ है? कोई अर्थ नहीं।”

जी हाँ, हममें से अधिकतर व्यक्ति अपना जीवन गोर्की के कौए के समान व्यतीत कर रहे हैं। ऐसा क्यों?

क्या आपने कभी बैठकर अपने विचारों का अवलोकन किया है? एक साक्षी के समान नहीं बल्कि एक विश्लेषक के रूप में? एक मूक दर्शक के समान बैठकर केवल अपने विचारों को न देखें, बल्कि जैसे ही कोई विचार मन में उत्पन्न हो तुरंत उसका विश्लेषण कर उसे विभाजित कर दें। यह सरल नहीं है क्योंकि इसके लिये तीक्ष्ण सतर्कता एवं सजगता चाहिये। यह उत्तम कोटि की ध्यानशीलता है। हालाँकि यह लेखन ध्यान के विषय में नहीं है, फिर भी उससे संबंधित किंतु भिन्न विषय के बारे में है – वह है हमारी चिंताएं।

जब हम व्यस्त नहीं होते तब हमारा मन निरंतर किसी ना किसी विषय पर चिंतन करता रहता है। यहाँ तक कि जब आप ध्यान में बैठते हैं तो मन को केन्द्रित बनाए रखने के लिये बहुत प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि मन उसी प्रकार भटकता है जैसे कि एक भेड़, जो अपने झुण्ड से अलग हो गयी हो, भटकती है। हम इतनी चिंता क्यों करते हैं? हममें से अधिकतर अपने अतीत से असहज हैं, भविष्य के प्रति चिंतित हैं तथा वर्तमान को लेकर परेशान। हम देश की वित्तीय अवस्था से लेकर कईं करोड़ों बातों से तनावग्रस्त रहते हैं।

सबसे अधिक हास्यप्रद व विचलित करने वाली बात यह है कि हम अधिकतर उन विषयों के बारे में चिंता करते हैं जो हमारी नियंत्रण सीमा से परे है।

जबकि हमारा अतीत पर कोई प्रभाव व नियंत्रण नहीं है, फिर भी बंद अलमारी में पड़े कंकालों की हमें बहुत चिंता रहती है। हम नहीं चाहते कि कोई हमारी छिपाई हुई गन्दगी को देखे। आपको इस बात से परेशानी हो सकती है कि दूसरे आपके विषय में क्या सोचते हैं। या फिर वे आपको प्यार क्यों नहीं करते। या फिर वे आपको पहचानते क्यों नहीं। किंतु एक बार फिर, आप उनके विचारों को नियंत्रित तो नहीं कर सकते। सत्य तो यह है कि उन व्यक्तियों का स्वयं अपने विचारों पर ही नियंत्रण नहीं है! थोड़ी चिंता तो उचित है क्योंकि यह आपके जीवन को सुनियोजित करने में सहायक है तथा यह आपको अपने द्वारा किये गये कार्यों पर अधिक विचारशील रहने की प्रेरणा देती है। किंतु अत्याधिक चिंता एक रोग है।

प्रश्न उठता है कि हम उन विषयों के बारे में चिंता क्यों करते हैं जिनके विषय में हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते? इसका उत्तर निहायक रूप से सरल है। चिंता करना एक आदत है। दो बातें है जो इसे स्थायी बनाती हैं। पहला भय और दूसरा अनियंत्रित विचार। भय को तो उचित कार्य (यहाँ देखें) करके काबू में किया जा सकता है। अनियन्त्रित विचारों को ध्यान के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। वह, जिसने अपनी विचारधारा की दिशा परिवर्तित करने में प्रवीणता प्राप्त कर ली है, इस जीवन-धारा में बिना कोई प्रयास किये ऐसे फिरता है जैसे कि एक शेर वन में विचरण करता है।

मेरा आज का लेख एक तीसरे पहलू पर केन्द्रित है। जीवन जीने का एक भिन्न दृष्टिकोण जो आपको अपनी चिंताओं से ऊपर उठने में सहायता कर सकता है। इसका आरंभ इस बात को स्वीकार करने से होता है कि विपरीत परिस्थितियाँ, चुनौतियाँ व अवाँछनीय घटनाक्रम, यह सब हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। हम अपने जीवन में जिन भी वस्तुओं से बचना चाहते हैं, चाहे वे लोग हों या परिस्थितियाँ, उनमें से अधिकतर अनिवार्य हैं। यह तो मानकर चलिये कि संघर्ष प्रगति का एक हिस्सा है। इसके लिये लैटिन भाषा में एक शब्द है “अमॉर-फेटी”। जिसका अर्थ है “भाग्य से प्रेम”।

अमॉर-फेटी का यह अर्थ नहीं है कि हम एक पराजित या तिरस्कृत जीवन जियें। इसके विपरीत इसका तात्पर्य है कि स्वयं या अपने जीवन से संबंधित उन बातों को सहर्ष, साहस से स्वीकार कर लें, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं। यह समझदारी बहुत शांति लेकर आती है। यहाँ मुझे फ्रेडरिक नैयट्ज़स्चे की याद आती है जिन्होंने अपनी कृति “द गे साइन्स” में कहा है “मैं यह सीखना चाहता हूँ कि वस्तुओं के मूलतत्त्व की सुन्दरता कैसे देखी जाए। तब मैं उनमें से एक हो जाऊँगा जो वस्तुओं को सुंदर बनाते हैं। अमॉर-फेटी – आज से इसे ही मेरा प्रेम हो जाने दो!… और यदि पूर्ण रूप से देखा जाए तो एक दिन मैं केवल हाँ कहने वाला बनना चाहता हूँ – ऐसा व्यक्ति जो सब स्वीकार कर सके।”

इस एक सूत्र में संपूर्ण जीवन की बुद्धिमत्ता है। वस्तुओं के मूलतत्त्व की सुन्दरता को देखना। जीवन में जो कुछ भी हमें सहना है, जब हम उसमें सुन्दरता देखना शुरू कर देते हैं, तब हमारा जीवन वास्तव में सुन्दर हो जाता है। वह जो कि जीवन को जैसा है, वैसा ही देखता है और मन की समरूपता में दृढ़ता से स्थित है उसे ही वेदों में “स्थित प्रज्ञ” कहा गया हैं। “एक्के होमो” में नैयट्ज़स्चे ने बड़े ही प्रभावशाली रूप से कहा है “मेरा यह मानना है कि एक मानव में महानता का सूत्र है अमॉर-फेटी; कि वह कुछ भी भिन्न नहीं चाहता, न अतीत में न भविष्य में। किसी भी स्थिति मेें नहीं। जितना आवश्यक हो केवल उसे ही सहना व स्वीकार करना यह सही नहीं। ऐसा करना तो निरर्थक है। मानव को संपूर्णता व प्रेम से सब कुछ स्वीकार करना चाहिए।”

हम इस ग्रह पर निरंतर कभी इसकी, कभी उसकी चिंता कर अपना जीवन व्यर्थ करने के लिए नहीं हैं। चिंता हमारे जीवन में से “जीवन” को निकाल लेती है। कभी तो हर एक को अपने अंदर का साहस जुटाकर स्वयं को मुक्त करना चाहिए। वह बनने के लिए जो कि वह बनना चाहता है, वह करने के लिए जो करने के लिए आप सदैव व्याकुल रहे हैं। आप जीवन में पूर्णता इसी प्रकार महसूस करेंगे। काम तो कभी भी समाप्त नहीं होगा। और भी कार्य करने की सूची तो सदैव ही रहेगी। परंतु इन सभी में हम जीना न भूलें। पर्याप्त रूप से, उत्तमता से। इस पर मेरी एक प्रिय कविता है। डब्ल्यू.एच.डेविस के द्वारा लिखित, शीर्षक है “लीश्यर्” (अर्थात “अवकाश”)। इसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार है –

चिंताओं से भरा जीवन भी क्या है?
यदि समय नहीं है ठहरने का,
कुछ पल इसको निहारने का,
डाली के नीचे खड़े होकर,
गौओं के समान ताकने का।

समय नहीं जब वन से गुजरें तो देखें
कि गिलहरियाँ घास में दाना कहाँ छुपाती हैं
समय नहीं है कि देखें,
कि दिन के उजाले में,
पानी यूँ झिलमिलाता है,
जैसे आकाश भरा हो तारों से।

समय नहीं कि सुन्दरता को निहार सकें,
और देखें कि कैसे उसके सुन्दर पाँव
नृत्य करने लगे हैं,
समय नहीं कि प्रतीक्षा कर सकें,
कि उसकी आँखों से निकली मुस्कान
उसके होंठों तक पहुँचे।

ऐसा जीवन है चिंताओं से भरा,
समय नहीं कि ठहरें,
और कुछ पल इसे निहारें।

यह सचमुच ही बौखला देने वाली बात है कि हम कैसे चिंता करते हुए दशकों बिता देते हैं। अनावश्यक भय से जीते हुए। हम एक छुट्टी की प्रतीक्षा करते हैं और अन्ततः जब हम वहाँ होते हैं तो हम बड़ी ही शीघ्रता से उन सुंदर रास्तों से बस गुज़रते चले जाते हैं। गांव की सुन्दर सड़कों, खेत-खलिहानों, पेड़-पौधों को अनदेखा करते हुए।

हर रात सोने से पहले मुल्ला नसरूद्दीन की पत्नी उसे घर के सभी दरवाज़ों पर लगे तालों को बार-बार देखने को कहती थी। क्योंकि उसे चोरों का भय था। वह रात के अंधेरे में उठ कर बैठ जाती। मुल्ला पर दबाव डालती कि वह उठ कर पूरा घर देखकर आये। इसी प्रकार कईं वर्ष बीत गये। एक रात मुल्ला ने तहखाने में कोई आवाज़ सुनी।

उसकी पत्नी गहरी नींद में थी परंतु मुल्ला आवाज़ को अनदेखा न कर सका। वह सीढ़ियों से नीचे गया और वहाँ एक चोर था।

मुल्ला ने कहा “खुदा का शुक्र है कि आखिर तुम आ ही गये! आओ मैं तुम्हे अपनी पत्नी से मिलवाता हूँ। वह बीस वर्षों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।”

अपनी गाड़ी का बीमा कराना एक बात है और दुर्घटना का विचार करके विक्षिप्त हो जाना बिल्कुल अलग बात है। दूसरी स्थिति चिंताजनक है।

क्या आपको याद है कि आपने आखिरी बार पूर्णचंद्र कब देखा था? या फिर आखिरी बार कब अपना बिस्किट चाय में डुबोया था (और ऐसा करते हुए वह गीला बिस्किट चाय में ही गिरा दिया हो)? या फिर कब बारिश की चमचमाती बूंदों में स्वयं को भिगोकर वर्षा का स्वागत किया था? इस जगत की सुंदरता को देखिये। देखिये तारों से भरा आकाश और आपको अहसास होगा कि आपको तो पहले से ही कितना आशीष मिला हुआ है। यह अहसास होगा कि चिंता करने के विषय कितने कम हैं।

हमें गोर्की का कौआ बनने की आवश्यकता नहीं, जो कि भय की खुराक पर जीता है। जबकि हम हिमालय का वह हंस हो सकते हैं जो जीवन के मोती चुगता है। जीवन को चिंताओं से भरना आवश्यक नहीं है जबकि वह प्रसन्नता व सुख से परिपूर्ण हो सकता है। हम बैठकर न भुनभुनाएं कि जीवन ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए। बजाय इसके हम देखें कि जीवन क्या है और इसे उसमें परिवर्तित करें जो यह हो सकता है – एक चमत्कार।

शांति।
स्वामी