एक दिन, बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ शांति से बैठे थे कि एक व्यक्ति ने उन्हें संबोधित किया और कहा, “क्या आप मुझे कम से कम शब्दों में सर्वोत्तम ज्ञान प्रदान कर सकते हैं?”।

बुद्ध ने उस व्यक्ति को और उसके प्रश्न को मान्यता दी और मौन रहते हुए मुस्कुराए।

कुछ मिनटों तक प्रतीक्षा करने के बाद, वह व्यक्ति बुद्ध के सामने झुका और बोला, “बहुत बहुत धन्यवाद। मुझे आपका संदेश मिल गया है। मैं अब आपकी अनुमति लेता हूँ।”

शारिपुत्र, जो सर्वाधिक अवज्ञाकारी भिक्षुओं में से एक थे, जिन्होंने कभी बुद्ध से प्रश्न करने से नहीं हिचकिचाया, आगंतुक के प्रस्थान करते ही बुद्ध से पूछते हैं, “यह व्यक्ति आपको धन्यवाद कैसे दे सकता है और वह क्या प्राप्त करके गया है जिसे हम नहीं देख पाए?”
“शारिपुत्र,” बुद्ध ने उत्तर दिया, “एक अच्छा घोड़ा कोड़े की छाया देखकर भी दौड़ता है। यह व्यक्ति सज था।”

परंतु शारिपुत्र को यह बात अभी भी समझ में नहीं आई। जब बुद्ध अपने स्थान से उठे और दोपहर के विश्राम के लिए जाने लगे, शारिपुत्र ने अन्य सभी भिक्षुओं से पूछा कि उन्हें यह ज्ञान समझ आया। स्पष्टतया से उनमें से किसी को भी वह बात समझ नहीं आयी। उन्होंने एक साथ निर्णय लिया कि सायंकाल के प्रवचन में इस महान ज्ञान की पुष्टी के लिए वे अनुरोध करेंगे।

उन्होंने बुद्ध से पूछा, “क्या आप हमें भी कोई ज्ञान, कोई बुद्धिमत्ता, कोई अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं? कम से कम शब्दों के साथ या फिर बिना कुछ कहे ही? संभवतः हम में से भी कोई यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए सज हो।”

बुद्ध ने अपने समीप रखे हुए एक पुष्प को उठाया, और कुछ क्षणों के लिए उसे अपने हाथ में रखा। वह कुछ नहीं बोले। वे केवल भावशून्य होकर उस पुष्प को देखते रहे। इस प्रकार बुद्ध ने सबसे महान ज्ञान, ध्यान की सबसे बड़ी विधि, सबसे बड़ी अंतर्दृष्टि को प्रदान किया। वे उस पुष्प की ओर एकटक देखते रहे फिर अपनी दृष्टि उठाई और मुस्कुराए। महाकश्यप के अतिरिक्त उनका कोई भी भिक्षु नहीं मुस्कुराया। यह बुद्ध का प्रथम संलेख था जो ज़ेन का संचरण बना। यहीं से ज़ेन का संचरण प्रारंभ हुआ।

महाकश्यप मुस्कुराया क्योंकि वह समझ गया था कि बुद्ध क्या कह रहे थे, एक पुष्प के साथ और मौन द्वारा।

अब जो कुछ भी मैं या कोई अन्य व्यक्ति कहे वह उस घटना की व्याख्या होगी। क्या आपने कभी सोचा है कि हम पूजा में पुष्प क्यों चढ़ाते हैं? यह केवल रंग और महक के लिए नहीं है। यदि यह केवल इसके लिए होता, तब हम कई सुंदर वस्तुएं भेंट कर सकते थे। हम सुंदर रंगों से अपने देवता को अलंकृत कर सकते थे। हम उन्हें इत्र लगा सकते थे। परंतु पुष्प ही क्यों? इसके पीछे एक बहुत ही वास्तविक व सुंदर कारण है। पुष्प एक जीवित वस्तु है। उसमें जीव शक्ति है और समय के साथ वे सूख जाते हैं।

बुद्ध ने अपने सभी भिक्षुओं को संबोधित करते हुए किंतु महाकश्यप को देखकर यह स्पष्ट किया, “सब कुछ यहाँ है, महाकश्यप सब कुछ। केवल यहीं है। हमें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। हमें बस इतना करना है कि इस पुष्प की सुंदरता का आनंद लें, यह ध्यान रखें कि यह पुष्प सदा के लिए नहीं है। यह एक दिन सूख जाएगा।”

ज़ेन का अनुभव करने का एक सरल एवं सुंदर उपाय है। आप अपने कार्य क्षेत्र पर पुष्प रखें और कदाचित आपके भोजन की मेज पर और आपके बेडरूम में भी। उसे जल से न सींचे। और ना ही प्रतिदिन उसे प्रतिस्थापित करें। उसे केवल तब बदलें जब वह सूख जाए।

जापानी ग्रंथों का कहना है कि बुद्ध द्वारा व्यक्त किए गया प्रथम ज़ेन सूत्र हाना वाहरकू, बेन कोक ना हरु – जिसका अर्थ है कि एक पुष्प के खिलने से पूरे विश्व में वसंत ऋतु आ जाती है।

ज़ेन में पुष्प बुद्ध के रूप में जाना जाता है क्योंकि बुद्ध का जन्म पुष्पों की देखरेख में हुआ था। पुष्पों पर ही उनका देहांत हुआ और पुष्पों पर ही उनका जीवन व्यतीत हुआ। उनके भक्तों ने उन्हें अपने जीवन से अधिक प्रेम किया था। उन्होंने पुष्पों के एक वृक्ष के नीचे ही अपनी प्रबुद्धता प्राप्त की। आपके मन की तुलना भी इसी प्रकार की जा सकती है। जब आपका मन खिलता है तब पूरे संसार में वसंत आ जाता है। जब यह शरद ऋतु का अनुभव करता है, चाहे कितनी भी सुंदरता बाहरी संसार में हो, सभी विषादपूर्ण प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होता जैसे सब कुछ नष्ट हो गया है और निराशा छा गयी हो। इसलिए, ज़ेन कहता है, मुझे अपने मन पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यदि मैं अपना मन खिलने की स्थिति में रखता हूँ, तब संसार स्वतः ही सुंदर हो जाता है।

आप एक पुष्प हैं और आपके पास एक सुंदर जीवन है। अपनी जीवन शैली की तुलना में करोडों लोगों के लिए एक साधारण जीवन जीने का सामर्थ भी नहीं है। अधिकतर व्यक्ति जब किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं तब वे कुछ भी मन चाहा भोजन नहीं खा सकते हैं। वे मेनू पर हर वस्तु का मूल्य देखते हैं और फिर निर्णय करते हैं कि वे क्या खर्च कर सकते हैं। हर कोई जीवन की विलासिता का आनंद नहीं ले सकता है, जैसे कि आप ले सकते हैं। स्मरण रखें कि आप अपने जीवन में किस स्तर पर हैं और पहले से आपको क्या आशीषें हैं। यदि यह पर्याप्त नहीं है, यदि यह अभी भी आपके लिए जीवन में आनंद का अनुभव करने के लिए अपर्याप्त लगता है, तब मुझे बताएं, आपको क्या वस्तु आनंद देगी? आपको और कुछ भी आनंद नहीं दे सकता।

ज़ेन हमें सिखाता है कि आनंद एक खोज नहीं है। प्रसन्नता ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हमें खोजना है। हाँ, हमारे पास जीवन के लिए तत्परता, उत्साह और आवेश होना चाहिए, परंतु आवेश को लापरवाही या अत्यधिक प्रयास के रूप में नहीं समझना चाहिए। आवेश या जुनून के विषय में यह विचार, जहाँ आपको लगातार कहा जाता है कि आपके जीवन में एक मनोवेग अथवा जुनून होना चाहिए, यह एक बहुत ही नई, बहुत ही अमरीकी विचारधारा है। इसके प्रचलन के पहले अरबों लोग इस संसार में रहते थे, और उनके जीवन में कोई “जुनून” नहीं था। परंतु फिर भी वे प्रसन्न थे, शांत और संतुष्ट थे।

ज़ेन कहता है, हमें केवल वर्तमान क्षण में रहना चाहिए, यहाँ तक कि यह धारणा होनी चाहिए कि श्वास भी एक आशीर्वाद है। यदि हम वर्तमान में जो भी कुछ प्राप्त है उससे संतुष्ट नहीं हो सकते, तब भविष्य में जो कुछ भी हो सकता है, उससे भी हम कभी आनंदित नहीं हो सकेंगे। यह स्पष्ट है कि हर समय और किसी भी परिस्थिति में आपके जीवन में कम से कम एक असहयोगी व्यक्ति होगा। आपको कम से कम एक बड़ी चुनौती का सामना करना होगा और आपको कम से कम एक प्रतिकूल परिस्थिति से निपटना होगा। चाहे वह मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक हो। यह जीवन का एक हिस्सा है। परंतु इन सब में प्रवाह के साथ बहने में सक्षम होना ही ज़ेन है।

बुद्ध का निधन हो जाने के हज़ारों वर्षों बाद भी ज़ेन वास्तव में प्रचलित नहीं हो पाया। इसका कारण यह है कि लोगों को सहारे की आवश्यकता है। उन्हें क्रियापद्धति की आवश्यकता है। जब मैं लोगों से कहता हूँ, “केवल बैठें और जागृत रहें, आपको कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।” उन्हें लगता है कि यह पर्याप्त नहीं है। जैसे कि उन्होंने पहले से ही स्थिर बैठने की कला में महारत हासिल कर ली हो! यदि मैं उन्हें एक मंत्र देता हूँ, और किसी को मंत्र देना मेरे लिए बहुत दुर्लभ है, वे कुछ सप्ताह तक या महीने के लिए उसका अनुसरण करते हैं। और फिर मेरे पास वापस आकर कहते हैं, “ठीक है, अब हमारे लिए अगला कदम क्या है?”।

यह बहुत ही भौतिक सोच है। कोई अगला कदम नहीं है। यदि आप किसी भी पथ का उपयोग करके स्वयं के साथ अभिन्न नहीं बन सकते हैं, तब कोई “अगला कदम” नहीं है जो आपको आप के गंतव्य तक ले जाएगा। ध्यान में चरण होते हैं, कदम नहीं होते हैं, परंतु आप अलग-अलग अनुसंधान करके उन चरणों में नहीं जाते हैं। आगे चलने से आप उन चरणों का अनुभव नहीं करते हैं। वास्तव में, यह चरण से अधिक एक अवस्था के समान हैं।

आप वही करें, जो आप करने में सक्षम हैं। आप उस कला को निपुण करते जाएं और उसमें प्रवीणता प्राप्त करते रहें। तब आप उसके एक स्तर तक पहुँच जाएंगे। एक निश्चित मार्शल आर्ट मास्टर ने अपने छात्र से कहा, “दस हज़ार चालें सीखने की चिंता मत करो। आप उन सबमें निपुण नहीं हो पाओगे। मुझे आप लोगों को दस हज़ार चालें सिखाने में दिलचस्पी नहीं है, जो आप केवल एक या दो बार ही प्रयोग करेंगे। मैं आपको केवल एक विजेता विधि सिखाना चाहता हूँ जिसे आप दस हज़ार बार अभ्यास करेंगे। यह आपको विजेता बनाएगा।”

१००० वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में, वर्तमान काल के तमिलनाडु में कांचीपुरम नामक एक जगह में, एक बालक एक शाही परिवार में पैदा हुआ। गहन रूप से बौद्ध शिक्षाओं से प्रभावित, उस बालक ने एक उल्लेखनीय मार्ग को निर्धारित किया। और न केवल ज़ेन विचार को पुनर्जीवित किया बल्कि इसका व्यापक रूप से प्रचार किया।

आपने जो पढ़ा, वह माइंड फुल टू माइंडफुल का एक अंश है, जो ज़ेन ज्ञान के विषय में मेरी नई पुस्तक है। यह केनेडा और भारत में ज़ेन रिट्रीट्स में दिए गए मेरे प्रवचनों पर आधारित है। यह सरल ज़ेन-जैसी भाषा में प्रस्तुत की गई है, कहानियों से भरपूर, उपाख्यानों के साथ और कुछ हास्य और सुंदर चित्र भी सम्मिलित हैं। चूंकि ज़ेन वर्तमान में रहने अर्थात “इस समय” के विषय में है, क्यों ना आप अपने लिए यह पुस्तक “इस समय” प्राप्त कर लें। मुझे आशा है कि आप इसे पढ़ना पसंद करेंगे। ये लिंक हैं:
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शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Mind Full to Mindful