महान ज्ञानी चाणक्य सर्वोकृष्ट विचारक थे और भारत के अत्यंत शक्तिशाली राजाओं में से एक, चंद्रगुप्त मौर्य (३२१-२९७ ई-पू), के मुख्य सलाहकार थे। वास्तविकता में चाणक्य मात्र एक विश्वसनीय सलाहकार ही नहीं थे। क्योंकि उन्होंने चंद्रगुप्त को, जब चंद्रगुप्त मात्र छोटे बच्चे थे, ले कर, प्रशिक्षित कर, उन्हें शासक बना दिया था। वह एक बार नवोदित राजा को सलाह दे रहे थे जब उनमें निम्नलिखित वार्तालाप हुआ।

“एक राजा का जीवन, त्यागपूर्ण जीवन है। उसे दूसरों के लिए जीना चाहिए”। फिर चाणक्य ने सूर्य की ओर संकेत करते हुए कहा – “यह सम्पूर्ण ग्रह जीवित है क्योंकि प्रकाश व उष्मा उत्पन्न करने हेतु सूर्य स्वयं को जला रहा है। जो व्यक्ति नेतृत्व करता है वह यही करता है। जब सूर्य चमकता है तो सभी व्यक्ति कितने प्रसन्न होते हैं। फसलें लहलहाती हैं, फूल खिलते हैं, वर्षा होती है।”

“मैं सहमत हूँ” चंद्रगुप्त ने विचार पूर्वक उत्तर दिया। “किंतु मुझे सभी को प्रसन्न रखना है। जिसका अर्थ है कि मैं किसी अपराधी को दंड नहीं दे सकता। दंडित होकर किसी को प्रसन्नता नहीं मिलती।”

“अहा!” चाणक्य ने आश्चर्य प्रकट किया। “एक राजा को मात्र दूसरे व्यक्तियों के सुख की ही चिंता नहीं करनी चाहिए वरन उस व्यक्ति के हित का भी ध्यान रखना चाहिए। जो सही और उचित है वही हितकारी है। और कभी-कभी जो सही है, वह हमें प्रसन्न नहीं कर सकता। कभी संभवत: हम कड़वी गोली निगलना न चाहें, किंतु बीमारी का निदान करना आवश्यक है। इसी प्रकार प्रारंभिक चरण में बहुत से निर्णय कष्टदायक लग सकते हैं किंतु अंततः ये लाभदायक होते हैं। यही वास्तविक हित है।”

बुद्धिमत्ता के कुछ और सूत्रों को देने के पश्चात, उस ज्ञानी ने यह निष्कर्ष दिया – “एक राजा को निर्णय लेते समय सम्पूर्ण राज्य के हित को ध्यान में रखना चाहिए, न कि मात्र एक अपराधी का हित। इसलिए, दण्ड एक अच्छे शासन का एक अच्छा पहलू है। किंतु फिर भी, आपको यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उनको दंडित कैसे किया जाए।”

किसी ने मुझसे एक कार्यक्रम में एक प्रश्न पूछा था, जिससे मुझे यह कहानी याद आई जो मैंने, हाल ही में राधाकृष्णन पिल्लई की “कथा चाणक्य” में पढ़ी थी (यहाँ इसका थोड़ा भावानुवाद कर प्रस्तुत किया गया है)।

वह व्यक्ति जिससे मैं मिला, बहुत व्यथित था और उसने कहा, “महोदय, मैं सत्य बोलना चाहता हूँ। पर क्या करें जब आपके सत्य से दूसरों को कष्ट पहुँचता हो और उसे ना बोलने से मुझे कष्ट होता हो। क्या मुझे अपना परिवार एक बनाए रखने हेतु करुणावश स्वयं को ही कष्ट पहुँचाते रहना चाहिए? क्या करुणा का यह अर्थ है कि यदि मैं देखूँ कि मेरे बच्चे भटक रहे हैं तो मुझे उन्हें दंडित नहीं करना चाहिए या यदि मुझे कुछ परेशान कर रहा है तो अपने साथी को नहीं बताना चाहिए?”

यह मात्र इसी व्यक्ति का प्रश्न नहीं था। यह वह दुविधा है जिसका हम सभी सामना करते हैं जैसे कि एक समाचार पत्र का साप्ताहिक संस्करण निकलता है।

करुणा या प्रेम का अर्थ सदैव अलंकृत शब्दों को ही कहना नहीं है जबकि आपका ऐसा अभिप्राय न हो या जब आप कष्ट में हों। साथ ही साथ यह अपनी बात मनवाने के लिए दूसरे को कष्ट देने के विषय में भी नहीं है। इसके अलावा और अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मैं नहीं समझता कि हमें सभी कुछ दूसरों को कष्ट पहुँचाने अथवा स्वयं को कष्ट पहुँचाने के दृष्टिकोण से ही देखना चाहिए। आप एक जटिल व्यक्ति के साथ एक कठिन वार्तालाप स्नेहपूर्वक कर सकते हैं। कभी-कभी सामना करना अनावश्यक होता है, किंतु आप किसी का सामना प्रेमपूर्वक और करुणामय होकर कर सकते हैं। आप दूसरे व्यक्ति को दोषी ठहराए बिना अपनी बात को मृदुल विधि से कह सकते हैं।

किसी भी हालत में करुणा किसी को स्वीकारना नहीं अपितु समझना होता है। एक बार जब आप दूसरे के कार्यों को और उनके दृष्टिकोण को समझ लेते हैं तो आप संभवत: क्रोधित भी न हो पाएं। आप संभवत: उनके प्रति स्वभाविक रूप में सहानुभूति का अनुभव करें। सहानुभूति या करुणा का यह अर्थ नहीं कि आप किसी बच्चे को आग से इसलिए खेलने दें क्योंकि उनको पीछे खींचने से वे रोने लगेंगे। कभी-कभी विशाल हित में आपको दृढ़ता व समर्पण के बीच चुनाव करना पड़ता है। सभी की भलाई के लिए।

ज़ेन गुरू डोगन के शिष्यों ने एक बार एक हिरण, जो बहुधा मठ में आ जाया करता था, को खाना डालना शुरू कर दिया। पहले तो वह पशु हिचकिचाया किंतु तुरंत ही वह भिक्षुकों का मित्र बन गया। जैसे ही डोगन को पता चला, उन्होंने हिरन को पत्थर फेंक कर ज़ोर से मारा। भिक्षुक, अपने गुरू के हिंसक कृत्य को देखकर सकते में आ गये। उन्होंने उनसे पूछा कि यह तो कोई करुणा न हुई।

“तुम्हें क्या लगता है कि तुम क्या कर रहे थे?” उन्होंने अपने शिष्यों को फटकार लगायी। “आज तुम इस हिरण से मित्रता कर रहे हो और वह मनुष्यों पर विश्वास करने लगेगा। कल, वह किसी शिकारी के पास चल कर जाएगा और मारा जाएगा। यह दया नहीं, वरन मूर्खता है। यह जंगल का जानवर है और जंगलों में रहना जानता है। इसे वहीं रहने दो।”

चाणक्य हो या डोगन, मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं इससे बेहतर उदाहरण नहीं दे सकता हूँ। आप सदैव प्रीतिकर शब्द नहीं बोल सकते या दूसरे के हृदय को धड़काने वाले शब्द नहीं कह सकते। क्योंकि कभी-कभी आपको लाभदायक शब्द कहने पड़ सकते हैं जो शायद दूसरे व्यक्ति को प्रीतिकर न हों। उनकी भलाई के लिए आप प्यारा या सहायक होने के बीच चयन कर सकते हैं।

यह असंभव है कि आपके सारे निर्णय या वार्तालाप सुखकर, प्रीतिकर या आनंदप्रद होंगे। इन निर्णयों को टालने का यह कारण नहीं हो सकता। जब आप अस्वीकार करने का या स्वीकार करने का चयन करते हैं (विशेषकर अभिभावक-बच्चा संबंध में) जबकि आपको अपनी बात पर दृढ़ रहना चाहिए तो आप अपने बच्चे की मदद नहीं कर रहे। नहीं, मैं आपको यह सुझाव नहीं दे रहा कि या तो आप कठोर रहें या नर्म। मात्र सजग रहें। एक संतुलन बनाए रखने का प्रयास करें।

करुणा का यह अर्थ नहीं कि आप दूसरों को स्वयं के साथ दुर्व्यवहार करने का, शोषण करने का या अपमान करने का अधिकार दे दें। जहाँ दृढ़ होने की आवश्यकता है वहाँ दृढ़ रहें, किंतु जैसा कि चाणक्य ने कहा है कि यदि हमें किसी का सामना भी करना पड़े तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसे कैसे करना है। बहुधा बात यह नहीं होती कि आपने क्या कहा है किंतु महत्व इस बात की है कि कैसे और कितना कहा गया है। और जब आप कहते हैं तो ऐसा अवश्य होता है।

आप कैसे, कितना और कब की चिंता करें और फिर कौन या क्या का अधिक महत्व नहीं रह जाएगा। क्या यह वह बात नहीं जो कुछ महान लोगों के जीवन से सीखी जाए? ईसा मसीह के विषय में, बुद्ध के विषय में, मार्टिन लूथर किंग और गाँधी के विषय में सोचें। आप दूसरे को चोट पहुँचाए बिना अपनी बात रख सकते हैं।

मुल्ला नसरूद्दीन अपनी पत्नी के साथ एक लम्बी यात्रा कर रहा था। वे एक सराय में रात बिताने को ठहरे जहाँ एक छोटा सा भोजनालय था। जबकि मुल्ला की पत्नी सोच रही थी कि क्या खाया जाए, एक मच्छर मुल्ला के कानों में भिनभिनाने लगा। चटाक और मुल्ला ने एक ताली बजाकर उसे मार दिया।

“तुम कितने क्रूर हो” उसकी पत्नी ने तिरस्कारपूर्वक कहा, “तुममें जीवित प्राणियों के लिए कोई दया नहीं है। ऐसा तो नहीं था कि वह तुम्हें मार ही देता किंतु देखो, तुमने उसे कैसे कुचल डाला।”

मुल्ला को बहुत बुरा लगा और एक पल के लिए उसने सोचा कि उसकी पत्नी सही कह रही थी। उसने अभी अभी एक निर्दोष कीड़े का मार दिया था।

“आप क्या खाना पसंद करेंगे” बैरे ने पूछा।
“जब सूची में मुर्गा हो,” मुल्ला की पत्नी ने पट की ओर संकेत करते हुए कहा, ”तो मैं कुछ और कैसे खा सकती हूँ। एक बडा बटर चिकन और कुछ कबाब भी।”

दूसरों को उपदेश देना या समझना कि वे गलत हैं, यह आसान है। जैसा कि लोग कहते हैं, हम अपने दोषों के प्रति एक वकील के जैसे और दूसरों के दोषों के प्रति एक न्यायाधीश के जैसे व्यवहार करते हैं।

आप आमना सामना कर सकते हैं बोल सकते हैं किंतु गहरे अंतर में विचार करने के लिए, एक पल लें। क्या आप जो कहने जा रहे हैं उसे वास्तव में कहना ही है? अभी? उन शब्दों में जैसा आप कहना चाहते हैं? जितना कि आपका आशय है इतना ही? क्या यह लाभदायक होगा? क्या इससे आपका उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा? यदि इन सभी का उत्तर हाँ है, यदि आपने अच्छी तरह सोच लिया है, आगे बढ़िये और अपने शब्दों को अच्छी तरह पिरो कर सामने रखिये। ऐसी परिस्थितियों में आनंदप्रद होने से बेहतर, सहायक होना है।

यदि आप सुखों और हितों के प्रति सजग हैं यदि आप सच्चे हैं, तो आपके शब्द कुछ अंतर ला पाएंगे। सत्य सदैव ऐसा ही करता है। वास्तव में मात्र सत्य ही ऐसा करता है।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - When Your Words May Hurt…