क्या आपने यह ध्यान दिया है कि जब हम किसी को कुछ देते हैं, या जब हम किसी के लिये कुछ अच्छा कर पाते हैं, तो स्वयं कितना सुख अनुभव करते हैं? यदि दूसरा व्यक्ति हमारी भेंट की कद्र करता है या प्रतिदान करता है तो यह प्रसन्नता की अनुभूति कई गुना बढ़ जाती है। यहाँ तक तो सब ठीक है। परंतु कई बार अच्छा करने के बाद भी जो प्रतिदान की आशा हमें होती है, वह हमें प्राप्त नहीं होता। आप उनके लिये जो भी कर रहे हैं वे उसकी सराहना नहीं करते, या फिर वे उसकी परवाह नहीं करते या फिर वे इस से बेहतर कुछ करना नहीं जानते। स्थिति और बुरी हो जाती है जब उन्हें लगता है कि वह कार्य करना तो आप का उत्तरदायित्व है।

जब हमें वास्तव में अर्जित किए की तुलना में अधिक श्रेय दिया जाता है, तब हम कदापि असंतोष प्रकट नहीं करते। हम यह भी सोचते हैं कि हम दूसरे व्यक्ति द्वारा प्राप्त अतिप्रशंसा और आराधना के योग्य हैं। परंतु, जब हमें लगता है कि हमारे प्रयासों, दान या उदारता की कोई अभिस्वीकृति नहीं हो रही है, तब हम निराश हो जाते हैं। यह झुँझलाहट घटती नहीं है। अगली बार जब हम उस व्यक्ति को देखते हैं तब हमें उसकी अकृतज्ञता याद आ जाती है।

यह अधिकतर सभी संबंधों में झगड़े का प्रमुख कारण है। या तो आप यह अनुभव करते हैं कि आप अपने अनुमान से अधिक कर रहे हैं और दूसरा व्यक्ति इसकी अभिस्वीकृति नहीं कर रहा है या दूसरे व्यक्ति को जितना करना था वह उससे कम कर रहा है और इसलिये जिम्मेदारी से कार्य नहीं कर रहा है। किसी भी स्थिति में, इसकी जड़ में यह भावना है कि “मेरा उपयोग किया जा रहा है या मेरी कद्र नहीं की जा रही है”।

मेरे आज के लेखन का केंद्र किसी संबंध में प्रतिदान से नहीं है परंतु यह सेवा के प्रति आपके दृष्टिकोण पर है। यदि हम दान, दया या दूसरों की सेवा पर अपना दृष्टिकोण परिवर्तित कर लें तो हमारी अधिकतर समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। क्या होगा यदि हम पासा पलट दें? कुछ अधिक कहने से पूर्व मुझे एक प्रसिद्ध कहानी साझा करने दें।

भारत के दो महान संत, जो कि शानदार कवि भी थे, समकालीन मित्र थे। ये थे हिंदू आध्यात्मिक गोस्वामी तुलसीदास और दूसरे थे अब्दुल-रहीम खानखाना। रहीम, अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। वे समुचित कमाते थे और अपनी व्यक्तिगत आय से बहुत कुछ नियमित रूप से दान किया करते थे।

प्रतिदिन लोग उनके पास अपनी समस्याएं लेकर आते और वे जो भी बन पड़ता, दे देते। रहीम का अनोखापन गरीबों को दान देने की उनकी विशेष विधि में था। जब भी वे दान देते वे अपनी आँखें नीची रखते और कभी भी लोगों से आँखें नहीं मिलाते।

तुलसीदास ने एक बार रहीम को पत्र लिखकर मित्रवत विधि से उन्हें यह पूछते हुए छेड़ा कि वे दान करते समय अपनी आँखें नीची क्यों कर लेते हैं? क्या ऐसा इसलिये कि उन्होंने विधिपूर्वक नहीं कमाया है या कि वे अपनी दूषित आय देने से शर्मसार हैं। व्यंग्य पूर्वक उन्होंने लिखा –

ऐसी देनी देन ज्यों, कित सीखे हो सैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचे करो, त्यों-त्यों नीचे नैन॥

“मित्र तुम ऐसे दान क्यों देते हो? ऐसा तुमने कहाँ से सीखा? (मैंने सुना है) कि जैसे जैसे तुम अपने हाथ दान करने के लिये उठाते हो, वैसे वैसे अपनी आँखें नीची कर लेते हो।”

रहीम भी कुछ कम न थे, और उन्होंने एक चतुर उत्तर लिखा जो नम्रता, बुद्धिमत्ता और चतुराई से परिपूर्ण था।

देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, तासो नीचे नैन॥

“देने वाला तो कोई और (ईश्वर) हैं जो दिन रात दे रहे हैं। जबकि लोग समझते हैं कि देने वाला मैं हूँ, इसलिये अपनी आँखें झुका लेता हूँ।”

अद्वितीय! मैं सोचता हूँ दान के प्रति हमारी प्रवृत्ति पर इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। क्या हो, यदि एक क्षण के लिये हम अपने ध्यान में रखें कि जो हम दे रहे हैं, वह हमने अर्जित किया हो सकता है, परंतु सत्यता में हम इसके साथ पैदा नहीं हुए थे। संभवतः हमारे पास जो कुछ भी है, किसी और का दिया हुआ है। कदाचित हमारे शिक्षक, माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, समाज, शासन, प्रकृति या कुछ और माध्यम रहे होंगे।

इसी प्रकार यदि सदैव नहीं तो बहुधा हम लोग मात्र एक माध्यम हैं। जो हमसे कुछ पा रहा है यह आवश्यक नहीं कि इसलिये पा रहा हो क्योंकि हम उदार हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी कुछ उधारी शेष हो। कदाचित उन्होंने यह अपने कर्मों से कमाया हो और हमें अपने कर्मों का हिसाब बराबर करना हो। विशेषकर जब आप अपनी पसंद से नहीं वरन बाध्यता से देते हैं, तब अधिकतर संभावना यह है कि आप एक पुराना कार्मिक ऋण चुका रहे हैं। ऐसे में शांत रहें। क्रुद्ध न हों। जितने शीघ्र आप इसे चुकायेंगे उतने शीघ्र इससे छुटकारा पा लेंगे।

चाहे आप अपनी इच्छा से दे रहें हों या नहीं, सत्य तो यह है कि आप मात्र एक माध्यम हैं। हम सभी मात्र माध्यम हैं। यदि हम विभिन्न धर्मों के विभिन्न ग्रंथों में एक समान लक्षण को देखें तो वह यह शिक्षा है कि हम सभी ईश्वर के हाथ के यंत्र हैं। कुछ, दूसरों से अधिक पवित्र और प्रबल माध्यम हैं, बस यही महत्वपूर्ण है।

कल्पना करें कि आपको १००० लिटर पानी भरना है और आपके पाइप के मुख का व्यास मात्र दो सेंटीमीटर है। तो अधिक समय लगेगा। वह भी तब यदि यह मानकर चलें कि कहीं कोई रुकावट नहीं है। अब कल्पना करें कि आपके पाइप का मुख बीस सेंटीमीटर चौड़ा है। तो उसी मात्रा के पानी को निकालने में आपको कुछ ही पल लगेंगे।

कर्मों के लिये भी कुछ ऐसा ही है। जब आपको एक कार्मिक ऋण चुकाना है तो आप जितना अधिक और जितनी शीघ्र अदा करेंगे, उतनी ही शीघ्र आप उसे चुका पाएंगे। जितनी अधिक रुकावटें होंगी, उतना अधिक समय लगेगा। ये बाधाएं गलत विचार (कि मैं ही कर्ता व दाता हूँ), गलत अपेक्षाओं (कि मैं किसी के लिये कुछ करके उन पर ऋण चढ़ा रहा हूँ), गलत भावनाओं (मेरे दान को कम आंका गया), इत्यादि हो सकतीं हैं।

यदि हर समय हम यह याद रखें कि किसी को कुछ देने में समर्थ होना एक विशेषाधिकार, सौभाग्य है तो यदि दूसरा व्यक्ति प्रतिदान न करे तो भी हमें कष्ट नहीं होगा। जब हम कुछ दे सकने में समर्थ हैं तो इसका अर्थ यह है कि प्रकृति ने हम पर विशेष विश्वास किया है। प्रकृति को विश्वास है कि हम इतने समर्थ हैं कि किसी को कुछ दे सकें। इस आशीर्वाद के लिये हम कभी भी पूर्णतः कृतज्ञ नहीं हो सकते। आप क्या पसंद करेंगे? कोई जो कुछ लेता है (कृतज्ञ होकर या न होकर) या वह जो नम्रता और दया से कुछ देता है। स्वयं चुनाव करें।

जब आप बिना किसी आशा के कुछ देते हैं (यह सरल नहीं है किंतु अवश्य संभव है), तो प्रकृति आपको आशीर्वाद देती है। यदि आप पीछे नहीं हटते तो वह भी पीछे नहीं हटेगी। इसके अतिरिक्त प्रकृति से सीखने योग्य कुछ और भी है। वह है, एक प्रकार की निर्लिप्तता एवं धैर्य से प्रदान करना। संभवतः देने की अनंतता का यही रहस्य है। एक झरने या एक नदी को देखें। यह बिना किसी भेदभाव के दे रही है, निरंतर। याद रखें कि आध्यात्मिक तौर पर यह संबंध देने वाले और लेने वाले के बीच नहीं है। यह देने वाले और उसकी आत्मा के बीच संबंध है। यदि आपका स्वयं के साथ सच्चा और अर्थपूर्ण संबंध है, तो बड़ी शीघ्रता से जीवन में सभी कुछ अमुख्य हो जाता है।

कृतज्ञता के साथ दान करना एक आध्यात्मिक कर्म है जबकि अपेक्षा के साथ दान करना केवल एक व्यापार है।

अगली बार यदि आप दान करें और दूसरा व्यक्ति प्रतिदान न करे तो इससे निराश न हों। आप उनसे कुछ अपेक्षा या मांग करने की बजाय उन्हें अपनी अच्छाई और दान से भर दें। अंतत यही काम करेगा। विशेषकर यदि आप स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं और स्वयं को मुक्त करना चाहते हैं, जो कि, मैं कहूँगा, हमारे पूर्ण अस्तित्व और मेरे लेखन का मूल लक्ष्य है।

शांति।
स्वामी

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