एक दिन किसी ने मुझसे पूछा कि हमारे अपने ही हमें सर्वाधिक पीड़ा क्यों देते हैं? यदि आप मुझसे पूछें तो यह एक प्रश्न नहीं है, आपितु यह एक तथ्य है, चूंकि केवल आपके अपने ही आपको सर्वाधिक पीड़ा दे सकते हैं। वे जो आपको जानते नहीं, आपको कष्ट तो दे सकते हैं किन्तु वे आपको भावनात्मक पीड़ा नहीं पहुंचा सकते। टूटे हुए रिश्तों में एक ऐसा बिन्दु आ जाता है जब दो लोग उस रिश्ते की परवाह करना छोड़ देते हैं। वे थक चुके होते हैं। दूसरे व्यक्ति से सारी उम्मीदें छोड़ देने के उपरांत वे एक दूसरे के प्रति उदासीन हो जाते हैं। उस उदासीनता की स्थिति में वे अजनबी जैसा महसूस करने लगते हैं। ऐसे में पीड़ा का अनुभव होना बंद हो जाता है, चूंकि अंजान लोग आपको पीड़ा नहीं दे सकते।

इतना कहने के पश्चात, किसी रिश्ते में ऐसी स्थिति उपजने से पूर्व कि जहां ऐसी उदासीनता स्थान बना ले, व नुकसान किसी भी तरह के समझौते से परे हो, वह रिश्ता अनेकों थपेड़े सह चुका होता है। हर बार जब आप को कोई दुःख पहुंचाता है, आपके अंतर से एक छोटा हिस्सा टूट कर बिखर जाता है। आप, स्वयं को जोड़ते हैं, इस संकल्प के साथ कि सामने वाले को प्रेम से जीत लेंगे अथवा उसे बदल देंगे, किन्तु हर नयी चोट के साथ आप थोड़ा और टूटते जाते हैं। जिस प्रकार कसी हुई मुट्ठी में से रेत निकलती जाती है, आप भी जितना अधिक स्वयं को जोड़े रखने का प्रयास करते हैं, उतनी शीघ्रता से आप स्वयं को खोते चले जाते हैं। और, एक दिन आप अपने को दूसरे व्यक्ति के प्रति किसी भी भावना से रिक्त पाते हैं। उस दिन आप उनके लिए अजनबी बन जाते हैं, और कुछ हद तक स्वयं के लिए भी।

आप स्वयं को दर्पण में देखते हैं, किन्तु आपका वह पहले वाला रूप, वह खुशमिजाज़ आप, कहीं दिखाई नहीं देता। आप दर्पण में वही शरीर तो देखते हैं किन्तु आपको वही पुराने वाला अपना आप महसूस नहीं होता। यह एक दुःखद स्थिति है क्योंकि आप स्वयं को खो चुके हैं और जब तक आपको प्रेम का संकेत पुन: नजर नहीं आता, तब तक भावना रूपी लहरें आपके जीवन की कश्ती को हिलाती डुलाती रहेंगी। यह नए प्रकार के भाव हैं, उदासी के नए उभार, अकेलेपन के एहसास, ये अंजान भावनाएँ हैं। आप स्वयं को मेले में खो गए किसी बालक की भांति महसूस करते हैं, भीड़ में भी अकेले, पूर्ण रूप से अजनबी। और अजनबी के प्रति कोई गूढ़ भाव आप कैसे महसूस कर सकते हैं? नहीं कर सकते। और, क्षमा करना पीड़ा के ही जैसा एक गूढ़ भाव है। वह आप केवल अपनों के लिए महसूस कर पाते हैं।

किसी धार्मिक ग्रंथ के पठन में गहरे तल्लीन, रब्बी कागन (Rabbi Kagan), कोफेट्ज़ चेम (Chofetz Chaim) नाम से अधिक जाने जाने वाले, एक बार रेल यात्रा कर रहे थे। समीप बैठे तीन यहूदियों (Jews) ने उन्हें ताश खेलने को आमंत्रित किया, चूंकि उन्हें एक चौथे व्यक्ति की खेल में आवश्यकता थी। रब्बी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि ताश के स्थान पर वे पढ़ना अधिक पसंद करेंगे। उन तीन यात्रियों को इस बात की बिलकुल जानकारी नहीं थी कि जिस अजनबी से वे बात कर रहे हैं वह सुविख्यात कोफेट्ज़ चेम स्वयं थे। उन तीनों ने उन्हें बार बार मनाने का प्रयास किया, और, अंततः वे विक्षुब्ध हो कर पगला से गए। उनमें से एक ने रब्बी के चेहरे पर ज़ोर से मुक्का मारा व शेष दोनों हँसते हुए परिहास करने लगे। रब्बी ने अपने घाव को दबाने के लिए तत्काल अपना रुमाल निकाला, किन्तु तब तक दो-तीन बूंद रक्त रिस कर उनकी पुस्तक पर गिर चुका था।

कुछ घंटे पश्चात गाड़ी स्टेशन पर पहुंची। उन संत के स्वागत हेतु वहाँ बहुत से लोग पहले से ही एकत्रित थे। जब रब्बी गाड़ी से उतरे, उनका चेहरा चोट से सूजा हुआ था, तो श्रद्धालुओं ने जानना चाहा कि ऐसा कैसे हुआ। रब्बी ने उनके प्रश्न को अनसुना किया व आगे बढ़ गए। वह तीन दोषी यह जानकार अपराधबोध से ग्रसित हो गए कि उन्होंने मात्र किसी बूढ़े व्यक्ति को नहीं मारा अपितु वह तो “कोफट्ज़ चेम” थे।

अगले दिन वे तीनों क्षमा-प्रार्थना करने, उनके निवास पर पहुंचे। पश्चाताप व ग्लानि से भरे उन्होंने याचना की कि उन्हें क्षमा कर दिया जाये। किन्तु रब्बी नहीं माने व उन्होंने तीनों को क्षमा रूपी उपहार से वंचित ही रखा। रब्बी का पुत्र जो इस सब का साक्षी था, अत्यंत अचंभित हुआ। किसी भी संत का यह धर्म होता है कि वह दूसरे को क्षमा करे। दोषियों ने पुन: याचना की किन्तु रब्बी ने पुन: इंकार कर दिया। एक भारी मन के साथ वे सब वहाँ से लौट गए।

“पिताजी”, रब्बी का पुत्र बोला, “मुझे यह कहने के लिए क्षमा करें, किन्तु मुझे लगा कि आपका व्यवहार कुछ क्रूर सा था। आप आध्यात्म की साक्षात मूरत हैं, सम्पूर्ण समाज आपको पथ-प्रदर्शक के रूप में देखता है। आपने उन लोगों को क्षमा क्यों नहीं किया”?
“तुम सत्य कह रहे हो पुत्र,” रब्बी बोले, “उन्हें क्षमा न करना मेरे लिए व्यवहारोचित नहीं था, किन्तु सत्य यह है कि उन्हें क्षमा प्रदान करना मेरे अधिकार-क्षेत्र में नहीं था”।
“हाँ, मैं रब्बी कागन, प्रख्यात कोफेट्ज़ चेम, उन्हें अवश्य ही क्षमा करता हूँ, किन्तु मेरी क्षमा का कोई औचित्य नहीं। उन्होंने जिस व्यक्ति को चोट पहुंचाई थी, उन लोगों की दृष्टि में वह साधारण सा एक वृद्ध था, कोई बूढ़ा-निर्धन, जिसके लिए श्रद्धालुओं की कोई भीड़ प्रतीक्षारत न थी। वास्तव में पीड़ित वह था और केवल वह साधारण व्यक्ति ही उन्हें क्षमा प्रदान कर सकता है। उन्हें जा कर उस व्यक्ति की खोज करने दो। मैं उन्हें उनकी आत्म-ग्लानि से बाहर नहीं ला सकता।”

कुछ माह पूर्व मैंने ब्लॉग में लिखा था कि क्षमा कर पाना सर्वाधिक कठिन भाव है। यह ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है चूंकि आप एक अजनबी बनकर क्षमा नहीं कर सकते, आप उन्हें एक नए व्यक्तित्व के साथ माफ नहीं कर सकते। क्षमा करने के लिए आपको उस घाव को पुन: उघाढ़ना होगा, आपको पुन: बूढ़ा व्यक्ति बनना होगा। जैसे ही यादों की हवा झूठे वायदों कि राख़ उड़ा ले जाती है तो सिसकती भावनाओं की चिंगारियाँ पुन: भड़क उठती हैं। वे भाव जो आपको लगा था कि बहुत पहले मर चुके थे – पुन: सजीव हो उठते हैं, किन्तु एक नवीन व्यक्तित्व लिए हुए, अब आप उनका सामना करने से हिचकते हैं। आप फिर से उस दर्द को झेलना नहीं चाहते।

किन्तु क्षमा करने के लिए यह आवश्यक है कि आप एक बार पुन: उस दर्द को झेलें, एक अंतिम बार, उसे सदा सदा के लिए समाप्त करने की खातिर। यह आपके घाव को पूरी तरह ठीक करने का अंतिम उपचार है। इसके लिए आवश्यक है कि आप अपनी नई प्राप्त सामर्थ्य एवं उदासीन रवैये को किनारे रखें व स्वयं को एक अंतिम बार उसी पुरानी कमजोर मानसिक स्थिति, असुरक्षा एवं अविश्वास कि भावना को महसूस करने दें। आपको अपने पुराने, पीछे छोड़ आए जूतों में फिर से पैर रखना होगा व एक बार फिर से वह सब जानना-समझना होगा। जिस किसी ने भी आपको दुःख दिया था, उससे आपको पुन: संबंध स्थापित करना होगा; उसे एक और बार अपना समझना होगा, चूंकि अजनबी दुःख दे नहीं सकते व अजनबी क्षमा कर नहीं सकते।

मुल्ला नसरुदीन ने एक बार अपनी पत्नी से धोखा किया, और पत्नी को इस बात का पता चल गया। उसे अत्यंत दुःख हुआ और वह उस पर बहुत क्रोधित हुई, मानो उसके चीथड़े उघाड़ कर, फ्रेम करवा कर, घर के अतिथि कक्ष में सजाने को तत्पर, वहाँ जहां पहले उनके विवाह की तस्वीर टंगा करती थी! मुल्ला ने क्षमा मांगी, पत्नी ने माफ कर दिया, और दोनों में सुलह हो गई।
किन्तु आने वाले 20 वर्ष तक, हर संभव अवसर पर, वह मुल्ला को उसके कारनामे की याद करवाती रहती।

जब मुल्ला से और नहीं सहा गया तब एक दिन वह बोला, “तुम वह सब बार बार क्यों कहती रहती हो? मुझे लगा था कि तुम ‘माफ करो और भूल जाओ’ में विश्वास करती हो।”
“हाँ, ऐसा ही है” वह बोली, “मैं बस तुम्हें यह नहीं भूलने देना चाहती कि मैंने तुम्हें माफ किया है व भूल गई हूँ!”

वास्तविकता यह है कि आप कभी भी अपनों को भूल सकते ही नहीं। आप केवल अजनबी लोगों को भूल सकते हैं। किन्तु क्षमा करने के लिए आपको एक और बार उन्हें अपनाना होता है। और जब आप ऐसा करते हैं, उदासीनता अलग हट कर प्रेम व अन्य भावनाओं को स्थान दे देती है। यह सब आपको एक बार पुन: दुःख पाने के लिए तैयार कर देता है। यह सब बहुत हद तक चक्रीय है। आप प्रेम करते हैं, आपको दुःख मिलता है; आप आपस में ताल मेल बैठाते हैं या समझौता करते हैं; आप उन्हें पुन: प्रेम देते हैं और आपको फिर से दुःख मिलता है। यह सब लगभग अपरिहार्य है। यही कारण है कि लोग दुर्व्यवहार से भरे रिश्तों को निभाने में अपना पूरा जीवन व्यय कर देते हैं जबकि उनके पास वह सब छोड़ बाहर आने का विकल्प मौजूद होता है।

किसी रिश्ते में दुःख से बचे रहने का एक ही मार्ग है कि दूसरे व्यक्ति को जैसा वह है उसी रूप में शत प्रतिशत स्वीकार किया जाये, और, मैं आपको बताना चाहूँगा कि ऐसा अतिशय विरले ही होता है। यदि आप उदासीन हो जाते हैं तो वह रिश्ता अंतरंग नहीं रह पाएगा, और यदि आप अंतरंग हैं तो पुन: दुःख मिलना स्वाभाविक रूप से निश्चित है। यह जीवन एक अजब पहेली है, और शायद गज़ब भी। जितना अधिक आप दूसरों का ध्यान रखते हैं उतना अधिक आप स्वयं संवेदनशील हो जाते हैं। और, जितना अधिक आप संवेदनशील होंगे, उतना अधिक आपको दुःखी होना पड़ेगा।

आप दुःख अनुभव करते हैं चूंकि आप मनुष्य हैं, और वे आपको दुःख पहुँचाते हैं चूंकि वे मनुष्य हैं। यदि उनकी अच्छाइयाँ उनकी बुराइयों से अधिक हो जाएँ तो खुशी मनाएँ व अपने को अंतर्मुखी कर लें ताकि आप कुछ कम भेद्य बन पाएँ। यदि उनकी बुराइयाँ अच्छाइयों पर हावी हो जाएँ तो ऐसे में क्षमा करें व आगे बढ़ जाएँ।

आपके अपने आपको कष्ट पहुंचायेंगे, चूंकि प्रेम का यह अर्थ नहीं कि आपको कभी भी किसी भी बात से दुःख नहीं होगा। बल्कि, इसका अभिप्राय यह है कि ऐसी दशा में भी दूसरे की अच्छाइयों को न भूलना, जब वे आपको कोई दुःख पहुंचाएँ। कभी हल्की बौछार पड़ेगी और कभी बहुत तेज वर्षा होगी। कभी तो बर्फ गिरेगी और कभी ओलावृष्टि। अंततः तो सब जल ही है। सब कुछ बह जाने दें।

यदि आप यह सब एकत्रित कर रख लेंगे तो जीवन एक ठहरे हुए तालाब की भांति हो जाएगा – जो समय के साथ साथ और गंदला होता जाएगा। यदि आप सब कुछ आगे बढ़ने देते हैं तो यह एक सुंदर, स्वच्छ, सौम्य, नदी की भांति बहता रहेगा। इसे ऐसे ही बहने दें।

शांति।
स्वामी