एक दिन मुझे एक महिला का ई-मेल प्राप्त हुआ जिन्हें मैंने गत वर्ष दीक्षित किया था। वह आध्यात्मिक मूल्यों को अपने में आत्मसात करने एवं अन्य लोगों तक उन्हें पहुंचाने के दिव्य कार्य के प्रति अत्याधिक समर्पित हैं। तथापि, कुछ समय पूर्व उनकी श्रद्धा एक और गुरु के प्रति हो गई, जो अब अपने देहरूप में नहीं हैं। वह एक श्रद्धालुओं के समूह द्वारा उनसे जुड़ी थीं जिन्होंने अपने अनुभव इत्यादि उनके साथ साझा किए। स्वाभाविक रूप से, इस सब ने उन्हें इन गुरु की शक्तियों के विषय में विचार मंथन में व्यस्त कर दिया और उसके कुछ समय पश्चात ही उन्हें अपने जीवन में उनकी उपस्थिति का आभास होने लगा। यहाँ तक ठीक है।

अभी कुछ दिन पूर्व, उन्हें अपना अनुभव मेरे साथ साझा करने की आवश्यकता लगी और यह बताने की कि वह अभी भी मुझे मानती हैं। कि, वे मुझे उन गुरु के समकक्ष देखती हैं और वे दो गुरु पा कर अति प्रसन्न हैं। “मैं अभी भी आप के प्रति समर्पित हूँ” उन्होंने लिखा। दूसरे गुरु के साथ एक जोश से भरपूर भक्तों का समूह है और उनके शहर में उनके एकत्रित होने का एक स्थान भी है। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं इस स्थिति से सहज हूँ।

वह पहली व्यक्ति नहीं हैं जो इस तरह की स्थिति का अनुभव कर रही हों, और न ही उनका ई-मेल ऐसा प्रथम ई-मेल है। मैं बहुत से लोगों से मिलता हूँ जो दूसरे गुरुओं से होकर मेरे पास आते हैं और ऐसे भी जो दूसरों के लिए मुझे छोड़ देते हैं। और, ऐसे भी अनेकों हैं जिनके एक से अधिक गुरु हैं। भले कुछ भी हो, यदि इस सब का आपके लिए महत्व है, तो मैं इससे पूर्णतः सहजता में हूँ। आप के द्वारा मुझे किसी विशिष्ट रूप से देखने की आवश्यकता नहीं। इससे पूर्व कि मैं आपको यह बताऊँ कि मैंने उन्हें क्या कहा, कृपया मुझे “ज़ेन फ्लैश, ज़ेन बोंज” (1919) में से एक प्रसिद्ध ज़ेन कोन साझा करने दें।

जब भिक्षुणी चियोनो इंगकु ने भूक्कू के संरक्षण में ज़ेन शिक्षा प्राप्त की, वे एक लंबी अवधि तक ध्यान का फल पाने में विफल रहीं।

अंततः, चाँद की रौशनी से आच्छादित एक रात्रि में वह बेंत से बंधी एक पुरानी हांडी में जल ले कर चल रहीं थीं। बेंत टूट गया और हांडी का तला अलग हो कर गिर गया, और उस क्षण चियोनो मुक्त हो गई! इस घटना के कीर्तिगान हेतु उन्होंने एक कविता लिखी –

इस तरह से मैं पुराने बर्तन को संभालती रही
चूंकि बेंत की तार कमजोर हो रही थी
और, बस, टूटने भर को थी
जब तक कि अंत में
तला ही नीचे गिर गया
अब, न हांडी में जल ही रहा
और, न ही जल में चाँद!

मैंने उन्हें लिखा कि स्वामी न तो कोई प्रस्ताव रखते हैं, न कुछ थोपते हैं, अथवा समाप्त करते हैं। कि, वे अपने मन की बात सुनने के लिए स्वतंत्र महसूस करें। मैंने स्वयं को कभी भी गुरु नहीं कहा। मैं स्वयं को “गुरु” रूप में कभी भी संबोधित नहीं करवाता, केवल उन चार लोगों को छोड़ कर, जिन्हें मैंने सन्यास के पथ पर दीक्षित किया है। बाकी सब के लिए, जब मैं उन्हें दीक्षित करता हूँ तो वह मात्र आभासी-दीक्षा है। वास्तविक दीक्षा से पूर्व का चरण, जब मैं उन्हें कहता हूँ कि वे मुझे जैसा चाहें वैसा देखने व मानने में स्वतंत्र हैं। किन्तु, अन्ततोगत्वा, उन्हें अपने स्वयं के सत्य का अनुसंधान अवश्य करना चाहिए। मेरे मार्ग की दीक्षा के सात स्तरों में से, यदि कोई सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंचा है (उनको भी सम्मिलित करते हुए जो सन्यास के पथ पर हैं), वह है तीसरा स्तर।

तत्पश्चात, या तो उनका उत्साह कम हो जाता है, अथवा तो वे पथ से दूसरी ओर आकर्षित हो अन्यान्य निम्न कोटि के कारणों में अटक जाते हैं जो उनकी मुक्ति के पथ से असम्बद्ध हैं, लेकिन उनके व्यक्तिगत अहम के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं। एक व्यक्ति, जो एक बार ब्लॉग पर लिखे मेरे विचारों से अप्रसन्न हो गए थे, उनसे मैंने कहा, “कृपया मुझे मात्र एक ब्लॉग-लेखक के रूप में देखें। जो आपको अच्छा लगे वह ले लें व शेष छोड़ दें।” यदि आपने पहले से ही कोई एक राय बना रखी है, अथवा तो यदि आप अपने (अथवा मेरे) धार्मिक या आध्यात्मिक रुझानों के चलते मुझे विलग करना चाहते हों तो ऐसे में मैं आपकी सहायता नहीं कर सकता । जब बात श्रद्धा की हो, ऐसे में आपको अपने चयन स्वयं करने में स्वतंत्र महसूस करना चाहिए व किसी अन्य को आप पर कुछ थोपने नहीं देना चाहिए। यदि आपका विश्वास आपको और अधिक उत्तरदायी, करुणाशील, दयालु, बना रहा है तो वह आपके लिए उत्तम है। अपने अन्तःकरण की आवाज पर चलें। यदि आप शांति का अनुभव कर रहे हैं तो इसके लिए आप में अपराधबोध नहीं आना चाहिए।

वहीं जाएँ जहां आपकी श्रद्धा आपको ले जाये। वहीं उठे-बैठें जहां आप चाहते हैं। “चूंकि जहां आपकी बहुमूल्य निधि है, वहीं आपका दिल भी होगा” (मैथियू 6: 21)।

अंततः, सब कुछ एक स्थान पर आकर सिमट जाता है – वह पुरानी हांडी – व्यक्ति का अहम भाव। अपने अहम भाव को तोड़ पाना कष्टजन्य है, किन्तु यही अपार स्वाधीनता का मार्ग है। एक इल्ली (कैटरपिलर) की भांति आप अपने कवच (ककून) से सरक कर बाहर निकलते हैं, व तितली बन कर उड़ने लगते हैं। यदि आप बर्तन को, उसे पकड़ने वाले से अधिक महत्व का मानते हैं, तो आप द्वारा अपनी ऊर्जा का अनुचित दिशा में जाना निश्चित है। यह मंदिर, अथवा वह देवालय, यह गुरु अथवा वह संत – इस सब से अंतिम चरण के विश्लेषण में कोई अंतर नहीं पड़ता। अन्त में, किसी भी मार्ग पर चलने के लिए आपको एक उत्तरदायी जीवन ही जीना होगा – आध्यात्मिक, भौतिक, अथवा दोनों।

प्रकृति के नियम हर प्राणी के लिए एक समान हैं। कोई भी गुरु, भले ही आप उसे किसी भी रूप में देखते हों, वह सेब के वृक्ष पर से आम कभी नहीं तोड़ सकता – यदि आप समझ सकें जो मैं कह रहा हूँ। आपका स्वयं का जीवन ही सबसे बड़ा चमत्कार है, आप स्वयं एक चमत्कार हैं। जिस प्रकार एक मधुमक्खी एक वास्तविक पुष्प से परागकण लेती है और पुन: अपने छत्ते में चली जाती है, आप भी जहां से मिले वहाँ से ज्ञान प्राप्त करने में स्वतंत्र अनुभव करें, बिना उसके धार्मिक अथवा प्रजातीय स्रोत को देखे, और उसे अपने ज्ञान के भंडार में एकत्रित करते रहें। जो स्रोत भी आपको भाता हो वहाँ से विद्या-विचार ग्रहण करने में कोई हानि नहीं।

आप अपने मन में अपने व्यक्तित्व के होने का जो भाव पाले रखते हैं वह उसी प्रकार अस्थायी है जैसे आपकी हांडी में चाँद की परछाई का होना। जीवन में एक ऊंची-नीची लहर, एक नन्ही सी हिलचाल, और सम्पूर्ण प्रतिबिंब छिन्न-भिन्न। जिस प्रकार वास्तविक चाँद वह वस्तु नहीं जिसे हांडी में पकड़ कर रखा जा सके, वैसे ही आपका वास्तविक रूप भी किसी गुरु अथवा किसी आस्था (इसे धर्म पढ़ें) द्वारा पकड़ा नहीं जा सकता। ये तो जब आप अपने असीमित अस्तित्व को एक छोटे से पात्र में ही सीमित कर लेते हैं तब वह परछाई ही वास्तविक का सा आभास देने लगती है।

आप हांडी तोड़ दें और वह सब जो आप अपने अंतर में पकड़ कर बैठे हैं, बाहर बह निकले । उस स्थिति में आप शून्य से भी आगे निकाल जाते हैं। न वहाँ कोई हांडी है और न ही जल। आप स्वतंत्र हैं। तब, व्यक्तिगत चेतना, अनंत से भी परे तक फैल कर, ब्रहमाण्डीय चेतना में विलय हो जाती है।

न जल; न चाँद।

अथवा तो जल नहीं तो चाँद नहीं। उस समय यह होता है आपका दृष्टिकोण।

शांति।
स्वामी