इस समय जब यह लेख मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित हो रहा है, मैं जाज़ेन में सत्य के 100 अन्य जिज्ञासु जनों के साथ एक ध्यान योग शिविर में बैठा हूँ, ज़ेन पर व्याख्यान देते हुए – ज़ेन – बिना मार्ग का मार्ग, किसी भी माध्यम के बिना का माध्यम। एक शांत झील के किनारे, जैसे जैसे क्षितिज में लालिमा बिखर रही है व एक पावन-पुनीत, शांत वातावरण की चादर हमारे बाह्य एवं अन्तः पटल को ढाँक रही है, मुझे लगा कि यही अनुरूप समय है ज़ेन पर अपने विचार साझा करने का।

मैं शोडो हारडा रोशी (Shodo Harada Roshi) की पुस्तक ‘मून बाय दा विंडो’ (Moon by the Window) के एक सुंदर सूत्र से प्रारम्भ करना चाहूँगा – ‘हाना वा हिराकु बंकोकु नो हारू’ (hana wa hiraku bankoku no haru) –

“एक अकेला पुष्प पल्लवित होता है और सम्पूर्ण जगत में वसंत का आगमन हो जाता है… ” ‘ज़ेन’ में प्रायः पुष्प शब्द से बुद्ध का संदर्भ लिया जाता है जिनके लिए कहा जाता है कि वे फूलों में पैदा हुए, फूलों में ही बौद्धत्व को प्राप्त हुए, एक फूल द्वारा ही धर्म को प्रसारित किया, और, फूलों में ही उनका देहावसान हुआ।

जब बोध वृक्ष के नीचे बुद्ध ने बौद्धत्व प्राप्त किया, उन्होंने भोर के तारे को देख उत्सुकता पूर्ण कहा, “अहो! कितना आश्चर्यपूर्ण! कितना चमत्कारिक! हर प्राणी उत्पत्ति के समय से उसी भव्य-निर्मल मन से सम्पन्न है जिसका बोध मुझे अभी अभी हुआ है!” उनचास (49) वर्ष पर्यन्त बुद्ध यह समझाते रहे कि हर प्राणी में बौद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है एवं जागृत होने का यह सुअवसर ही जीवन का गहनतम मूल्य है।

“हम सब भी बुद्ध की भांति फूलों में ही उत्पन्न व समाप्त हो सकते हैं, अपना जीवन बुद्ध की ही भांति परिष्कृत कर सकते हैं”

हाना वा हिराकु बंकोकु नो हारू
जब एक अकेला पुष्प पल्लवित होता है, सम्पूर्ण जगत में वसंत आ जाता है।

संक्षेप में यही ज़ेन है। जब हमारा मन शांत होता है, जब हम अंतर में प्रसन्न होते हैं तो हमारा सम्पूर्ण जीवन जगमग हो जाता है। और, यदि हमारा मन अस्वस्थ है तो चहूँ ओर उदासी व विषाद की अनुभूति होती है। जब मन रूपी पुष्प खिलता है तो चहूँ ओर वसंत है। प्रश्न यह है कि किस प्रकार यह सुनियोजित किया जाय कि हमारा मन रूपी पुष्प विकसित हो व सदैव खिला रहे? इस पुष्प की देख रेख किस प्रकार की जाए?

सोजेनजी नामक प्रख्यात ज़ेन मठ में बौद्ध गुरु जीसन जेंराइ जेंजी (Gisan Zenrai Zenji) ने एक बार अपने शिष्य को एक बाल्टी जल लाने के लिए कहा जिससे वह स्नान कर सकें। जीसन ने सदा से ही एक अतिसंयमी जीवन जिया था। वह जल की एक एक बूंद का मूल्य समझते थे चूंकि वह वर्षा के जल को एकत्र कर उसे उन दिनों के लिए संभाल कर रखते हुए ही बड़े हुए थे जब वर्षा के अभाव में जल संकट हो जाता था। जीसन द्वारा मठ के पेड़ पौधों, वृक्षों व जड़ी-बूटियों का पालन-पोषण व संरक्षण अपनी संतान की भांति इन्हीं कठिन परिस्थितियों में वर्षा के जल-संचयन द्वारा किया जाता रहा था।

वह नया शिष्य एक बाल्टी जल ले आया किन्तु जल बहुत गर्म था। जीसन अपने ध्यान सत्र के लिए विलंब नहीं चाहते थे अतः उन्होंने जल के ठंडा होने की प्रतीक्षा के स्थान पर एक और बाल्टी ठंडा जल मंगवाया। सोजेनजी के पिछले दरवाजे के निकट कुएँ से उनका शिष्य और जल ले आया। जल का तापमान सामान्य करने हेतु उसे कुछ और चक्कर लगाने पड़े। जीसन ने अपने सहायक से कहा की अब अतिरिक्त जल की आवश्यकता नहीं।

इस कथा को ‘मॉर्निंग ड्यू ड्रोप्स ऑफ द माइंड’ में वर्णित हारडा रोशी के ही शब्दों में समाप्त करते हुए –

ऐसा निर्देश प्राप्त होने के पश्चात उस सहायक भिक्षु ने बाल्टी में शेष बचे उस थोड़े से जल को लिया और पास में ही बिखरा कर, बाल्टी को उलट कर रख दिया। उसे ऐसा करते देख जीसन जेंराइ जेंजी चिल्लाये, “अरे मूर्ख! तुमने वह थोड़ा सा जल यूं ही मैदान में फेंक दिया और बाल्टी को उल्टा कर दिया।”

जीसन बोलते रहे, “जिस क्षण तुमने वह किया, तुम उसे केवल थोड़ा सा जल मात्र ही सोच रहे थे, इसीलिए उसे लापरवाही से फेंक दिया, है न यही बात? क्यों नहीं तुम इससे कुछ आगे सोच पाये, विशेषतः वर्ष के ऐसे समय जब तुम जानते हो कि इन दिनों वर्षा अल्प मात्रा में होती है? तुमने वह जल बगीचे के पेड़ पौधों या फूलों में क्यों नहीं डाला? यदि तुमने वह जल पेड़ पर डाला होता तो वह इस वृक्ष का जीवन बन चुका होता! यदि तुमने वह जल फूलों पर डाला होता तो वह उन फूलों का जीवन बन जाता और सदा के लिए जीवित रहता। तुम इस प्रकार के छोटे प्रयास को इतना तुच्छ कैसे मान लेते हो?”

इस प्रकार से कटु आलोचना द्वारा उन्होंने अपने शिष्य को बुरी तरह डाँटा। आगे बोलते हुए उन्होंने कहा, “जल की केवल एक बूंद में भी, भले ही वह बूंद कितनी भी छोटी हो, जल की महान गुणवत्ता बदलती नहीं है। यदि तुम जल की एक छोटी से बूँद में विद्यमान जल की इस महान गुणवत्ता को समझ नहीं सकते, तो भले ही तुम्हें जितना भी प्रशिक्षित क्यों न किया जाय, तुम वैसे व्यक्ति कभी नहीं बन पाओगे जो उस प्रशिक्षण का जीवन में उपयोग कर उसे जीवंत बना पाये।”

जीसन सदा से वर्षा द्वारा प्राप्त जल की अल्प बूंदों पर ही जिये थे। उस शिष्य ने उनका नाम बादल कर तेकीसुई रख दिया, जिसका अर्थ है – जल की एक बूंद।

मन की समता बनाए रखने का मार्ग स्वयं के विचारों के प्रति सदा सजग रहने से आरंभ होता है (संभवतः जीसन भी अपने शब्दों के प्रति और अधिक सजग रह सकते थे। व्यक्तिगत रूप से मैं कभी किसी पर इस प्रकार चिल्ला नहीं सकता अथवा उसे डांट नहीं सकता, भले ही कोई भी स्थिति/कारण हो)। जब आप स्वयं को अपने अशांत मन के साथ किसी रस्साकशी में उलझा हुआ पाएँ, केवल कुछ क्षण का विराम ले लें। कुछ गहरे श्वास लें। स्वयं से पूछें, “अभी इस पल मैं क्या विचार कर रहा हूँ?” चारों ओर दृष्टि डालें व आसपास की वस्तु-स्थिति के प्रति जागरूक हो जाएँ। वह कक्ष, दीवारों का रंग, साजो-सामान, किवाड़, खिड़कियाँ इत्यादि। अपने मन को विजयी होने दें। उसे रस्सी पकड़ने दें। अधिक युद्ध न करें। वरन उसके खेल के प्रति सचेत रहें। केवल बैठे बैठे इस बात पर ध्यान दें कि वह किस प्रकार से विचारों का सृजन कर रहा है। दर्शक बने रहें। वह धीमा होने लगेगा व स्वयं को स्थिर कर लेगा। जिस प्रकार एक अविरल बहते जलप्रपात की एक एक बूंद का अपना ही महत्व होता है, उसी प्रकार हमारे सदा-सर्वदा सक्रिय मन का हर एक विचार महत्त्व रखता है। मन का एकमात्र व्यवसाय है ‘सोचना’ और यह कार्य थकान भरा होता है। अपने विचार-क्रम के प्रति सचेत होना ही मन को शांत करने की दिशा में प्रथम पग है। और, मैं यहाँ जोड़ना चाहूँगा कि, बिना ध्यान दिये, सचेत रह पाना संभव नहीं।

एक सतर्क मन, बिना यत्न किए, एक स्वाभाविक स्थिति में, मानसिक, धार्मिक व बौद्धिक तंद्राओं से मुक्त, ही ‘ज़ेन’ का आधार है। बिना यत्न की सतर्कता ही केवल मात्र एक मार्ग है सदा वर्तमान क्षण में उपस्थित रहने का। ज़ेन की स्थिति तब होती है जब मन अपनी स्वयं की सत्ता के प्रति जागरूक रहता है। यह एक अविश्वसनीय स्तर की शक्तिशाली एवं शांतिमय भावना है – अपने मन के प्रति सचेत रहना एवं उसे समझना।

जैसा कि डी॰ टी॰ सुज़ुकी ने कहा था, “ज़ेन का प्रारूप है – जीवन को उसके बहाव के चलते ही पकड़ पाना।” यह ज़ेन को बहुत अच्छे से प्रतिपादित करता है। हमारा जीवन बहता जा रहा है, वह हमारे भीतर उत्साहपूर्ण प्रस्फुटित हो रहा है, जबकि हम इस चिंता में निमग्न हैं कि सब कुछ ऐसा होना चाहिए था, अथवा तो अब ऐसा होना चाहिए। हमारे पास हर प्रकार के विचार हैं, धारणाएँ, मत व ग्राह्यताएँ हैं, कि हम किस प्रकार के व्यक्ति अपने जीवन में चाहते हैं व किस प्रकार की परिस्थितियों में रहना चाहते हैं। संभवतः इसमें कुछ गलत नहीं। तथापि, कैसा होता यदि हम जीवन रूपी सरिता के साथ ही बहना सीख लेते? कैसा हो यदि हम मौन के उस मन-मंदिर में स्थिति पा लें जहां जागरूकता रूपी सुगंधि एवं ज्ञान रूपी प्रकाश अस्तित्व के हर छोटे से छोटे अंश को शोभायमान कर रहे हों? यदि आप यह देख पाएँ कि मैं आपको क्या समझाना चाह रहा हूँ तब वही एक ‘ज़ेन मन’ होगा। हर चीज़ जस की तस। कोई विश्लेषण नहीं, कोई टीका-टिप्पणी नहीं। जब आप जिंदगी के व्यंग्य से ऊपर उठ जाते हैं, तब आप उसमें निहित दिल्लगी का मजा लूट पाते हैं।

कृपया ऐसा होने दें। इसे देखें। केवल इसे ‘ज़ेन’ बनने दें।

शांति।
स्वामी