जीवन आकाश के अनुरूप है, कभी बादलों से ढका, कभी घनघोर घटा वाले बादलों से ढका। एक दिन में, विभिन्न समयावधिनुसार, वही आकाश सर्वथा भिन्न दृश्य-रूप प्रस्तुत करता है। रात्रि के पहर में, तारों की चादर ओढ़े, यह घटते अथवा बढ़ते चंद्रमा के साथ होता है। दिन में यह पूर्णतः प्रकाश से परिपूर्ण होता है। शहरों की कृत्रिम रोशनी, तारों जड़ित सुंदर आकाश के दृश्य को धुंधला कर देती है। वही आकाश जब बादलों से घिर जाता है, तो चाहे दमकता सूर्य हो अथवा शीतल चाँद, वह दोनों को छुपा देता है। न जाने कहाँ से बादल आ जाते हैं व वर्षा भी ले आते हैं। कभी कभी, वही आसमान ओला-वृष्टि ले आता है और कभी शांत, किंतु अत्यंत सर्द हिमपात।

यदि आप अपनी दृष्टि ऊपर की ओर ले जाएँ, तो आप अथाह, अनंत आकाश को देख रहे हैं। यदि सामने की दिशा में दृष्टि डालें तो संभवतः आपको क्षितिज दिखाई देगा, जहाँ धरती और आकाश के मिलने का आभास होता है। वर्षा, अंधड़, जल की फुहार, हिमपात, दिन और रात – ये सभी उस अनंत आकाश की अस्थिर व अस्थाई अवस्थाएं ही हैं। आकाश इन सबसे प्रभावित नहीं होता। वह अथाह, अनंत – सदा नील वर्ण रहता है। विभिन्न ऋतुओं के विभिन्न रंग-रूप आकाश के द्वारा, स्वयं निराभिमानी व निःसंग रह कर, केवल अपने में से गुजरने भर दिए जाते हैं, अपनाए नहीं जाते। वह अपने स्वयं के निर्मल, स्वच्छ स्वभाव को नहीं खोता। आप पृथ्वी के किसी भी भाग में जाएँ, आकाश सर्वदा एक सा रहता है। भले ही अत्याधिक ध्वनि करते हुए कोई जेट विमान उड़ा जा रहा हो, अथवा एक शांत पथ विहीन पक्षी – आसमान उनमें कोई भेद नहीं करता। आकाश में बादल हो सकते हैं, किंतु बादलों में आकाश नहीं होता। वाह! कितना उपयुक्त।

इसी प्रकार, एक पवित्रता से ओतप्रोत जीवन सदा उस नीले गगन के अनुरूप होगा। यदि आप सदा किसी उच्च से उच्चतर लक्ष्य की ओर केंद्रित रहते हैं तो अंतिम पड़ाव कभी नहीं आएगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे यदि आप क्षितिज को छूने के लिए दौड़ रहे हों तो कभी भी समाप्त-रेखा को पार नहीं कर पाएँगे। इंद्रधनुष सदा निर्मल व स्वच्छ आसमान में ही दृष्टिगोचर होता है, और, आसमान, अधिकाँशतः वर्षा के उपरांत ही साफ़-स्वच्छ होता है। जब कभी भी आपके जीवन में कष्टकारी समय आए तो कोई अवलंबन लें, अथवा धीरज धरें, प्रतीक्षा करें, जल्द ही वर्षा भी रुक जाएगी व आकाश भी साफ़ हो जाएगा। यदि आप हमेशा ही एक स्वच्छ आसमान की कामना करते हैं तो संभवतः आपको अपना निवास निर्जन रेगिस्तान में स्थानांतरित करना होगा। जब कभी अमावस्या की काली रात की भाँति जीवन भी अंधकारमय लगे तो अपना ध्यान उन टिमटिमाते तारों की ओर ले जाएँ। जब सूर्य आग उगल रहा हो तब उस पर निगाह न टिकाएँ। कृपया मस्तिष्क में यह तथ्य दृढ़ कर लें कि आकाश के सभी रंग अस्थाई हैं।

आपका सत्य-स्वरूप, उस नीले अंबर के समान, वस्तुतः सदा हर प्रकार की आंतरिक व बाह्य घटनाओं/तथ्यों से निःसंग रहता है। यदि आप इसको सदा धुंधला व उमसदार पाते हैं तो आप वैसा मौसम दर्शाती एक तस्वीर भर देख रहे हैं। उस तस्वीर (विचार) को अपनी दृष्टि से दूर करने पर, दूसरी नई तस्वीर सामने आ जाएगी। आप केवल अपने प्रतिबंधित (भिन्न भिन्न, पूर्व-संस्कारों द्वारा ढका हुआ स्वरूप) रूप के कारण संपूर्ण वर्ष एक सा सुहावना मौसम अनुभव नहीं कर पाते। जब आप अपनी दृष्टि अंतर्मुखी बना लेते हैं, तब आकाश सदा ही स्वच्छ, नील वर्ण व मौसम सदा सुहावना लगने लगेगा। आप जब चाहें, पूर्णतः अपनी इच्छानुसार, समुद्रतट का आनंद ले सकते हैं, अथवा तो हिमालय का। आपके अन्तःकरण में जगत का सूक्ष्म स्वरूप विद्यमान है। जब आपको अपने आत्म-स्वरूप का वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब अज्ञान व नकारात्मकता के सारे बादल स्वतः, आतिशीघ्र, छट जाते हैं। केवल प्रेम का निश्चल स्वरूप, सुख-शांति की शुभ्रता, कृपा की फुहार, करुणा के सुंदर बादल, दया-भाव का सुकोमल चाँद, व आकाश का अविचल धैर्य ही चारों ओर दृष्टिगोचर होते हैं। आप शुद्ध, निर्मल स्वरूप हो जाते हैं, चूँकि यही आपका वास्तविक सहज स्वरूप है।

सांझ के उपरांत सवेरा होना निश्चित है, ग्रीष्म के बाद शरद ऋतु, व रात्रि के बाद दिन अवश्यंभावी हैं, किंतु यह सब द्वन्द्वों के अल्पकालिक स्वरूप हैं; प्रतिबंधित मन के उद्गार व एक अन्योन्याश्रित दृश्य-प्रपंच हैं। क्या अंधकार की अनुपस्थिति ही उजाला है, अथवा, उजाले की अनुपस्थिति का मतलब अंधकार है? क्या द:ख का न होना सुख है या सुख की अनुपस्थिति दु:ख है? क्या शीत न होना ऊष्ण है अथवा ऊष्ण का न होना शीत है? वास्तविकता यह है कि ये सब व्यक्तिपरक वर्णन है, व हर व्यक्ति के संस्कार-व्यवहार-विचार पर निर्भर करता है। ऑस्ट्रेलिया का कृषक ३५ डिग्री सेल्सियस ताप में भी सुखपूर्वक रह सकता है किंतु अलास्का से आए व्यक्ति को २५ डिग्री पर ही पसीना आ सकता है।

हालांकि शरीर द्वारा होने वाले अनुभवों की उपेक्षा नहीं की जा सकती, किंतु मन के द्वारा अनुभव होने वाले सभी भावों को एक उत्कृष्ट व अविकारी अनुभव में परिवर्तित किया जा सकता है – एक दिव्य अनुभव। आत्म-साक्षातकारी पुरुष भी शीत-ऊष्ण का अनुभव अवश्य करता है, किंतु वह उसे शालीनता पूर्वक सहता है। यह केवल बाह्य अनुभव तक ही सीमित है; अंतःकरण की सभी भावनाओं, कामनाओं इत्यादि में, आत्म-साक्षातकारी पुरुष सदैव अनभिज्ञ, अविचल, व सम रहता है – आसमान की भाँति।

स्वयं को स्वतंत्र करें। स्वयं को जाने। स्वयं में रहें। स्वयं का साक्षात्कार करें।

शांति।
स्वामी