मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं अपना उद्देश्य कैसे ढूंढू? ये दो प्रश्न बहुधा मुझसे उन लोगों द्वारा पूछे जाते हैं जिनके जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है।

जब आपका पेट भी वैसे ही भरा होता है जैसे आपका बैंक बैलेन्स, और आपको नींद नहीं आ रही होती, तब स्वाभाविक ही आप बैठ कर सोचते हैं (अथवा चिंता करते हैं) कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है। बहुत हद तक ऐसा प्रतीत होता है मानो हम जीवन में ऐसा कुछ चाहते हैं जो हमें विचारमग्न व आत्म-विश्लेषी बने रहने में सहायक हो। वे सब लोग जो जानलेवा रोगों से लड़ रहे हैं, भारी ऋण के बोझ तले हैं अथवा कोर्ट-केसों में उलझे हुए हैं, उन्होंने कभी भी मुझसे अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में नहीं पूछा। वे जीवन की कड़वी सच्चाईयों से जूझने में ही पूर्णत: व्यस्त हैं। आश्रम में अपने पिछले छ: वर्षों में किसी एक भी ग्रामीण ने कभी भी मुझसे अपने जीवन के उद्देश्य के विषय में नहीं पूछा।

किन्तु, आपके जीवन का उद्देश्य है क्या? क्या यह ऐसा कुछ है जो कोई भी आपको बता सकता है? आईये मैं आपके साथ एक सत्य घटना साझा करता हूँ।

वर्ष २०११ में मैं सुनील नामक एक व्यक्ति से मिला। मेरे पश्चिम बंगाल के प्रवास के दौरान उन्होंने ही एक माह तक मेरी भोजन-व्यवस्था संभाली थी। वह एक साधारण कर्मचारी थे, मात्र एक चौकीदार, और बहुत अल्प वेतन पाने वाले। एक माह तक मैं अपने छोटे से कक्ष में ही रहा शायद ही कभी बाहर आया – हर समय ध्यान अथवा लेखन-कार्य में व्यस्त – और सुनील ही मेरे लिए दिन में दो बार भोजन का डिब्बा लाते थे। ८००० फीट की ऊँचाई पर स्थित, बिजली व स्नानगृह की सुविधा वाले उस कक्ष में रहना, जो रमणीक पर्वत घाटियों से घिरा था, यह उत्तरी हिमालय की गुफाओं एवं जंगलों की अति-विषम परिस्थितियों में बिताए विगत एक वर्ष के उपरांत, एक स्वागत योग्य परिवर्तन था।

सुनील एक औसत बदन के, मृदु-भाषी, छोटी कद-काठी के व्यक्ति थे जो लगभग ५’४” होंगे। उनका गोल, युवापन से भरा चेहरा देख कर आप सोचेंगे कि वे ३५ वर्ष से बड़े नहीं होंगे, जबकि वास्तव में वे ५३ वर्ष के थे व सेवानिवृत्ति से मात्र ५ वर्ष दूर थे, ऐसा उन्होंने मुझे बताया था । वे नेपाली पृष्ठ-भूमि के थे, हालांकि उनका जन्म व पालन पोषण भारत में ही हुआ। मुझे बाद में इस बात का एहसास हुआ कि यह उनका करुणा से भरा हृदय एवं संस्कारों में रची बसी अच्छाई ही थी जिसका उनके व्यक्तित्व को इस तरह शालीन व मधुर बनाने में विशाल योगदान रहा।

एक दिन उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद पाने हेतु साथ लाने के लिए मुझसे अनुमति मांगी। “आप केवल उसके सिर पर अपना हाथ रख दीजिये”, सुनील ने विनती की, “मैं आपका अधिक समय नहीं लूँगा”। मैं उस एक माह में किसी से भी भेंट करने का इच्छुक नहीं था, किन्तु मेरी अन्त:-प्रेरणा ने मुझसे हाँ कहलवा दी।

अगले दिन जब वे मेरा भोजन लेकर आए तो मैंने द्वार पर सुनील के साथ एक अन्य व्यक्ति को खड़ा पाया। लंबा एवं उनसे कुछ अधिक भारी, वह व्यक्ति कम से कम ४० वर्ष का तो अवश्य होगा, यदि उससे अधिक नहीं। उसके माथे के दोनों ओर बहुत से श्वेत बाल दिख रहे थे। वह व्यक्ति स्वलीन (औटिस्टिक) था व अनुमानतः औटिस्म की सबसे निम्न श्रेणी में। औटिस्म एक ऐसा विषय है जो सदा से ही मेरे हृदय में एक विशेष स्थान बनाए हुए है और मैंने तत्क्षण विचार करना आरंभ कर दिया कि मैं इस व्यक्ति की सहायता हेतु क्या कर सकता हूँ।

“कृपया मेरे पुत्र को आशीर्वाद दें”, सुनील बोले। उन्होंने इस व्यक्ति को झुकने को प्रेरित किया, जिसका नाम उन्होंने संदेश बताया।
हालांकि मैंने उसे आशीर्वाद तो दिया, किन्तु मैं कुतूहल से भर उठा।

“सुनील आप चाहें तो इसका उत्तर न दें, किन्तु संदेश की आयु देख लगता नहीं कि वह आपका पुत्र है।: उस दिन शाम को मैंने उनसे बात की।
“हाँ, बाबाजी”, उन्होंने जवाब दिया। “आज से २५ वर्ष पूर्व मैं अपने गेस्ट हाउस में रुके एक ऑफिसर के लिए समोसे लेने एक मिठाई की दुकान पर गया था। वहाँ मैंने संदेश को मिठाइयों की ओर बड़ी हसरत से निहारते देखा। वह वहाँ सजे काउंटर को हाथ लगा रहा था और दुकानदार उसे वहाँ से हटने को कह रहा था। संदेश मेरे पास आया और उन समोसों की ओर इशारा किया जो मेरे हाथ में थे। मैंने आसपास नजर दौड़ाई किन्तु उसके साथ किसी को भी नहीं देखा। मैंने दुकानदार से उसके बारे में पूछा।
“पता नहीं यह कौन से आसमान से गिरा है”, दुकानदार थोड़ा खीजते हुए बोला, “यह पिछले तीन दिन से यहीं खड़ा है। मैंने इसे कल और उससे पहले दोनों दिन कुछ खाने को दिया, लेकिन मैं ऐसा हर रोज तो नहीं कर सकता। यह मेरी दुकान के बाहर ही सो रहा है। इसके शरीर से मरे चूहे जैसी दुर्गंध आ रही है और इसका यहाँ खड़े रहना मेरी दुकानदारी के लिए भी अच्छा नहीं।”

“मैंने संदेश से यह जानने का प्रयास किया कि क्या वह आसपास किसी को जानता है अथवा तो उसे पता है कि उसका परिवार कहाँ है, या कुछ भी जिससे उसके घर का पता मिल सके, सुनील ने मुझे बताया। “संदेश कुछ भी बातचीत नहीं कर पाया। वह केवल बुदबुदाता रहा व तेज तेज रोता रहा। मैंने उसकी जेब टटोली लेकिन वह खाली थी। उसके गले अथवा कलाई पर भी कोई निशानी नहीं बंधी थी। उसके शरीर से आती दुर्गंध वाकई असहनीय थी। मुझे यह समझ आ गया था कि वह कई दिनों से गुमशुदा है। मैंने उसे दुकान से पेट भर कर खिलाया पिलाया और उसे अपने साथ ले आया। समोसे लाने में देरी के कारण ऑफिसर ने मुझे बहुत डांट भी लगाई।”

“मैनेजमेंट के किसी भी व्यक्ति को बिना बताए, मैंने एक छोटा सा स्टोर रूम साफ किया और वहाँ उसका बिस्तर लगा दिया। मैंने उसे बहुत अच्छी तरह नहलाया और साफ कपड़े पहनाए। मैंने किसी तरह उसे अपने नाप के कपड़ों में फिट कर ही दिया। मुझे लगा वो मेरा बेटा है और मुझे उसका ध्यान रखना है। वह रज़ाई में घुस गया और पहली रात १६ घंटे तक सोता रहा। मैंने उसका नाम संदेश रखा चूंकि मुझे लगा कि वह ईश्वर का भेजा संदेश है।”

“कुछ सप्ताह उपरांत मैंने मैनेजमेंट से बात की”, सुनील बताते रहे, “उन्होंने मुझे संदेश को वहीं रखने की अनुमति प्रदान कर दी और अपनी रसोई से ही भोजन कराने की भी। अब मैं कोशिश कर रहा हूँ कि इसे यहाँ कोई सवेतन नौकरी मिल जाये क्योंकि अब यह बिना मदद के अपने आप पौधों में पानी डाल सकता है, और सारे मार्ग आदि में झाड़ू मार सकता है। वह अपने आप नहा भी लेता है और कपड़े बदल लेता है। जब भी मैं दूसरे शहर में अपने घर जाता हूँ तो इसे भी साथ ले जाता हूँ। उसे वहाँ घर पर और अधिक मजा आता है।”

सुनील ने बताया कि उसका एक पुत्र व एक पुत्री हैं किन्तु वह बाकी दुनिया के लिए कुछ करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक लड़की, जब वह चार वर्ष की थी, उसे गोद ले लिया था। वह उनकी घरेलू सहायक, जिसकी कैंसर से मृत्यु हो गई थी, उसकी बेटी थी। उन्होंने आगे बताया कि उनकी गोद ली बेटी बहुत अच्छी चित्रकार है, और ऐसा कहते समय उनकी छाती गर्व से फूल गई। “सही कहूँ तो वह मेरे दूसरे बच्चों से अधिक कुशल है और घर के काम काज में भी हाथ बँटाती है।”

“जब मुझे संदेश मिला तो मैंने उसकी फोटो वाले पोस्टर बनवा कर सब जगह लगवा दिये – बिजली के खंभों पर, ट्रकों व बसों के पीछे, दुकानों के बाहर, बस अड्डे पर – व हर उस स्थान पर जो मैं सोच पाया। मैंने समाचार पत्र में भी विज्ञापन निकलवा दिया ताकि उसके माता-पिता का पता मिल पाये, अथवा तो उसके अतीत की कोई कड़ी हाथ लग जाये, किन्तु, कोई भी आगे नहीं आया। मैंने इसे ईश्वर-इच्छा मानते हुए पिता बन कर उसका ध्यान रखने का निश्चय किया।”

मेरी आँखेँ सजल हो गई। एक मैं था जिसने महीनों व वर्षों ध्यान में व्यतीत किए थे व जीवन के कुछ मूलभूत सार-सत्य जानने का प्रयत्न किया, और यहाँ एक ऐसा व्यक्ति था जो पूरी तरह से व्यावहारिक जीवन में रमा हुआ था, कोई ऐसा जिसने दिव्यता को श्वास-श्वास में जिया था। मैंने सुनील का दिल की गहराई से सम्मान किया।

“और, तीन वर्ष उपरांत”, सुनील ने आगे बताया, “एक दिन अकस्मात मुझे ऑफिस में बुलाया गया, जहां एक दंपति मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने दावा किया कि संदेश उनका पुत्र है और मुझे उसका असल नाम बताया। मैं सदमे में था। अब मैं उसके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह भी मुझसे गहराई से जुड़ा हुआ था। उन लोगों ने मुझे उसकी परिवार के साथ फोटो भी दिखाई। मैं उन्हें उंसके कमरे में ले गया। जब उन्होंने संदेश और उसके कमरे को देखा तो वे रो पड़े। बहुत देर तक उनके आँसू यूं ही बहते रहे। वह दंपति मेरे पैरों पर गिर गए। ‘हमने स्वयं भी कभी इसका इतना अच्छा ध्यान नहीं रखा। आप ने वह सब किया जो हम माता पिता हो कर भी नहीं कर पाये,’ वे बोले। ‘यह इतना प्रसन्न पहले कभी नहीं था।’ उन्होंने संदेश से पूछा कि क्या वह उनके साथ चलेगा, किन्तु संदेश ने मुझे कस कर पकड़ लिया और छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। वह उनके साथ नहीं गया। बाद में मैं स्वयं उसे दो बार उसके घर ले कर गया क्योंकि उसकी दादीमाँ अपनी अंतिम घड़ियों में उसे देखना चाहती थी। संदेश ने अपने दादी को एकदम से पहचान लिया था।”

“सुनील, आप उन गिने चुने चंद सर्वाधिक भले लोगों में से एक हो, जिन्हें मैं आज तक के जीवन में मिला हूँ,” मैंने कहा। “आप ये सब शुभ कर्म एकत्रित कर रहे हो। इस जगत में हमें आपके जैसे लोगों की बहुत अधिक आवश्यकता है। मैं बहुत खुश हूँ कि संदेश को आप मिले – उसके असली पिता।”

“बाबाजी, जबसे मुझे संदेश मिला, मेरा जीवन ही बदल गया। वह बहुत भोला व इस तेज़-तर्रार दुनिया के रंग-ढंग से पूरी तरह बेखबर है। उसका व अपने परिवार का ध्यान रखना ही मेरे जीवन का इकलौता उद्देश्य है।”

मैंने सदा यही कहा है कि मैं आपको नहीं बता सकता कि ‘आपके’ जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए अथवा हो सकता है। हम में से हर किसी को वह स्वयं ही ढूँढना है। हाँ, मैं आपको वह दो गलतियाँ बता सकता हूँ जो लोग अक्सर करते हैं जब कभी वे किसी उद्देश्य के विषय में सोचते हैं। पहली यह कि उन्हें लगता है कि वह कुछ अति विशाल होना चाहिए, कुछ ऐसा जो उन्हें अपने पीछे एक विरासत छोड़ जाने में समर्थ बनाए अथवा उन्हें एक बड़ी संख्या में लोगों को सहायता पहुंचाने में सहायक हो (कभी कभी आरंभ से ही)। दूसरी, एक बार उन्हें अपना उद्देश्य मिल जाने पर वे शांति एवं आनंद से सराबोर हो जाएंगे।

यदि यही आपके उद्देश्य की परिभाषा है तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि आपको कोई उद्देश्य मिल पाये। जीवन की रोज़मर्रा की चुनौतियाँ, उनका परेशान कर देने वाला रूप, कभी कभी वह निराशा के पल, यह सब तब भी चलता रहता है जब आपको अपना उद्देश्य मिल चुका होता है। जो एक तथ्य परिवर्तित होता है वह है आपके उत्साहित व प्रेरित रह पाने का स्तर। आपका उद्देश्य, आपका ध्येय आपको आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। यदि आप वास्तव में अपना उद्देश्य पाने की दिशा में सजग हैं, तो छोटे से ही आरंभ करें, बहुत छोटे से, जैसे कि एक व्यक्ति से। आपने जो पहले किया उससे थोड़ा और अधिक किसी के लिए करें, शायद उससे कुछ अलग जो आपने बीते दिनों में किया।

यह प्रतीक्षा न करें कि आपका उद्देश्य स्वयं आपके पास आकर आपको समीप से दस्तक देगा। उद्देश्य कोई ऋण वसूलने वाला अथवा तो क्रेडिट कार्ड वाले एजेंट जैसा नहीं, जो बिना आमंत्रण के ही आ जाते हैं। यह तो कुछ कुछ नोबेल पुरस्कार जैसा है, आपको अपना उद्देश्य स्वयं अर्जित करना होगा। उसके लिए कार्यशील हों, तैयार हों। औटिस्टिक संदेश में सुनील को अपना उद्देश्य मिल गया, जबकि दुकानदार ने उसे एक परेशानी के रूप में देखा। यह सब जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

एक बार आप अपना उद्देश्य ढूंढ लें, तब उसे पाने की दिशा में कार्यरत रहना आपके जीवन को महत्त्व प्रदान करता है। यह आपको वह जज़्बा, वह पागलपन देता है जिसकी इस संसार में डटे रहने के लिए, हम सभी को नितांत आवश्यकता है।

एक अन्य दिन, मैं अपने हाथों पर सैनिटाइजर लगा रहा था, तभी स्वामी विद्यानंद (एक बहुत प्यारे सन्यासी जो पिछले ६ वर्षों से मेरी व्यक्तिगत सेवा में हैं), ने अपनी चिरपरिचित दक्षिण भारतीय भाषा के लहजे से ओतप्रोत हिन्दी में पूछा, “सब ज्र्म्स (germs) मर गया?” (क्या अब सभी जीवाणु मर गए होंगे?)
“हाँ स्वामीजी, ९९.९% – लेबल पर लिखे अनुसार।”
“कहाँ गया?” (वे सब अब कहाँ गए?)
“क्या कहाँ?” मैंने थोड़ा सा उलझन से भर कहा।
“मरा हुआ ज्र्मस (germs) कहाँ गया?” (अब वे मरे हुए जीवाणु कहाँ हैं?)
“वे अब भी मेरे हाथों पर ही हैं”, इतना कहतेही मैं ठहाका मार कर हँस दिया। “मुझे स्वीकार करना होगा कि आपके पूछने से पहले मैंने कभी उन मृत सूक्ष्मतम जीवाणुओं के विषय में नहीं सोचा था।”

उस दिन के उपरांत मैं सैनिटाइजर को पहले जैसे नजरिए से नहीं देख पाया। निःसन्देह, मृत जीवाणु नुकसान नहीं पहुंचा सकते, किन्तु थे तो वे अब भी मेरे हाथों पर ही। ऊपर से वे अब मृत थे।

कुछ ऐसा ही हमारे कर्मों का विधान है, हम अपने पुराने कर्मों को इस प्रकार से सैनीटाइज़ (धो) नहीं कर सकते। वे हमारे साथ रहते हैं, हमारे ऊपर, हमारे आसपास। हर वह शब्द जो हम उचारते हैं, कार्य जो हम करते हैं, विचार जो हम मन में लाते हैं – सब कुछ एकत्रित होता रहता है।

अपने अच्छे कर्म एकत्रित कीजिये। कोई छोटा सा उदारता का कार्य यहाँ, प्रेम से उपजी कोई चेष्टा वहाँ, करुणा से भरा एक शब्द किसी के लिए, किसी अन्य के लिए कोई मदद। एक वृद्ध या विकलांग व्यक्ति को सड़क पार करने में थोड़ी सी सहायता करना, अथवा तो एयरपोर्ट पर पंक्ति में पीछे खड़ी उस स्त्री को आगे आने देना जिसकी गोद में नन्हा शिशु हो, ऐसे सभी कार्य हमें जीवन का उद्देश्य बनाने में योगदान देते हैं। यह कार्य हमें ऐसे में अच्छा बने रहने का बल प्रदान करते हैं जब हमारे चारों ओर का वातावरण हमें किसी दूसरी तरह से व्यवहार करने की ओर धकेल रहा हो सकता है।

अच्छे बनो। इंसान बनो।

शांति।
स्वामी