एक दिन ध्यान-साधना शिविर में एक महिला मेरे पास आईं। उन्होंने कहा – जीवन जीने के लिए जो कुछ भी उन्हें चाहिए था, वह सब उन्हें मिला। फिर भी वह प्रसन्न नहीं हैं। वह वर्षों से अकेलेपन की भावना से जूझ रही हैं। उन्होंने ध्यान आदि भी किया परंतु अनुकूल परिणाम नहीं पाया।

“मेरे भीतर निरंतर एक रिक्तता है और मैं जीवन का आनंद लेने में पूर्णतः असमर्थ हूँ। मेरे परिवार में सभी बहुत अच्छे हैं और मुझे कोई आर्थिक कष्ट भी नहीं। किंतु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह संसार मेरे लिए नहीं है। मुझे नहीं पता कि इस उदासी से मैं स्वयं को बाहर कैसे निकालूँ। मै समझ नहीं पा रही कि मै आप को कैसे समझाऊँ। मैं प्रसन्न होते हुए भी प्रसन्न नहीं हूँ। जीवन का जैसे कोई अर्थ ही नहीं है। अधिकतर समय मैं उदास रहती हूँ।”

मैं ने कहा – “हमारा पेट भरा हो फिर भी मीठा खाने की इच्छा तो रहती ही है। मानव बुद्धी की विशेषता है कि वह नकारात्मक विचारों को ही सोचती है। क्योंकि आप को जीवन में सब कुछ मिल गया इसलिए आप विजय के उस सुख से वंचित हैं जो जीवन की उलझनों को पराजित करने के उपरांत ही मिलता है।”

“आप कहना चाहते हैं कि मैं दुखी हूँ क्योंकि मेरे पास चिंता करने को कुछ नहीं?”

“चिंता नहीं। परवाह। आप के पास ऐसा कुछ नहीं है जिस की आप मन से परवाह करें। कोई उद्देश्य खोजें। कोई कारण, जो आप के जीवन से भी बड़ा हो। कोई कारण, जो आप के जीवन जीने का, उस में आगे बढ़ने का कारण बन जाए।”

मैं ने उन्हें एक छोटी सी कहानी सुनाई –

एक पिता प्रतिदिन शाम को काम से घर लौटने के उपरांत अपने छोटे पुत्र के साथ खेलता था। एक समय उसे अपना एक आवश्यक कार्य पूरा करना था। वह जानता था कि उसे अपने पुत्र को किसी अन्य कार्य में उलझाये रखना होगा ताकि वह अपने कार्य को पूरे ध्यान से कर सके। वह सोच ही रहा था कि इतने में उसका ध्यान एक समाचार पृष्ठ की ओर गया। उसमें एक मानचित्र बनाने वाली कंपनी का इश्तहार था, जिस में संसार का एक नक्शा बना था।

उसने बड़ी सावधानी से उस नक्शे के छोट-बड़े दसियों टुकड़े किए और उन सभी टुकड़ों को अपने पुत्र को दिया।

“इन टुकड़ों में संसार के नक्शे की पहेली है। पहले तुम इस पहेली को सुलझाओ फिर हम साथ खेलेंगे।”

उसने सोचा कि यह उस छोटे बालक को घंटों व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त होगा। परंतु केवल आधा घंटा ही बीता होगा कि उस बालक ने आकर कहा कि उसने उस पहेली को सुलझा लिया है।

“ऐसा कैसे हुआ।” पिता ने कहा, “यह तो अविश्वसनीय है।”

बालक ने कहा – “पिता जी, यह बहुत ही सरल था। जब मैं संसार के उस मानचित्र को सुलझा रहा था, मुझे वह कार्य बहुत ही उबाऊ लगा। परंतु, फिर मैंने देखा कि उसके पीछे एक चित्र बना था। मैंने उन टुकड़ों से उस चित्र को बनाना शुरू किया और कुछ ही समय में “संसार” अपने आप ही बनता गया।”

कभी-कभी कुछ जानने हेतु केवल एक ही वस्तु पर्याप्त होती है वह है – चित्र का दूसरा पहलू।

हम जीवन के मानचित्र को जोड़ कर रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सब स्पष्ट दिखे। परंतु यह किसी बगीचे में टहलने जितना सरल नहीं। विशेषकर जीवन की उन कठिन और उलझी परिस्थितियों में, जब जीवन का अर्थ जानना अत्यंत कठिन होता है। संसार के मानचित्र को जोड़-जोड़ कर बनाने में सामान्यतः आनंद की संभावना कम ही है। हाँ यदि आप कोई भूगोल-विज्ञानी या पहेली-विशेषज्ञ हैं तो बात कुछ और है! ऐसे में अपने उत्साह को बनाए रखने हेतु आवश्यक है कि हम वह करें, जो हम करना चाहते हैं।

जिस क्षण हमें स्वयं को प्रेरित करने वाला कुछ मिल जाता है, जीवन एक उबाऊ मानचित्र से बदलकर एक सार्थक खोज बन जाता है। मार्टिन लूथर किंग ने इसे बड़ी सुंदरता से समझाया – “जीवन के अंत का आरंभ उसी दिन हो जाता है, जब हम उन पहलुओं पर मौन हो जाते हैं जो हमारे लिए वास्तव में मायने रखते हैं।”

चाहे आप इस जीवन यात्रा में कहीं भी हों, कुछ नया खोजने के लिए सदैव होता ही है। जीवन के मानचित्र को सुलझाने का प्रयास न करें। आप अपने सुंदर जीवन के चित्र को संवारें। अन्य सभी स्वयं ही ठीक हो जाएगा। कुछ ऐसा खोजें जो आप वास्तव में चाहते हैं। और यदि आप के पास ऐसा कोई उद्देश्य नहीं जो आप को प्रेरित करे, ऐसा कोई चित्र नहीं जो आप को आकर्षित करे, तो इसका एक ही अर्थ है, आप पूरी लगन से खोज ही नहीं रहे। कोई भी व्यक्ति अपना उद्देश्य लेकर पैदा नहीं होता। सभी अपना उद्देश्य खोजते हैं। एक उद्देश्यहीन जीवन एक ऐसी उबाऊ यात्रा के समान है जिस में देखने के लिए आगे कुछ भी नहीं।

पेट-दर्द की शिकायत लेकर एक महिला एक डॉक्टर के पास जाती है। कुछ जांच आदि के उपरांत वह उसे बताता है कि उसे एक गंभीर रोग है और उसके पास जीने के लिए केवल तीन महीने शेष हैं।

वह बहुत चिंतित हो जाती है और पूछती है- “क्या ऐसा कुछ भी नहीं जो किया जा सके, डॉक्टर। मैं अवश्य तीन महीने से अधिक जीना चाहती हूँ।”
“क्या आप विवाहित हैं?”
“नहीं!”
“तो फिर एक चिंतक को खोजें और उससे विवाह कर लें।”
“वास्तव में?!” वह आशाजनक शब्दों से कहती है। “क्या इस से मैं और अधिक दिन जी पाउंगी”।
डॉक्टर ने कहा – “संभवतः नहीं। पर इस से आप को यह जीवन और अधिक लंबा लगने लगेगा।”

जीवन की घड़ी सभी के लिए एक ही गति से चल रही है। फिर भी आश्चर्यजनक रूप से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न गति पकड़ लेती है। हम में से कुछ उत्तेजना से भरा चलचित्र देख रहे हैं। पूरी तरह डूबकर, हर क्षण का आनंद लेते हुए। जबकि वहीं कुछ लोग जैसे मौसम का पूर्वानुमान सुनने में ही व्यस्त हैं-नीरस, निःस्वाद, इसमें अधिक उत्तेजना नहीं। आप किस तरंग को पकड़ते हैं वह पूर्णतया आप के हाथ में है। यहाँ सभी कुछ है बस आप को सही बटन दबाने हैं।

यदि आपने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की है फिर भी जीवन ने आप को अब तक कोई अवसर नहीं दिया, तो फिर जाइये, अवसर को खोजिए और उस पर झपट लीजिए। अवसर द्वार पर आकर दस्तक नहीं देते, अवसर बनाए जाते हैं। जैसा कि बुद्ध ने कहा – “आप के जीवन का उद्देश्य है जीवन का उद्देश्य ढूंढ़ना।” तत्पश्चात् उसमें स्वयं को सच्चे मन से डुबो देना। फिर पहेली के सारे टुकड़े स्वयं ही व्यवस्थित हो जाएंगे। फिर आप जीवन के सभी क्षणों को उनकी पूरी सुंदरता के साथ खिलता हुआ देख सकेंगे। फिर घड़ी की हर टिक के साथ आप स्वयं को उठता हुआ पाएंगे।

जब आप स्वयं को वचन देते हैं कि आप का जीवन उद्देश्यपूर्ण एवं प्रसन्न होगा तो सारा भय नष्ट हो जाता है, क्योंकि तब प्रकृति आप को खेलने के लिए एक बड़ा मैदान देती है। जो आप पाते हैं वह उन सभी से करोड़ों गुना अधिक है जो आप खो सकते हैं। वह हर वस्तु जो आप के जीवन में खो सकती है, उसका मूल्य उतना ही होता है जितना कि किसी करोड़पति की जेब में पड़े हुए कुछ सिक्कों का। उद्देश्य यही करता है। पहेलियाँ चित्र बन जाती हैं।

अपने जीवन के इस चित्र में रंग भर दीजिए। कैनवास को खाली मत छोड़िए। जैसा कि मैंने कहा- सब कुछ यहीं है। देखिए और आनंद लीजिए।

शांति।
स्वामी