एक समय की बात है, एक गांव मे एक धार्मिक व्यक्ति रहता था। कई लोग उसे सिद्ध संत मानते थे और कई उसको असामान्य तथा पागल समझते थे। बच्चे उसे “खिलौना बाबा” कहते थे क्योंकि वह उनको खिलौने और मिठाईयां देता था। एक उत्तम भिक्षुक की भान्ति वह उतना ही दान लेता था, जितना उसे एक दिन के लिये चाहिये होता था। वह कर्तज्ञता से सब स्वीकार कर लेता था – चाहे वह वस्तु चावल हो, रोटी या सब्जी। उसने ना तो कभी धन मांगा तथा ना ही कभी स्वीकार किया। वह संतुष्ट लगता था। किन्तु वह भोजन के साथ खिलौने और मिठाईयां देने की मांग करता था। जो उसका आदर करते थे, वे कभी कभी भोजन के साथ खिलौने और मिठाईयां भी दे देते थे। वह भिक्षुक उन सारी चीजों को एक बड़े थैले मे डाल देता और गांव के बच्चों मे बांट देता था।

वह सब के साथ उदारता का व्यवहार करता था और उसकी उपस्तिथि मे एक दिव्यता झलकती थी। परन्तु अब तक यह कोई नही समझ पाया था कि अगर वो इतना ज्ञानी है तो इतना बड़ा झोला लेकर क्यों घुमता है। कुछ लोग हैरान थे कि अगर वो इतना ही आत्म ज्ञानी है तो वो गन्दे कपडो मे, भारी थैला उठाये, एक परिश्रमी जैसे, खिलौनौ को बच्चों मे बांटने के लिये क्यों मारा मारा फिरता है बजाये इसके कि वो कुछ उपदेश दे, अच्छाई को बढ़ावा दे, पवित्र श्लोको को बोले।

एक दिन चालीस की आयु वाले कुछ व्यक्तियो के समूह ने, जो कि बरगद के पेड के नीचे बैठ कर ताश खेल रहे थे, जा रहे साधु को रोक लिया और व्यंग करते हुए उससे कहा, “कृपया हमे भी कुछ ज्ञान प्रदान करे ताकि हमे भी आत्मा का कुछ बोध हो। हमे यकिन है कि आपके इस बड़े से झोले मे अवश्य ही वेद है।”

साधु ने अपना थैला जमीन पर गिरा दिया। “यही है,” उसने कहा, “यही आत्मा का बोध है। अब मैंने आपको समस्त वेदो का सार बतला दिया है।”

उन युवको ने सोचा कि उनका उस साधु को पागल समझने का शक बिल्कुल सही निकला।

परन्तु उनमे से एक आदमी कुछ बुद्धिमान था। उसने कहा, “इसका क्या मतलब है? एक थैले के गिरने से वेदो के सार का क्या अभिप्राय है?”
साधु बोला, “यह थैला जिसे मैं उठाये जा रहा हूं, एक बहुत बड़ा भार है। अब मैंने इसे गिरा दिया, अब मैं स्वतन्त्र हूं। सब कुछ यही है, आप भी अपना थैला गिरा दो। व्यर्थ के भार को उठाकर मत जियो।”

समूह उसके लिये श्रद्धा से पूर्ण हो गया और उनमे से एक बोला, “अगर सब कुछ यही है तो फिर अगला चरण क्या है।”
साधु ने अपना झोला फिर से उठाया और उसे कन्धे पर संभालते बोला, “मैं कोई भार नही ले जा रहा। मैं तो केवल बच्चों के लिये खिलोनौ से भरा थैला ले जा रहा हूं। मेरे पास उनकी खुशी तथा आनन्द का समान है।”
“यह आपकी जागरुकता और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि आप इसको भार मानते है अथवा अपना धर्म।” यह कह कर वह अपने रास्ते चला गया।

भावनाओं की कोई व्याख्या नही होती और उन को प्रत्यक्ष रूप देना तो और भी कठिन है। अपनी नकारात्मक भावनाओं को खत्म कर दो। अपनी चिन्तायों से भरे थैले (मन) को खाली कर दो। अपने आप को पहचाने और स्वतन्त्र स्वरूप मे जियो। अभी शुरुआत करो, कोई बहाना नही।

मुक्त हो जायो। निडर होकर जियो। भार रहित अपनी यात्रा आरंभ करो!

शान्ति।
स्वामी