“मेरी ईश्वर से मात्र एक इच्छा है”, एक नवयुवती ने मुझसे कहा, “क्षमा। क्षमा के अतिरिक्त मेरी कोई अभिलाषा नहीं।”

“मेरे पिता एच-आई-वी पॉजिटिव थे और उनके अंतिम दिन अत्यंत दुखदायी थे।” उस नवयुवती ने आगे सुनाया “वे हिल भी नहीं सकते थे और उन्हें निरंतर देखभाल की आवश्यकता थी। मुझे उनसे इतनी घृणा हो गयी थी कि मैंने उनकी पूर्णतया उपेक्षा की। मेरी माँ परिवार के लिये रोटी कमाने वालीं अकेली सदस्य थीं और वे सारा समय घर पर नहीं रह सकती थीं। मैं अपने पिता की देखभाल कर सकती थी, किंतु मैंने ऐसा नहीं किया। इस बात को अरसा हो गया किंतु मैं स्वयं को क्षमा नहीं कर पायी हूँ।”

एक अन्य लड़की ने मुझे अपनी दुर्दशा बतायी – “मैं मात्र यही प्रार्थना करती हूँ कि मेरी माँ अपने जीवन में आए उस नये आदमी को छोड़ दें जो उन्हें प्रतिदिन इतनी निर्दयता से पीटता है कि उनके चेहरे पर लगे घावों से खून बहने लगता है।”

“काश मैं अपनी असली माँ से मिल पाती जो एच-आई-वी पॉजिटिव थीं।” अन्य एक लड़की ने मुझसे अपनी आँखों में आँसू भरकर कहा। “मैं नहीं जानती थी कि जिस स्री के साथ मैं रह रही हूँ वह मेरी जननी नहीं है। वह भी एड्स से मर गयी। मैं उसकी भी सेवा न कर सकी।”

मैं इस सप्ताह युवा लड़कियों के एक असाधारण समूह से मिला।

२०१६ में मैंने लगभग ४०० घंटे प्रवचन किये, २००० से अधिक घंटे लिखने में लगाए (पुस्तकें और पोस्ट), ३०० घंटे पियानो पर बिताए, दूर देशों की यात्रा करते १२० से अधिक घंटे आकाश में और १०० से अधिक घंटे हवाई अड्डे पर बिताए। लगभग ३०० घंटे सड़क पर और १००० से अधिक घंटे ई-मेल में गये। ये कुल ५२०० घंटे हुए। उन ८६७० घंटों में से जो एक वर्ष में हमें मिलते हैं।

किंतु पिछले तीन दिन में जो नब्बे मिनट मैंने इन लड़कियों से व्यक्तिगत भेंट में बिताए और इनके साथ बिताये कुल छह घंटे बहुत यादगार लमहों में से थे। आप पूछेंगे ऐसा क्यों। इन बच्चों ने मुझे निरंतर कुछ याद दिलाया-कुछ असाधारण – चार सत्य-मानव अस्तित्व सम्बंधी।

ये सामान्य बच्चे नहीं थे जिनका साधारणतया ‘परिवार’ होता है। इनमें से बहुत सी लड़कियाँ बचपन में यौनशोषण का शिकार हुई थीं और मुम्बई के रेड लाइट एरिया से यौन कर्मियों की बेटियाँ हैं। इनमें से कुछ तो अकल्पनीय कृत्यों की साक्षी या पीड़िता हैं। रॉबिन चौरसिया, ‘क्रांति’ नामक एन-जी-ओ की संस्थापक, उन्हें हमारे पास ले कर आयी थीं और हमने उनके लिये तीन दिनों का आवासीय कार्यक्रम किया था। उन्हें सुनते समय कभी-कभी मुझे अपने आँसुओं को बहने से रोकने के लिये संघर्ष करना पड़ता।

पिछले ४० दिनों में मैंने १५०० से अधिक लोगों को संबोधित किया और व्यक्तिगत भेंटों में १२०० से अधिक व्यक्तियों से मिला। उनमें करोड़पति, उच्च पदाधिकारी, बेरोज़गारों से लेकर ये बच्चे थे। जबकि सभी अपने जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, हममें से कुछ दूसरों से अधिक सकारात्मक हैं। दूसरों से तुलना की जाए, तो इन लड़कियों के विषय में जो विशेषता आश्चर्यजनक थी, वह यह कि इनकी सोच सकारात्मक थी, इनमें जीवन के प्रति उत्साह और इनकी आँखों में आशा की एक चमक थी।

यह मुझे आपसे जीवन के चार सत्य साझा करने की ओर ले जाता है। नहीं, ये बुद्ध के २५०० वर्ष पुराने ‘उत्तम सत्य’ नहीं हैं वरन ये मेरे अपने हैं, एक आधुनिक संस्करण, ऐसा आप कह सकते हैं।

१. निश्चितता एक मिथक है

न तो जीवन में कुछ भी स्थायी है और न ही ऐसा कुछ भी है जो निश्चित है। हम जितनी शीघ्र यह समझ लें कि जीवन कुछ भी, कैसा भी, स्थायित्व प्रदान नहीं करता जीवन को संभालना उतना ही सरल हो जाता है। आप यह मान कर चलें कि चाहे आप जीवन में किसी विषय में कितना भी आश्वस्त हों, जैसे-जैसे आपका विकास होगा, ये निश्चितताएं विलुप्त होती जाएंगी।

आप एक बीज बोकर उसे सभी प्रकार का पोषण और उचित वातावरण प्रदान कर सकते हैं, फिर भी इस बात का कोई आश्वासन नहीं कि अंकुर निकलेगा ही। वहीं दूसरी ओर एक बीज, जिसे आप पत्थरों में फेंक देते हैं, विशाल वृक्ष में परिवर्तित हो सकता है। किसी भी प्रकार से कोई गारन्टी नहीं।

चाहे आप कोई भी निर्णय लें, चाहे कोई मार्ग चुनें, आपका स्वागत निश्चितता से नहीं वरन, शंका, चुनौतियों व स्वयं पर संदेह से होगा। और अंततः परिणाम भी मिलेंगे। चलते रहें। हमारा भविष्य पत्थर पर लकीर के समान नहीं होता। हर वस्तु पूर्व-निर्धारित नहीं है। आप अपनी पटकथा स्वयं लिख सकते हैं और किसी भी वांछित परिणाम की दिशा में कार्य कर सकते हैं, यदि आप यह समझ लें कि आप जिस लक्ष्य के लिये निशाना लगा रहे हैं, वह संभवत: आप जो खोज रहे हैं उसका परिणाम न हो। या कि आप जिस परिणाम की आकांक्षा करते हैं, वह आपको वह संतुष्टि न दे पाए जैसी आपने अपेक्षा की थी। बहुत कुछ बदल सकता है, और बदलता भी है, जिस समय हम अपनी यात्रा आरंभ करते हैं उस समय से, हमारे अपने लक्ष्य पर पहुंचने तक।

यही अनिश्चितता और नश्वरता हमारे जीवन को मनोहर और सुंदर बनाता है।

२. विरोधाभासों का सह-अस्तित्व होता है

यदि आप वास्तव में अपना जीवन जीना चाहते हैं और उसका सदुपयोग करना चाहते हैं, तो इस आधार पर आरंभ करें कि जीवन अत्यंत पेचीदा और कभी-कभी अनुचित भी हो सकता है। अच्छे व्यक्तियों के साथ अधिकतर बुरी बातें, भयंकर बातें होती है। यदि आप यह सोचते हैं कि जो लोग कष्ट झेल रहे हैं वे ऐसा अपने कर्मों के कारण झेल रहे हैं तो पुनः विचार करें। बहुधा हम दूसरे व्यक्तियों के कर्मक्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं जो हमें भी प्रभावित करता है। यदि किसी ने तीव्र सुगंधित इत्र लगाया है ओर वह आपके निकट आता है, तो उदाहरणार्थ आप भी उस सुगंध को अपनी सासों में भरने को विवश हो जाएंगे। कार्मिक कक्षा कुछ ऐसी ही है।

यह कहना कि कर्मों का नियम या ऐसा कुछ भी परम सिद्धांत है, निश्चितता के प्रथम सत्य का उल्लंघन होगा। कुछ भी निश्चित या परम नहीं है (यहाँ तक कि यह कथन भी नहीं)। कभी-कभी, कुछ बातों का कोई स्पष्टीकरण नहीं होता। विरोधाभासी सत्य और विडम्बनाएं साथ-साथ रहती हैं जैसे सूर्यास्त के समय अँधेरा और उजाला साथ हो जाते हैं। चाहे आपका कोई भी विश्वास हो एवं चाहे आप उसके प्रति कितने भी निश्चित हों, आपको उसे नकारने को पर्याप्त प्रमाण मिल जाएंगे।

एकमात्र प्रयत्न जो आप कर सकते हैं वह यह कि अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ एक सच्चा और अर्थपूर्ण जीवन जिएं। आप यह स्वयं के लिये करें, अपने मन की शांति के लिये। जीवन एक उत्तम गुरु है किंतु बुरा व्यापारी है। यह औचित्यपूर्ण या एक मानक के अनुरूप होने की कोई परवाह नहीं करता, यह कारण को नहीं मानता।

जीवन में हर समय अनेक भ्रम और असंगतियाँ होती हैं। इसे स्वीकार करें। जबकि तर्क-वितर्क हमारी उत्सुकता को बुझाकर शांत कर देते हैं और हमें बढ़ने में मदद करते हैं, इसका यह अर्थ नहीं कि ये हमें और भी प्रसन्न बनाएंगे। प्रसन्नता तर्क से नहीं आती। यह हमारी समझ एवं स्वीकारोक्ति से आती है। और जहाँ तक जीवन की बात है उस विषय में समझने को बहुत कम है।

३. जीवन एक वरदान है

चाहे परिस्थितियां कितनी भी जटिल क्यों न हो, अधिकतर जीवन एक वरदान है। अपना जीवन जीने की दो ही विधि हैं या तो आप इसे ऐसे जियें कि यह एक वरदान है, या नहीं। याद रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण धारणा यह है कि असंतोष प्रकट करने से किसी का भी जीवन बेहतर नहीं हुआ। जीवन हमारी शिकायतें नहीं सुनता और बहुधा यही हितकारी है क्योंकि मन सदैव इस बात की या उस बात की शिकायत ही करता रहता है। यदि जीवन वास्तव में हमारी हिनहिनाहट सुनता रहता, तो जीना कठिन हो जाता।

चाहे आपका अतीत कुछ भी रहा हो, आप जहाँ भी थे, जो भी हो सकते या होने चाहिये थे, सत्य तो यह है कि आप यहाँ पर हैं, अभी। यही जीवन है। और वास्तव में केवल दो ही चयन हैं – या तो इसे जीना आरंभ कर दें या शिकायत करते रहें। यदि आप अपना जीवन जीना आरंभ करना चाहते हैं, तो आप जहाँ हैं, वहाँ से प्रारंभ करें, यह सोचकर कि आप अधिक से अधिक यही कर सकते हैं कि अपने पथ पर चलें और सज रहें। जब आपको धूप की अपेक्षा हो तो वर्षा हो सकती है। मैं यह नहीं कह रहा कि यह एक जुआ है किंतु परिणाम सदैव पूर्णतया हमारे हाथ में नहीं होता।

यदि आप देखना चाहते हैं कि कैसे आपका जीवन एक वरदान है तो केवल एक नोट बुक लीजिये और लिखिये कि आपके जीवन में क्या अच्छा है। इसे लिख डालिये। यह आपमें कृतज्ञता एवं आभार की सकारात्मक भावना जगायेगा जिससे आप जीवन के उजले पहलू को देख पाएंगे।

४. यहाँ आशा है

आशा से मेरा यह अर्थ नहीं कि आपके सपने पूरे हो जाएंगे (याद रखें कि जीवन अनिश्चित और असंगत हो सकता है)। मेरा केवल यही मानना है कि एक वन में आग लगाने हेतु केवल एक चिंगारी ही पर्याप्त है। वह चिंगारी कहीं से भी आ सकती है। ऐसा संभव है कि आपको जीवन से निराशा हो सकती है कि जीवन वैसा नहीं हुआ जैसी कि आपने कल्पना की थी। किंतु यदि आप संभावनाओं के प्रति ग्राह्य हैं तो जीवन आप को कहीं सुंदर जगह ही जा पहुँचायेगा।

अपनी आशा को एक अवसर देने के लिये आपको वास्तविक होना पड़ेगा। दिवास्वप्न यदा-कदा तो ठीक है किंतु वास्तविक हों। मूल बुनियाद पर पुनः जाएं और आप जहाँ हैं, वहीं से आरंभ करें। अपना स्वप्न या उसे प्राप्त करने का कर्म न छोड़ें। कुछ न कुछ किसी न किसी प्रकार से तो काम करेगा ही।जीवन किसी भी व्यक्ति के लिये, किसी भी कारण नहीं रुकता। विश्वास रखें, आशा रखें।

हो सकता है आपने बहुत कठिन जीवन बिताया, संभवतः आपने बहुत कुछ सहा और हो सकता है आप बहुत अधिक तनाव में हैं, आपकी समस्याएं जटिल और स्थिति बहुत गंभीर है। यह सब संभव है। मैं मानता हूँ। ठीक है। किंतु जीवन ऐसा ही है। अब आगे क्या किया जाए?

हम ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ अनगिनत व्यक्ति प्रतिदिन बिना अपने किसी दोष के कष्ट झेलते हैं। जहाँ हमारे कुछ साथी प्रतिदिन मर रहे हैं क्योंकि वे भोजन या दवाओं का खर्चा नहीं उठा सकते, जहाँ करोड़ों व्यक्ति अकेला जीवन जी रहे हैं, जहाँ करोड़ों बच्चों का शोषण हो रहा है, महिलाएं पीटी जाती हैं और निर्दोष मारे जाते हैं।

हमें और धर्मों, शाखाओं अथवा राजनीति बहसों की आवश्यकता नहीं है। हमें सामंजस्य और करुणा चाहिये। इनमें से कुछ भी संभव नहीं जब तक हम आशावादी एवं सकारात्मक न हो। जब तक हम जीवन को एक वरदान के रूप में न देखने लगें, जब तक हम अपने अस्तित्व और उस की विधियों को स्वीकार न कर लें। सामंजस्य ही प्रसन्नता है। बारम्बार मैंने देखा है कि जब हम अकृतज्ञ होते हैं तो प्रकृति हम से सुख ले कर उन्हें दे देती है जो इसका आदर करेंगे और मूल्य समझेंगे।

यदि आप महसूस करते हैं कि आपका जीवन और भी सुंदर हो सकता है, तो नियंत्रण की बागडोर अपने हाथों में लें और इसके लिये कार्यरत हों। क्योंकि हमारे कार्य ही अकेले हमारा जीवन आगे ले जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे विचार, शब्द, भावनाएं व इच्छाएं इसे प्रभावित करते हैं, किंतु अंततः भविष्य में क्या हमारा स्वागत करेगा, वह वही है जिसे अपने कर्मों से हम आज निर्मित करते हैं। हमारे कार्य जितने वास्तविक हैं उतना ही सकारात्मक उसकी प्रतिक्रिया (प्रकृति द्वारा) होती है।

आप कीचड़ में रेंगते रह सकते हैं और शिकायत करते रह सकते हैं कि आपके अतीत या वर्तमान में क्या सही नहीं है। या फिर आप बहादुरी से चुनौतियों का सामना करके देख सकते हैं कि जीवन आपको कहाँ ले कर जा रहा है। सोचें, कार्य करें, रचें।

अपने जूतों से बाहर निकलकर जीवन-पथ पर चलकर देखें। सुबह की नर्म हरी घास पर पड़ी ओस की बूंदों को, जो कि यूँ लगती हैं जैसे किसी दैवी भूमि पर मोती बिखेर दिये गये हों, अपने पैरों को स्पर्श करने दें। प्रकृति की भव्यता, शान व प्रेम को अपने हृदय में उतरने दें ताकि आप अपने जीवन की सभी अनिश्चितताओं और कुतूहलों के साथ, उससे मित्रता कर सकें। आपके अस्तित्व के रोम-रोम से आनंद चमकेगा। कुछ सुंदर रचें। कुछ अर्थपूर्ण करें।

नववर्ष २०१७ की शुभकामनायें!

शांति।
स्वामी