एक दिन संयोगवश मैंने कोरी मुलर की वेबसाइट (यहाँ) पर एक सुंदर कविता की व्याख्या पढ़ी। हालाँकि उसका शीर्षक “दो भाई” था किंतु उसे सरलता से “मनुष्य के अस्तित्व का सत्य” कहा जा सकता है। मुझे उस कविता में इतनी गहराई लगी कि एक पल के लिये मैंने आज के पोस्ट में केवल उस कविता को ही साझा करने का विचार किया। बिना किसी टिप्पणी या मेरे अपने विचारों के। प्रस्तुत है वह कविता –

एक पुराने पेड़ के नीचे दो पुत्र पैदा हुए
प्यार से स्वतंत्रता से दोनों साथ- साथ पले बढ़े

वे खेतों में घूमे, पहाडों पर गये
नदियाँ पार करीं, मीलों चले
दैत्यों से लड़े, सिपाहियों से लड़े
और सबसे जीते।

हर दिन के अंत में
वे सुरक्षित घर आते
उनके प्यारे पिता
उन्हें प्यार से सुलाते
पिता बूढ़े हुए और फिर मर गए
छोटा भाई रोया, बड़ा सुबकता रहा।

खेत तो एक का ही हो सकता था
छोटा भाई निकल पड़ा, अपना पाने के लिये
पुराने पेड़ के नीचे
दोनों ने एक दूसरों की आंखों में देखा
और अलविदा कह दिया।

तपते सूरज के नीचे
बडा भाई खेत जोतता
उसके मेहनत-पसीने से खेत लहलहाता
उसके सुखद सुरक्षित घर में
एक सुंदर पत्नी आई
उसे बहुत प्यार मिला
पर वह फिर नहीं घूमा।

हर दिन वह घुमन्तू भाई के सपने देखता
मैं क्यों नहीं गया, यह सोच कर पछताता
कईं वर्ष बीते और अंतत: वे फिर मिले
पुराने पेड़ के तले, दो बूढ़े थे खड़े।

अपने भाई को उसने किसानी की कथा सुनायी
जिसमें नहीं था कोई रोमांच
था तो केवल काम, काम, और काम
ओह कैसे वह खुली राहों के सपने देखता था
कैसे वह स्वयं को घर में फंसा हुआ पाता था।

भाई ने अपने जीवन का किस्सा सुनाया
लम्बी, थकाऊ सडकों के विषय में बताया
बरसती रातों में जब मैं अकेला होता था
तो एक ही विचार से मैं हर्ष पाता था

कि मेरा भाई घर में है सुरक्षित
आंधी और वर्षा से दूर, निरापद
कड़ी मेहनत तो मैं कर भी लेता पर
अकेले दिन बिताना कठिन हैं सबसे

बड़े का दिल भर आया
उसने दुख से सर झुकाया और
छोटे भाई से बड़े भाई ने बतलाया
कितनी दुखदायी है हम दोनों की कथा
तुम्हें मेरा और मुझे तुम्हारा जीवन था पाना

भाई ने आह भरी, फिर धीरे से मुस्कुराया
थोड़ी देर सोचा और फिर यह बताया –
इस कहानी का मर्म तो तुम्हें समझ में नहीं आया।

मेरे प्यारे भाई यह तो सदैव ही होता
चाहे मैं रुकता, या तुम जाते
हर हाल में हम दोनों ही पछताते!

(इस सुंदर कविता को चित्रों में देखने के लिये आप कॉरी मोलर की “एक्सिसटेन्सियल कामिक्स” देखें।)

फ़ेसबुक की बनावटी, अवास्तविक दुनिया से परे, अधिकतर व्यक्ति एक मूक निराशा में जीते हैं। जो कि जीवन की प्रत्येक नयी सुबह के साथ आरंभ हो जाती है। जैसे कि हम में से हर व्यक्ति अपने अंदर एक बोझ ले कर चल रहा है। यह बोझ सदैव भावनाओं का नहीं होता। कभी-कभी न ही आप क्रोधित हैं, ईर्ष्या, जलन, असंतोष जैसा कुछ भी नहीं, किंतु आप प्रसन्न भी नहीं हैं। आप ठीक, तुष्ट या पूर्ण महसूस नहीं करते।

किसी दिन आपको प्रतीत होता है कि जीवन परिपूर्ण है किंतु ऐसा अधिक देर तक नहीं रहता। मैं जितने भी व्यक्तियों को जानता हूँ, लगभग सभी कुछ अलग जीवन की कामना रखते हैं। हमें लगता है कि कुछ हट कर होना चाहिये। यह प्रिय लालसा धीरे धीरे निराशा में परिवर्तित होती जाती है। परिणाम स्वरूप यह महसूस करते हुए कि हमारा वर्तमान जीवन अपूर्ण, अपर्याप्त है, हम हर दिन शिकायतों, पश्चाताप को मन में लिये रहते हैं और मूर्खतापूर्ण विकल्प चुनते रहते हैं। इस आशा में कि यह हमारे भीतर की उदासी को समाप्त कर देगा। इन सबकी उत्पत्ति मात्र एक दृष्टिकोण से होती है। मात्र एक भावना, वह है – असंतोष।

अर्जुन ने एक समय कृष्ण से पूछा – “भगवन, सच्चा योगी कौन है?”
“वह जो वर्तमान क्षण में संतुष्ट है और जो संयम जानता है वही सबसे महान योगी है।”

कृष्ण ने एक ध्यानी को योगी नहीं कहा, उन्होंने अपने भक्तों को भी योगी नहीं कहा। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि वे जो कि किसी विशेष संप्रदाय या विचारधारा को अपनाते हैं या जो कर्मकाण्ड कर रहे हैं वे योगी हैं। बजाय इसके उन्होंने इसे सरलीकृत कर दिया। यदि आप संतुष्ट और शांत हैं तो आप योगी हैं।

किसी लक्ष्य से व्यक्ति बहुधा मनोग्रहित हो जाता है। आत्म केन्द्रित होने पर हमारी मनोग्रस्ति एक प्रकार की दृष्टिहीनता उत्पन्न कर देती है। आप अपने आस पास अच्छाई को देख नहीं पाते। और इससे नैराश्य होता है जो अंततः क्रोध की उत्पत्ति करता है। यह स्पष्ट है कि यदि आप क्रोधित हैं तो आप शांत नहीं हो सकते, न ही स्पष्ट विचार कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में अपनी उन्मत्त प्रवृत्तियों का त्याग करना और वर्तमान क्षण में संतुष्ट रह पाना असंभव है।

गौ-धन, गज-धन, वज्जि धन और रतन धन खान,
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।  (संत कबीर)

मेरी दृष्टि में जीवन यात्रा में संतोष ही सर्वोत्तम आशीष है। आशीष शब्द प्रयोग द्वारा मैं यह नहीं कह रहा कि हममें से कुछ इसके साथ पैदा हुए हैं और कुछ नहीं। या फिर यह किसी बाह्य-शक्ति द्वारा हमें प्रदान किया गया है। आशीष से मेरा सीधा सा अर्थ है कि यह सबसे दैव्य भावना है। जब आप वास्तव में संतुष्ट होते हैं, तो आप प्राकृतिक रूप से करुणामय और दयालु हो जाते हैं। आप प्रसन्नता, अच्छाई, दयालुता प्रदान करते हैं।

अन्य भावनाओं के समान हमें अपनी चेतना में संतोष की भावना का पोषण करना चाहिये। आप कभी भी घर से बाहर निकलें, आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके पास बेहतर घर, कार, धन, काया और प्रतिभाएं हैं। यह आपके चारों ओर हैं। उन्हें देखकर आपको ईर्ष्या, जलन या प्रेरणा मिल सकती है। किसी भी प्रकार इससे आपको अपना वर्तमान जीवन धूमिल या फीका लग सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि हमें आलसी व व्यर्थ हो हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना चाहिये। हमारे लिये जो भी महत्वपूर्ण है उसे अपना लक्ष्य बनाने का प्रत्येक को अधिकार है। किंतु हर खोज का मूल्य चुकाना पड़ता है।

संतोष का अंकुरण सचेतना से होता है। एक विवेक कि मुझे कुछ इसलिये नहीं करना है क्योंकि दूसरे ऐसा कर रहे हैं। यदि आप वर्तमान क्षण में रहने, उसमें सुंदरता देखने में असमर्थ हैं, तो भविष्य कुछ अधिक अच्छा नहीं होने वाला। वर्तमान क्षणों का परत दर परत खुलते जाना ही तो भविष्य है। दोपहर में जो मेरा अतीत है वही तो सुबह मेरा भविष्य था।

जीवन एक नदी के समान है, सदैव बदलती, सदैव बहती हुई। आप इसमें बार बार उतर सकते हैं यह सोचकर कि यह तो वही नदी है। ऐसा अवश्य है किंतु यह सत्य नहीं। पहले जो जल यहाँ था वह अब नहीं है। हर बार जब आप डुबकी लगाते हैं, जल नया होता है। कोई भी दो क्षण एक जैसे नहीं होते। अपने अतीत या वर्तमान को जकड़े रहना अज्ञानता है। जीवन का अपना प्रवाह है। नदी बरसात में मैली या शीत ऋतु में ठंडी हो सकती है। कभी यह खुशनुमा गर्म हो सकती है कभी ये पूर्णतया स्वच्छ। किसी भी गति से, जब तक कि स्रोत सूख न जाए, यह बहती रहती है जीवन के समान।

क्योंकि हम पहले से ही जीवन यात्रा पर हैं, तो क्यों न पूरी शोभा से चलें, संतुष्टि के साथ। चाहे कोई घूमे, चाहे कोई रुके…

यदि आप सागर से मिलना चाहते हैं तो बहें।

शांति।
स्वामी