एक दिन माँ शमता ॐ (जो मेरी प्रधान शिष्या और एक अत्यंत गरिमापूर्ण एवं सुंदर मनुष्य हैं) ने अपने सामान्य सरल विधि से कुछ गहन अर्थपूर्ण बात कही।

“स्वामी” उन्होंने कहा, “यदि सोचा जाए तो मनुष्य का जीवन कितना सुंदर और सरल है। प्रतिदिन उठें, अच्छे कर्म करें, पेट-भर भोजन खाएं, दूसरों की सहायता करें, मानवता की सेवा करें और थोड़ा आराम करें। यही पर्याप्त है। परंतु किसी कारणवश अधिकतर मनुष्यों ने इसे बहुत अधिक सोच और चिंताओं के कारण बहुत जटिल बना दिया है।”

इन शब्दों के संदेश के अतिरिक्त जो शब्द मुझे अत्यंत विचारणीय लगे वे थे “बना दिया है”। इस बनाने की प्रक्रिया में हम जीवन को इस प्रकार देखते हैं जैसे कि अपने जीवन का निर्माण हम स्वयं करते हों। जैसे हम कोई वस्तु का निर्माण करते हों। परंतु यह सत्य नहीं है। हम जीवन के कुछ ही पक्षों को नियंत्रित कर सकते हैं। परंतु जीवन का अधिकांश भाग हमारे प्रभाव एवं प्राथमिकताओं से पूर्णतया स्वतंत्र है।

जिस क्षण से हम जीवन निर्माण करने के विपरीत, जीवन के प्रवाह के साथ बहना प्रारंभ करते हैं, हमारा दृष्टिकोण स्वभावतः ही परिवर्तित हो जाता है। अनावश्यक संघर्ष पीछे छूट जाता है। और आप इस बात के प्रति अत्यधिक जागरूक हो जाते हैं कि कब आपको समर्पण करने की आवश्यकता है और कब नियंत्रण की।

कार्यों द्वारा संचालित और परिणामों पर केंद्रित संसार में, हमने जीवन के निर्माण पर बहुत महत्व दिया है। पार्कर पामर के शब्दों में, “यदि हम प्रकृति के समीप एक कृषक समाज में रहें, तब वहाँ ऋतुओं के रूपांतर और तथ्य ही हमारे जीवन को निरंतर विकसित करेंगे। परंतु हमारे युग का प्रधान रूपांतर कृषिकर्म पर आधारित नहीं है। यह आधारित है उत्पादन पर। हम यह विश्वास नहीं करते कि हम अपना जीवन ‘विकसित’ करते हैं। हमें विश्वास है कि हम एक वस्तु की भांति अपने जीवन का निर्माण करते हैं। हम दैनिक भाषा में जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं मात्र उन्हें ही सुनें – हम वस्तुओं की भांति समय बनाते हैं, मित्र बनाते हैं, अर्थ बनाते हैं, धन बनाते हैं, जीवन बनाते हैं।”

हम समुद्र, पर्वत और नदियों का निर्माण नहीं करते। हम सूर्य की किरणों, बादलों और वर्षा का निर्माण भी नहीं करते। हम हमारे चारों ओर विस्तृत भव्य सृष्टि के साक्षी मात्र हैं। योगिक ग्रंथों में कहा गया है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक संपूर्ण ब्रह्माण्ड है। बाइबल में भी कहा गया है कि ईश्वर का राज्य हमारे भीतर है। उस राज्य और हमारे आंतरिक संसार के इस ब्रह्माण्ड में एक पूरी श्रृंखला है। उत्कृष्ट सुंदरता से लेकर अत्यंत यंत्रणापूर्वक श्रृंखला। यहाँ भय के काले घने जंगल हैं, नकारात्मकता का दलदल है, अहंकार का गलता वृक्ष है, ईर्ष्या के कैक्टस हैं, लालच की लताएं हैं, कामनाओं का दलदल है एवं घृणा का बदबूदार अवशिष्ट है।

इन सबके पश्चात हमारे आंतरिक संसार में कुछ अविस्मरणीय सुंदर स्थान भी हैं। जहाँ पर आनंद का महासागर, प्रेम की धारा, जीवन की ऋतुएं, बसंत के रंग, शरद ऋतु की अवस्था, क्षमा का शीत ऋतु सा गर्म सूर्य, हमारी कृपा के अनगिनत तारों से सजी अमावस्या की सुंदर रात्रि भी है। यह सब हमारे भीतर स्थित है। जीवन पथ पर चलते समय हम इन विभिन्न स्थानों के सम्मुख होते हैं। सभी स्थानों में से हम कहाँ थोड़ी देर रुकना चाहते हैं अथवा कहाँ व्यवस्थित होना चाहते हैं, यह चुनाव हमारा है।

परंतु हमारा जीवन केवल हमारे स्वयं के लिये नहीं है यह एक अद्भुत घटना है। यह एक सामूहिक विस्तार एवं एक लौकिक प्रक्रिया है। वास्तव में, जितना जीवन हममें है उतना ही हम जीवन में हैं।

हमें जीवन के सभी रंग आकृष्ट नहीं करेंगे, परंतु उनके होने का भी ध्येय है। किसी-किसी समय, हमें प्रकृति को हमारे जीवन के कैनवास को चित्रित करने की अनुमति देनी चाहिये। तथा हम जीवन से कहें कि, “तुम जहाँ मुझे ले जाना चाहते हो, वहाँ ले चलो” और हमें चाहिए कि हम ब्रह्मांड के ज्ञान को स्वीकार करें। हमें सर्वदा वस्तुओं के निर्माण की इच्छा के भार तले नहीं दबना चाहिये। उन्हें अपने अनुसार सही प्रकार करने या उनके तुरंत निर्माण की इच्छा का भी त्याग करना चाहिये। कभी हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है कि धीरज रखें और जाने दें। और कभी हमें जीवन को स्वतः ही व्यक्त करने की अनुमति देनी चाहिए।

कभी जब नदी जमी हो तब मुझसे पूँछना
कि मैंने क्या गलतियाँ की हैं?
मुझसे पूँछना कि क्या मैंने जो किया वही मेरा जीवन है?
लोग धीमी गति से मेरे विचारों में प्रवेश कर गये,
कुछ ने मदद की, तो कुछ ने कष्ट दिया।
मुझसे पूँछना कि उनके प्रबल प्रेम या कटु-घृणा से क्या अंतर पड़ा?

तुम जो भी कहोगे, मैं सुनूँगा।
हम दोनों पलट कर देखेंगे उस शांत नदी को
और प्रतीक्षा करेंगे,
हम जानते हैं कि इसमें धारा छुपी हुई है,
और मीलों दूर से कुछ आ-जा रहा है,
जिसने हमारे सामने स्थिरता बना रखी है।
नदी जो कहती है, मैं यही कहता हूँ।
(विलियम स्टॉफ़र्ड द्वारा रचित “मुझसे पूछें”, मुझसे पूछें – विलियम स्टॉफ़र्ड की १०० आवश्यक कविताएं।)

निश्चित ही हम जीवन को नियंत्रित कर उसे अपनी इच्छानुसार जीना चाहते हैं। परंतु यदि आप मुझसे पूछें तब उसे गढ़ने का विचार ही, अपने आप में अपूर्ण है। हम एक मिट्टी का टुकड़ा नहीं हैं जिसकी ढ़लाई करनी है या एक पत्थर नहीं हैं जिसे गढ़ना है। हम ब्रह्माण्ड द्वारा एकांतिक उपहार हैं, एक छोटा बीज, जो अंकुरण की प्रतीक्षा में है। कदाचित पालन-पोषण, थोड़ी देखभाल की आवश्यकता है और आप पहले एक कोमल पौधे कि भांति और फिर प्रेम और कृपा के फलों से लदे वृक्ष के रूप में विकसित हो जायेंगे। अंतत: आपमें वह सभी कुछ है जो खोजे जाने के लिये प्रतीक्षारत है।

जीवन सरिता आपकी प्राथमिकताओं से स्वतंत्र बहती रहती है। आप उसके साथ बहते हैं, उतरते हैं, तैरते हैं या डूबते हैं, यह आपका चयन है। किसी भी गति से यह आपको अपने साथ ले जाएगी।

आप सभी को क्रिसमस और नव वर्ष की शुभकामनाएं।

मुस्कुराएं, सांस लें, ध्यान करें और जाने दें।

शांति।
स्वामी