जीवन सुपर बाजार के भ्रमण समान है। आप वहाँ खाद्य सामग्री इत्यादि के क्रय हेतु, अनिवार्यता वश जाते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जो मस्तिष्क में विचार कर लेते हैं कि उन्हें क्या क्या खरीदना है, अथवा तो वैसे जो सुपर बाजार में प्रवेश से पूर्व अपने पास एक सुव्यवस्थित क्रय सूची रखते हैं। जो भी हो, प्रवेश उपरांत, आपको कुछ और सामग्री अवश्य स्मरण हो आएगी। आप इस भ्रमण के इच्छुक नहीं हैं, किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि आपके पास कोई विकल्प नहीं। आप अपनी कार वहाँ के पार्किंग स्थल पर, बिना किसी ट्रेफिक व्यवस्था का ध्यान रखते हुए, चारों ओर अव्यवस्थित रूप से फैली ट्रालियों से दूर खड़ी करते हैं।

आप सुपर बाजार की ओर बढ़ रहे हैं; प्रवेश से पूर्व, आप वहाँ रखी ट्रॉलियों में से एक ट्रॉली झटके से खींच लेते हैं। अब आपको उस ट्रॉली को साथ लेकर ही चलना होगा। आपका अभिवादन होता है वहाँ रखे तरह तरह के ताज़ा सामान व उन पर लगे चमकदार रेट कार्डों के बहुरंगी दृश्य द्वारा। एक अभिभूत सा हो जाने का भाव आपके ऊपर छा जाता है और, कुछ ही क्षणों में, आप उस में खो से जाते हैं । अब आप ढेरों सामग्री से भरे रैक के गलियारों से हो कर गुजर रहे हैं, जैसे मानो एक मूषक किसी भूल भुलैया में मार्ग खोज रहा हो। चारों ओर सामान ही सामान दिखाई दे रहा है । आप अपनी निगाह भले किसी ओर भी ले जाएँ, कहीं भी स्थिर करें, केवल सामान ही दिखाई देगा। ऊपर से हर एक पदार्थ के लिए अनेक विकल्प; अरे! इसे इतना विषम करना क्या आवश्यक था?

आपकी ट्रॉली, जो अब सामान से भर चुकी है, इस प्रकार झूल रही है जैसे मानो वह एक नन्हें से तीन वर्षीय बालक की बग्गी हो। आपको उसे ठीक से चलाने में अधिक प्रयत्न करना पड़ रहा है। बिल्कुल बच्चे की बग्गी की ही भाँति, आप उसे अकेला नहीं छोड़ना चाह रहे। आप एक क्षण के लिए दूर हो कर झटपट और सामान उठाते हैं – अपना ध्यान ट्रॉली पर ही टिकाय हुए – मानो ट्रॉली-चोरों का कोई समूह उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में हो, अन्यथा, वहाँ कोई ट्रेफिक का चालान काटने वाला ग़लत पार्किंग के लिए चालान काटने को तत्पर खड़ा हो । खैर, थके माँदे, प्यास से बेहाल, आप प्रस्थान की पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। आपका स्वागत बिल भुगतान के लिए कार्यरत व्यक्ति द्वारा उसी औपचारिक मुस्कान से होता है।

वे आपसे पूछते अवश्य हैं कि आप कैसे हैं किंतु उन्हें उत्तर जानने में कोई रूचि नहीं, चूँकि आपके उत्तर से पहले ही वे अपने कार्य में लग जाते हैं। कम से कम वे आपकी खरीदारी देखकर आपका मूल्यांकन नहीं कर रहे, चूँकि उनका इस तथ्य से कोई औचित्य नहीं। दूसरे शब्दों में, उनकी आपमें उतनी ही रूचि है, जितनी आपकी उनमें। बिल का योग तो अनुमान से अधिक हो गया ! आप मन मनोस कर भुगतान करते हैं व तुरंत भूल जाने वाला एक विचार भी मन में लाते हैं की अगली बार आप सोच समझ कर ही सामान ख़रीदेंगे। आप अपनी कार तक पहुँचते हैं, ट्रॉली को खाली कर, सारी सामग्री को कार में भर लेते हैं, केवल कुछ मिनटों के बाद , घर पहुँचने पर, उसे पुनः कार में से निकालने हेतु।

आपका सुपर मार्केट का भ्रमण – जीवन के अनुभव से कितना मिलता जुलता। यदि आपको अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान हो तो आपका जीवन सुगम हो सकता है, किंतु यह संसार एक अत्यंत आकर्षक स्थल है जहाँ जीवन के अंतिम क्षण तक चयन की प्रक्रिया चलती ही रहती है। सामान की खरीदारी की ही भाँति, आपके वित्तीय (धन संबंधी) व अन्य व्यावहारिक निर्णयों का परिणाम भी अंत में ही स्पष्ट हो पाता है। आप अपनी ट्रॉली जितनी अधिक भरते जाएँगे, उतना अधिक आप उससे बँधते जाएँगे। सुपर मार्केट में की गई खरीदारी के अनुरूप ही आप कुछ वस्तुएँ आवेश में आकर खरीद लेते हैं, अन्य कुछ विचार करके एवं ऐसी भी बहुत सी जो आप मात्र बाहरी रंग-रूप देख कर ले लेते हैं। केवल कुछ ही ऐसी होती हैं जिन्हे आप खरीदने से पूर्व भली प्रकार से परखते व तुलना करते हैं।

आप जीवन में किस प्रकार का आचरण करते हैं यह तथ्य आपकी सुपरमार्केट की खरीदारी के तरीके से जाना जा सकता है। यदि आप एक ज़िम्मेदार जीवनसाथी की तलाश में हैं तो सतर्कतापूर्वक सब खरीदारों को देखें व जिन लोगों के हाथ में एक सूची है और वे उसी के अनुसार सामान एकत्र कर रहे हों, उन्हीं में से अपना चुनाव करें। किंतु यदि आप घुमक्कड़ व साहसी साथी चाहते हैं तो देखें किसकी ट्रॉली ऊपर तक भरी है, और वह व्यक्ति स्वयं फोन पर व्यस्त है, व बिल भुगतान की पंक्ति में खड़े होकर भी इधर से चूयिंग गम, उधर से कोई पत्रिका भी उठा कर ट्रॉली में ठूस लेता है। खैर, यह तो हुए जीवन साथी तलाशने के कुछ सुझाव; कौन जाने आप जिसके साथ अपने भविष्य के सभी भोजन इक्कठे बैठ कर खाने वाले हैं, उसे भी आप उस भोजन को बनाने वाली सामग्री खरीदते समय ही पसंद कर लें!

पुनः विषय पर आते हुए, आपको प्रतीत होता है कि जीवन की विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रना एक स्वचालित प्रणाली के समान है – सुपर मार्केट के उन विस्तृत गलियारों की लंबी पंक्तियों से गुजरने से मिलता जुलता अनुभव। आपको ऐसा अपनी आंतरिक प्रतिबंधिता के फलस्वरूप प्रतीत होता है। यदि आप किंचित रुक कर विचार करें व अपनी जीवन शैली का चिंतन करें, तो आपका चुनाव अपने अभी के चुनावों से पूर्ण रूप से भिन्न हो सकता है। सांसारिक परिपाटी उस भुगतान पटल पर खड़े कर्मचारी की भाँति बिल्कुल रिवाजी व प्रथा गत होती है।

संसार में किसी को भी इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं कि आप वास्तव में क्या महसूस करते हैं; जब तक आप सामान खरीदते रहेंगे, अपना बिल भुगतान करते रहेंगे, तब तक आप को सम्मान मिलता रहेगा। भले ही आपने बहुत सी सामग्री खरीदी हो अथवा तो कुछ भी न खरीदा हो, अंततः आपको वहाँ से बाहर तो आना ही है, व अपने घर पहुँचना है। सुपर मार्केट आपको पसंद हो अथवा नहीं, है तो वह अस्थाई जगह ही और वहाँ से हर हाल में प्रस्थान भी अवश्यंभावी है। प्रतीक्षा हेतु न तो वहाँ कुर्सियाँ लगी हैं और न ही वहाँ छुपने के लिए कोई स्थान है। इस संसार की वास्तविकता भी ऐसी ही है; यह नश्वर है – एक अस्थाई पड़ाव किंतु स्थाई मृग-तृष्णा! यह आपका स्थाई निवास स्थान नहीं है, आपकी आत्मा का तो बिल्कुल नहीं। आप अपने स्थाई निवास पर पहुँच कर ही विश्रान्ति का अनुभव कर पाएँगे। अपने घर पहुँच कर किसी को भी भटकने का भय नहीं सताता, भले ही आपका घर कैसा भी हो अथवा किसी भी प्रकार की स्थिति में क्यों न हो।

अंतःकरण की दुनिया आपका स्थाई निवास है। वह पूर्ण है, हर प्रकार की दिव्य सामग्री से परिपूर्ण; वह भव्य है, असीमित, अनंत विलासिता से भरपूर। कोई तनाव नहीं, कोई सामान का उतारना-चढ़ाना नहीं, कोई बिल भुगतान नहीं, हर समय चयन करते रहने का बोझ भी नहीं। आपकी जैसी भी आवश्यकता हो, अथवा हो सकती हो, वहाँ सब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अपने स्थाई घर जाएँ। वहाँ रहें।

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हरे कृष्ण
स्वामी