प्रतिवर्ष करोड़ों व्यक्ति विभिन्न कारणों से ज्योतिषीय परामर्श लेते हैं। उनमेें से कुछ एक हजार व्यक्ति प्रतिवर्ष मुझे पत्र लिखते हैं। प्रायः वे पत्र लिखते हैं जब वे किसी ज्योतिषी द्वारा उनके भविष्य संबंधी बताई गई किसी बात को लेकर चिंतित होते हैं। और सामान्यता वही भविष्यवक्ता उन्हें कुछ उपाय भी बताते हैं जैसे कि यह नग या पत्थर पहन लो अथवा यह करो, वह करो और आने वाली बर्बादी टल जाएगी। बहुधा (सदैव नहीं) बताए गये उपाय का कुछ आर्थिक मूल्य भी होता है। और यहीं उस ज्योतिषी को लाभ होता है।

यदि वे आप को उपाय बताने के लिये कुछ शुल्क लेते हैं तो उन्हें इससे प्रत्यक्ष लाभ होता है। यदि वे आप को कुछ ऐसा करने के लिये कहते हैं जिससे धन संबद्ध नहीं तो वे आप का विश्वास जीत कर अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। आप सोचते हैं कि यह अच्छा ज्योतिषी है। इसका कोई निहित स्वार्थ नहीं। उसे इससे कुछ भी नहीं चाहिये। किन्तु सत्य तो यह है कि आज तो वह आप को “मुफ्त” उपाय बता रहा है किंतु कल उसके उपायों पर धन व्यय करना पड़ेगा। या फिर, आपको तो वह निःशुल्क ताबीज दे रहा है किंतु कल इस अच्छे भविष्यवक्ता के पास आप जिस ग्राहक को ले कर जाएंगे वह उससे खर्च वसूल ले।

मैं यह सलाह नहीं दे रहा कि सभी ज्योतिष ठगने के लिये बैठे हैं। बल्कि ऐसे कईं हैं जो सुशिक्षित, बुद्धिमान और अंतर्ज्ञानी हैं। जिनका अपनी भविष्यवाणी की पद्धति पर संपूर्ण विश्वास है। दुर्भाग्य से, इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी प्रणाली सच्ची है। हाल ही में, एक व्यक्ति जिस की मंगनी हुई थी उसने मुझे लिखा। कुछ इस प्रकार से –

हम अपने विवाह-संबंधी परामर्श हेतु एक ज्योतिषी के पास गये। उन्होंने हमें बताया कि हम दोनों की जन्मकुण्डली में यह संकेत है कि यदि हमने अपनी विवाह तिथि एवं स्थान परिवर्तित नहीं की तो हमारा वैवाहिक जीवन गंभीर रूप से संघर्षमय व वैमनस्यपूर्ण होगा। और यह भी बताया कि यदि विवाह पश्चात हम भारत में ही रहे तो मेरे जीवनसाथी का जीवन संकट में हो सकता है। कृपया परामर्श दें।

इससे पूर्व कि मैं आपको बताऊँ कि मैं इस प्रश्न और इससे संबंधित ज्योतिषी के विषय में क्या सोचता हूँ मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ जो एक हिन्दी पाठय-पुस्तक से है।

एक समय एक गुरू थे। वे महान तपस्वी व ऋषि थे। उनके पास कईं शक्तियां भी थीं। उनका दस वर्ष का एक प्रतिभाशाली शिष्य था। गुरू ने, जो कि एक सिद्ध ज्योतिषी भी थे, अपने शिष्य की कुंडली देखी और संपादित किया कि उसके भाग्य में मात्र बारह वर्ष का ही जीवन लिखा है। वे अत्यन्त विचलित हो गये और अपने शिष्य के भाग्य-परिवर्तन की प्रतिज्ञा लेकर निकल पड़े।

अपने शिष्य को साथ लेकर वह सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के पास गये और उनसे अपने शिष्य का दीर्घायु करने का निवेदन किया।
ब्रह्मा जी ने कहा “मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा का उद्देश्य समझ रहा हूँ। यह प्रतिभाशाली है और मानवता की बहुत मदद कर सकता है। किंतु मेरा कार्य तो सृजन करना है। हमें विष्णु से प्रार्थना करनी होगी।”

सहायता करने के आशय से ब्रह्मा जी उनके साथ श्यामवर्णी देव विष्णु जी के पास गये जिन्होंने कहा कि उनका कार्य तो सृष्टि का पालन करना है। इसलिये वे जीवन-चक्र को बाधित कर उस शिष्य के जीवन में कुछ और वर्ष जोड़ने में असमर्थ हैं। उन्होंने उन्हें शिवजी के पास जाने की सलाह दी।

ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही उन गुरू-शिष्य के साथ शिवजी से मिलने चल दिये जो कि सृष्टि-विनाशक हैं। सर्वश्रेष्ठ योगी शिव ने इस विषय पर विचार किया और उत्तर दिया कि उनका कार्य तो केवल प्रकृति के नियमानुसार विनाश करना है। कि अपनी शक्ति का उपयोग करके धर्म-चक्र को रोकना उचित नहीं होगा। उन्होंने गुरू को सलाह दी कि वैसा ही चलने दें जैसा प्रकृति ने सुनियोजित किया है।

परंतु गुरू नहीं डिगे और उन्होंने उन सभी से अनुरोध किया कि वे सभी मृत्यु के देवता के पास निवेदन हेतु उनके साथ चलें। पवित्र त्रिदेव, शिष्य और गुरू धर्मराज के पास गये जो कि प्रत्येक प्राणी की मृत्यु सुनिश्चित करने के लिये उत्तरदायी हैं। इसी बीच दो वर्ष व्यतीत हो चुके थे और शिष्य बारह वर्ष का हो गया। वह धर्मराज के महल में ही मृत होकर गिर पड़ा – ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उसके गुरू एवं स्वयं धर्मराज की उपस्थिति में।

गुरू चौंक पड़ा। उसने कहा – “सबसे शक्तिाशाली देवता यहाँ उपस्थित हैं फिर मेरा शिष्य आप सबकी उपस्थिति में कैसे मर सकता है?”

धर्मराज यूं देख रहे थे जैसे वे उस शिष्य की मृत्यु का कारण जानने हेतु उसके दैवी बही खाते का निरीक्षण कर रहे हों और फिर उन्होंने अविश्वास में अपना सर हिलाया।

“क्या हुआ?” गुरू ने पूछा।
धर्मराज ने कहा “इस असाधारण बुद्धि वाले बालक की नियति में महान कार्य करना लिखा था। वास्तव में उसे पकड़ना मेरी शक्तियों के परे था। क्योंकि उसकी मृत्यु तभी संभव थी जब स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उसके गुरू उसे सशरीर लेकर मेरे पास मेरे निवास स्थान पर आ जाएं। यदि आपने उसकी कुंडली न देखी होती तो यह असंभव था।”

मुझे आशा है कि आप कहानी का सार समझ गये। हमें पूरी शिष्टता से कुछ वस्तुओं को स्वीकार कर के आगे बढ़ना चाहिए और कुछ अन्य पर कार्य करना चाहिए।

यदि अपने भाग्य को परिवर्तित करने का कोई भी उपाय है तो वह है स्वयं पर कार्य करना, स्वयं में सुधार लाना। तभी कुछ ठीक हो सकता है। नग, रत्न, पत्थर, गणचिन्ह, आभूषण या जो भी आपके पास हैं, समय-चक्र को परिवर्तित नहीं कर सकते। यदि आपका वैवाहिक जीवन अस्थिर है तो दोनों साथियों को इसके लिये प्रयत्न करना होगा। यदि आप कर्जे में हैं तो आपको अपने खर्चे कम करने होंगे तथा आयवृद्धि करनी होगी। यदि आप मुझसे पूछें तो कोई विशेष पत्थर पहन लेना या किसी विशेष गृह को शांत कर देना कोई उपाय नहीं है।

इसके अतिरिक्त ज्योतिषशास्त्र के उत्कृष्ण साहित्यों में “उपाय” जैसा कुछ भी नहीं है। ज्योतिषशास्त्र को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है – गणित ज्योतिष और फलित ज्योतिष। गणित या संगणनात्मक ज्योतिष वह शाखा है जिसमें मुख्यतः ग्रहों एवं तारों की गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। उन गतिविधियों के फलस्वरूप आप पर व्यक्तिगत रूप से पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन फलित-ज्योतिष के अंतर्गत आता है। “उपाय” जैसा कुछ भी नहीं है। यदि आप कुछ ‘ऐसा’ या ‘वैसा’ करें तो आप इस घटना को टाल सकते हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है। (ऐसा मैं दो आधार पर कह सकता हूँ। पहला-ज्योतिष शास्त्र का ऐसा कोई भी उत्कृष्ण साहित्य नहीं जो मैंने न पढ़ा हो और दूसरा यह कि कईं वर्षों तक मैंने व्यावसायिक तौर पर ज्योतिष-अभ्यास किया है।)

क्या इसका अर्थ यह है कि आपको ज्योतिषी द्वारा बताए गए हर उपाय को निकाल फेंक देना चाहिये? मैं यह नहीं कह रहा कि ज्योतिष में कोई सत्य नहीं है। मैं केवल यह सुझाव दे रहा हूँ कि उपाय आदि सभी सतही बाते हैं। उन्हें एक कूट-भेषज या झूठी-औषधि के समान समझें। इसका उपयोग अपने मनोवैज्ञानिक लाभ हेतु करें। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत करने योग्य इसमें कुछ भी नहीं। और मैं आपको एक सामान्य सिद्धान्त बताता हूँ। यदि कोई, कभी भी, आपमें भय उत्पन्न करे, चाहे वह व्यक्ति निपुण ज्योतिषाचार्य हो, कोई धर्माधिकारी हो, कोई उपदेशक या कोई स्वामी ही क्यों न हो तो उसका परित्याग करने का समय आ गया है। भय को आधार बना लेना सरल होता है। अपनी भलाई हेतु यदि आप एक स्वतंत्र जीवन जीना चाहते हैं तो किसी को भी अपने अन्दर डर भरने का अधिकार ना दें। किसी भी प्रकार नहीं।

यदि आपने मेरा संस्मरण पढ़ा है तो आप ज्योतिष – संबंधी मेरे विचारों से अवगत होंगे। आपके लिये मैं इसका सार प्रस्तुत करता हूँ। अपने जीवन से संबंधित किसी भी छोटे या बड़े निर्णय लेने से पूर्व मैंने कभी भी कोई ज्योतिषीय परामर्श नहीं लिया। चाहे वह किसी व्यवसाय को शुरू करना हो या उसका नामकरण हो, कोई घर खरीदना हो या फिर किसी और देश में प्रस्थान करना हो, किसी कम्पनी में निवेश करना हो या किसी नई यात्रा का प्रारंभ हो। मैंने वही किया जो मेरी योजनानुसार मुझे उचित लगा। मैं केवल कुछ परम्पराओं को सम्मान देने के लिये, अपनी आध्यात्मिक साधना हेतु चंद्रमास तालिका को देखता हूँ।

यदि ज्योतिषशास्त्र आपकी परेशानियों को दूर करने में समर्थ होता तो एक ज्योतिषी के जीवन में कभी भी कोई परेशानी क्यों होती? वे बीमार क्यों पड़ते या फिर उनके बच्चे इतने शैतान क्यों होते? वे आर्थिक संघर्ष क्यों कर रहे होते या फिर उन्हें विवाह विच्छेद की प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़ता? इस पर विचार करें।

क्या आपको लगता है कि विश्व के सबसे शक्तिशाली, सबसे धनी व्यक्ति, महान चिन्तक, आविष्कारक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, व्यवसायी ज्योतिषियों या भविष्यवक्ताओं के चक्कर काटते हैं। कृपया जागें और सभी उत्तरों के लिये अपने अन्दर झांक कर देखें। उसी के अनुसार अपने समय का उपयोग करें तथा कार्य करें। अंत में यही महत्वपूर्ण है।

स्वयं पर और अपने ईश्वर पर विश्वास करें। सही कार्य करें, सही निर्णय लें, दयालु बनें और कभी हार न मानें। फिर आपको ज्योतिष-संबंधी चिंता नहीं करनी पड़ेगी। इसके बजाय आप कठिनाइयों एवं रुकावटों के बीच अपनी राह बना लेंगे जैसे कि एक नदी धरती व चट्टानों के बीच बहती है।

शांति।
स्वामी