किसी ने मुझसे पूछा कि क्या आत्म परिवर्तन एक अंतहीन प्रक्रिया एवं खोज है। उन्होंने लिखा, “क्या हम सदैव प्रयत्न करते रहें?”। उनका संकेत इस ओर था कि यदि हम सदैव स्वयं को सुधारने हेतु स्वयं में दोष ढूंढते रहें तब हम वास्तव में जीवन का आनंद कब लेंगे? क्या इस जीवन को एक कष्ट और मुसीबत के समान होना चाहिए? क्या हमे सदैव स्वयं को सुधारने का प्रयास करते रहना चाहिए? यदि इस पर चिंतन करें तो यह वास्तव में उत्तम प्रश्न है।

मेरा यह मानना है कि किसी दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण में जो उचित एवं आदर्श हो आप को उसके अनुसार स्वयं को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है। वैसे भी किसी आदर्श मानदंड को अपना लक्ष्य बनाना एक व्यक्तिगत पसंद होती है। पूर्णता व्यक्तिपरक होती है; जो आप के लिए एकदम सही हो वह किसी दूसरे व्यक्ति; के लिए संभवत: सभ्य भी ना हो। लक्ष्य यह नहीं कि आप विश्व के उत्कृष्टता के मापदंड को प्राप्त करें। लक्ष्य यह है कि आप स्वयं के जीवन को कृपा, आनंद एवं करुणा से भरें। यही सामग्री हैं एक सदाचारी जीवन की – एक ऐसा जीवन जो संपूर्ण और परिपूर्ण हो।

बहुत समय पहले की बात है। एक नैतिक व्यक्ति था जिसके पास अधिक धन नहीं था। उसके घर के आस पास जल का कोई स्रोत नहीं था। प्रतिदिन वह नदी के किनारे जल लेने जाता था। उसने अपने कंधे पर एक छड़ी टांग रखी थी जिसके दोनों किनारे दो बड़े घड़े लटके हुए थे। दोनो घड़े धातु से बने थे और उनमें से एक तो इतना घिस गया था कि तीन साल पहले उस में एक दरार, लगभग एक छेद, पड़ गई थी। उस के फल स्वरूप, उस घड़े से लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती थि, मानो वह एक कॉफ़ी बनाने का यन्त्र (पर्कोलेटर) हो। दूसरा घड़ा एकदम साबुत था। प्रत्येक दिन वह व्यक्ति दोनों घड़ों को पूर्ण रूप से भर देता परंतु जब तक वह घर लौट कर आता टूटे हुए घड़े में केवल आधा पानी ही रह जाता। घर पहुँचते ही वह तुरंत दोनों घड़ों से पानी को एक मिट्टी के बर्तन में डाल देता।

टूटा हुआ घड़ा स्वयं को दोषी मानता था। वह अपने मालिक की सेवा करना चाहता था, परंतु वह असहाय था और उसके पास दरार को भरने का कोई उपाय ना था। साबुत घड़ा टूटे हुए घड़े का आदर नहीं करता था क्योंकि उस को अपनी श्रेष्ठता पर घमंड था। कईं बार टूटे हुए घड़े को साबुत घड़े के प्रति जलन महसूस होती थी, किंतु वह अधिकतर असहाय और निराश रहता था। चाहे वह जितना भी प्रयास करता वह केवल आधा घड़ा पानी ही घर तक पहुँचा पाता।

एक दिन, जब मालिक नदी किनारे था, टूटे हुए घड़े ने उस से कहा, “मैं एक व्यर्थ घड़ा हूँ। मुझे क्षमा करें क्योंकि मैं अपना काम करने में असमर्थ हूँ। आप मुझे प्रतिदिन ऊपर तक भरते हैं और घर तक इतना भार उठा कर ले जाते हैं, परंतु दूसरे घड़े के समान मैं कभी भी सारा जल नहीं ले जा पाता। कृपया मुझे क्षमा करें – मैं स्वयं को अपराधी मानता हूँ और अत्यंत लज्जित हूँ। आप के पास तो एक बेहतर घड़ा होना चाहिए, एक परिपूर्ण घड़ा, मेरे समान एक टूटा हुआ घड़ा नहीं। कृपया मुझे लोहार को बेच दें। उसे मेरे दुखी और व्यर्थ जीवन का अंत करने दें। आप को भी राहत प्राप्त होगी।”

व्यक्ति ने दयापूर्वक कहा “व्यर्थ? काश तुम जानते मैं तुम पर कितना गर्व करता हूँ। किस में दोष और कमियाँ नहीं होतीं? मुझ में भी हैं। यदि मेरे पास पर्याप्त धन होता, तो मैं कब का तुम्हारी मरम्मत करवा देता ताकी तुम्हे ऐसा नहीं लगता। परंतु हमारी कमियों में ही हमारी दिव्यता भी छिपी हुई है। पूर्ण रूप से दोषों से रहित होने की भावना वास्तव में केवल एक व्यक्तिगत धारणा है, अक्सर एक घमंडी दृष्टिकोण। क्या तुम्हे इस बात का ज्ञान है कि तुमने इस जगह को सुंदर बनाने में कितनी मदद की है?”
“मैं ने? सुंदर बनाया?” टूटा हुआ घड़ा आश्चर्यचकित हो गया।
“हाँ! जब हम आज घर लौट कर जाते हैं, तुम अपनी ओर के पथ का ध्यान से निरीक्षण करना।”

व्यक्ति घर की ओर चलने लगा और टूटे हुए घड़े ने देखा कि पथ के एक किनारे, विशेष रूप से उस किनारे जहाँ वह था, वहाँ सुंदर फूल खिले हुए थे। वहाँ तितलियाँ मंडरा रहीं थीं, मधुमक्खियाँ गूँज रहीं थीं और हवा में लुभावनी सुगंध थी।

“कुछ समय पहले, मैं ने यहाँ एक नए प्रकार के फूल के बीज बोए थे। मुझे लगा कि तुम्हारे से टपकता हुआ जल सहजता से बीज को पोषण प्रदान कर सकता है। और अब देखो! न केवल यहाँ मनोहर फूल हैं परंतु मधुमक्खियाँ दूर तक पराग ले कर गईं हैं और अब हर जगह ऐसे फूल खिलने लगे हैं। ये फूल मधुमक्खियों को अत्यन्त आकर्षित करते हैं और अब गाँव में कईं अधिक मधुमक्खियों के छत्ते हैं। जिसे तुम अपनी कमी बता रहे हो वह यदि ना होती तो आज हमारे बीच यह सौंदर्य, सुगंध और उपयोगिता का होना संभव ही ना था।”

मैं आशा करता हूँ कि आप को यह कहानी उतनी ही पसंद आयी जितनी कि मुझे आयी थी जब मैं ने इसे पहली बार सुना था। हमारे दोषों में पहले से ही पूर्णता के बीज बोए हुए हैं। किसी साबुत घड़े या किसी और व्यक्ति जैसे बनने के लक्ष्य से कईं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम अपनी शक्तियों एवं कमियों का सही उपयोग करें। यदि आप अपनी कमियों के विषय में स्पष्ट एवं निष्कपट हैं और यह देखने के लिए तैयार हैं कि ये कमियाँ किस प्रकार आप के जीवन को और सुंदर बना देती हैं तो अवश्य आप के जीवन में कईं नए मार्ग खुल सकते हैं।

कुछ भी पूर्ण रूप से आप की शक्ती अथवा निर्बलता नहीं होती है। स्थिति और आवश्यकता के अनुसार उनकी उपयोगिता एवं मूल्य बदल सकती हैं। एक स्थिर छड़ी आप को चलने का सहारा देती है, परंतु धनुष बनाने हेतु तो आप को एक सुनम्य छड़ी की आवश्यकता पड़ेगी। एक दृष्टिकोण से जिसे आप शक्ति समझते हैं दूसरे दृष्टिकोण से वही निर्बलता हो सकती है। इंसान में चाहे जितने भी दोष हों वह बहुमूल्य है और इस संसार में उसे और हर एक को कोई ना कोई भूमिका निभानी होती है।

स्वयं को पूर्ण रूप से स्वीकार करें।

शांति।
स्वामी