कुछ पाठकों ने मुझे निम्न संदेश ई-मेल किया –

तिलक

मैंने बहुत लोगों को आज्ञा चक्र के स्थान पर चंदन व कुमकुम का तिलक लगाए हुए देखा है।
मस्तक के ऊपरी भाग पर चंदन तिलक व आज्ञा चक्र पर कुमकुम तिलक लगाने का क्या प्रयोजन है?

परंपरानुसार तिलक एक प्रतीक है। शुभ-मांगल्य का प्रतीक, समर्पण की छाप, श्रद्धा व आत्म-विश्वास का द्योतक। सनातन धर्म के अंतर्गत सभी धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक (मस्तक पर एक चिन्ह) व हाथ में मौली (पवित्र धागा), उत्सव के अभिन्न अंग हैं। सामाजिक परिपेक्ष्य में, विवाहित स्त्री इसे अपने मस्तक पर लगा विवाह-बंधन के प्रति अपने संपूर्ण समर्पण को पुष्ट करती है। अविवाहिता अपना सौन्दर्य निखारने हेतु इसे मस्तक पर सजाती है व अपना आत्म-विश्वास प्रकट करती है। धार्मिक परिपेक्ष्य में, हर मत-संप्रदाय के लोग भिन्न भिन्न प्रकार से तिलक धारण करके अपनी पहचान बताते हैं। एक शिव भक्त – शैव – त्रिपुण्ड धारण करते हैं; विष्णु भक्त – वैष्णव – ऊर्धव त्रिपुण्ड बनाते हैं, वहीं शाक्त – जगतजननी माँ के भक्त एक गोल बिंदु बनाते हैं। इसके पीछे हर मत ने अपनी अलग धारणा भी बना रखी है।

किंतु एक सिद्ध द्वारा तिलक धारण करने के भिन्न कारण होते हैं। सगुण उपासक, जो मूर्ति रूप की पूजा करते हैं, उनके लिए तिलक लगाना एक अनुस्मारक है। यह उन्हें सदा अपने ईष्ट के प्रति शरणागत भाव का स्मरण करवाता रहता है। निर्गुण उपासक, आकार रहित ब्रह्म को मानने वाले, आज्ञा चक्र (दोनों नेत्रों की भवों का मध्य बिंदु) पर तिलक लगाते हैं। यह अपनी एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होता है।

उपरोक्त, पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित व्याख्याएँ हैं। किंतु मैं इस कारण तिलक धारण नहीं करता। मैं अपने मस्तक पर दो तिलक लगाता हूँ। एक दोनों नेत्रों की भवों के मध्य कुमकुम तिलक व दूजा चंदन तिलक, मस्तक के ऊर्ध्व भाग पर। कुमकुम तिलक ‘श्री’ के सम्मान में – ‘श्री’ अर्थात जगत जननी माँ, एवं चंदन तिलक ‘हरि’ के सम्मान में। कुमकुम तिलक राधा, पराशक्ति, अथवा प्रकृति के लिए मान सकते हैं। चंदन तिलक कृष्ण, शिव अथवा पुरुष के सन्दर्भ में। मैं यह तथ्य अत्यंत दृढ़ता व स्पष्ट्तापूर्वक समझाना चाहता हूँ कि ईश्वर के उपरोक्त किसी भी नाम में कणमात्र भी भिन्नता नहीं।

यह सब एक ही ईश्वर के भिन्न भिन्न नाम हैं। मेरा भिन्न भिन्न नाम बताने का आशय मात्र इतना है कि आप सब अपनी अपनी मान्यता अनुसार अपने भाव इनसे जोड़ पाएँ। अधिक सरलता हेतु, अपने शरीर के बाएँ भाग को आप स्त्री तत्व (शक्ति रूप) व दाएँ भाग को पुरुष तत्व कह सकते हैं। दोनों एक होकर संपूर्ण शरीर कहलाते हैं। ईश्वरीय सम्मान से भी अधिक, मैं तिलक ईष्ट के प्रति अपने भाव के लिए लगाता हूँ। अपने ईष्ट के लिए सुसज्जित होने के समान। इसका एक अन्य कारण भी है जो मैं केवल निजी भेंट में वर्णित कर सकता हूँ। जब कभी हम मिलें, कृपया मुझे स्मरण करवाएँ और मैं वह तथ्य प्रकाशित करूँगा।

“सौंदर्य लहरी” पर भाष्य – टीका

हम सब आपके लेख नियमित रूप से पढ़ते हैं व मार्ग-दर्शन प्राप्त करते रहते हैं। क्या मैं नये लेख के लिए विषय, सुझाव रूप, आपके समक्ष रख सकता हूँ? आप एक विशेष ग्रंथ की व्याख्या करना प्रारंभ करें। हम सब भाग्यशाली हैं कि आप अपने अनुभव युक्त ज्ञान वचनों द्वारा हमें धार्मिक ग्रंथों की जानकारी देते हैं। हमें अपार प्रसन्नता होगी यदि आप “सौंदर्य लहरी” से प्रारंभ करें। यदि आप हर लेख में पाँच श्लोकों की विवेचना करें, तो हम बीस लेखों में ग्रंथ का समापन कर सकते हैं। प्रणाम व कृतज्ञ भाव युक्त…..”

आपका सुझाव उत्तम है। सौंदर्य लहरी पर अनेक भाष्य-टीका पहले से विद्यमान हैं। इस ग्रंथ की समीक्षात्मक विवेचना में सब कुछ लिखा जा चुका है, मेरे पास नया क्या होगा? मेरा यह निजी रूप से मानना है कि साधक को आत्म-अन्वेषण के मार्ग पर लगाना अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। यह मार्ग उन्हें स्वयं के सत्य की खोज तक ले जाएगा। सौंदर्य लहरी की कुल एक सौ सूक्तियों में से प्रत्येक के लिए एक विशिष्ट प्रयोग, यंत्र व विधि होते हैं।

श्री विद्या के उपासकों के लिए मैं कुछ गोपनीय तथ्य व विशेष सूत्र बता सकता हूँ जो उन्हें सफलता प्राप्ति में सहायक सिद्ध होंगे। मेरे विचार में ललिता-सहस्रनाम ग्रंथ छोटा भी है व उतना ही सामर्थ्यवान भी। सहस्र्नाम की १८१ सूक्तिया आपको संपूर्ण ज्ञान व जानकारी प्रदान कर सकती हैं। इसके साथ जगत जननी माँ का ‘मूल विद्या’ मंत्र व ‘श्री यंत्र’ एवं श्री सुक्तम द्वारा माँ का आवाहन – इतना हो तो आप अनेकानेक चमत्कारों के स्वयं साक्षी बन सकते हैं। ऐसा अनुपम ज्ञान व विधियाँ केवल गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत अथवा सिद्ध द्वारा साधक को व्यक्तिगत रूप से प्रदान की जाती हैं।

माँ के पवित्र-संपूर्ण भाव में दृढ़ता से सुस्थित साधक के लिए किसी यंत्र या उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। जिन्हें माँ के अलावा अन्य कोई इच्छा नहीं होती, जगत माता ऐसे भक्त को सुलभ दर्शन देती हैं, भले ही उसे पूजा-अर्चना का लेशमात्र ज्ञान न हो। किंतु मैं यह पुनः कहना चाहूँगा कि माँ के दर्शन के जिज्ञासु को आरंभ में कठोर प्रयत्न करने के लिए तैयार रहना होगा। आपकी साधना के प्रारंभिक चरण के अंत के पश्चात, सौंदर्य लहरी की एक सौ सूक्तियो का वास्तविक अर्थ उजागर होगा। इतना ही नहीं, आप वास्तव में आनंद व सौंदर्य की दिव्य लहरों का प्रत्यक्ष अनुभव कर पाएँगे। प्रिय बंधु, वह दिव्य अनुभव किसी बौद्धिक ज्ञान से अनंत गुना आनंदपूर्ण व चिरस्थाई होगा। मुझे आशा है आप इससे सहमत हैं; यदि नहीं, तो अपनी टिप्पणी अवश्य भेजें। यह एक महत्त्वपूर्ण विषय है।

दिव्य – संगीत

संगीत में वह दिव्यता विद्यमान रहती है कि यह मनुष्य की मनोदशा बदलने में सक्षम है… आध्यात्म जगत व संगीत में क्या संबंध है व इसकी आध्यात्म में क्या भूमिका है। कुछ लोग ध्यान-पद्धति में इसका उपयोग करते हैं।
आपने एक व्याख्यान में गन्धर्वो के गायन का वर्णन किया था। इनका अनुभव किस प्रकार किया जा सकता है, कृपया विस्तार से बताएँ। अपने चारों ओर व्याप्त संगीत को आप गंधर्व गायन से कैसे जोड़ कर देखते हैं।

यदि मैं गन्धर्वो के गायन सुनने संबंधी अपने अनुभव वर्णित करना आरंभ करूँ तो आप में से बहुत से मुझे सनकी घोषित कर देंगे। सौभाग्य से अब इस तथ्य का कोई प्रयोजन नहीं रहा। अपने अनुभवों का लिखित वर्णन, भले ही अनुचित ढंग से, मेरे विचार में किसी के लिए भी लाभप्रद नहीं। कभी प्रत्यक्ष वार्तालाप के समय मैं सहर्ष अपने अनुभव आप सबको बताऊँगा। जब वार्ताकार व श्रोता में एक श्रद्धा का सेतु बंधन विकसित हो जाए, ऐसे वातावरण में बाँटे हुए अनुभव जिज्ञासु के लिए मूल्यवान होते हैं – ऐसा मेरा मानना है। वस्तुतः, मैं उन्हें वह उचित मार्ग दिखाऊंगा जिस पर चल कर वे स्वयं तथ्यों को अनुभव कर उनका सत्यापन व अनुसमर्थन भी कर सकते हैं। संगीत, चाहे भौतिक हो अथवा दिव्य, उसके विषय में लिपीबद्ध पढ़ना, समय का अनुचित उपयोग होगा। क्यों न वास्तविक अनुभव की ओर कदम बढ़ाया जाए! और यदि आप इस अनुभव के लिए आतुर हैं, तो पहले स्वयं को योग्य पात्र बनाएँ। इसके लिए आत्म-शुद्धि व आत्म-परिष्कार के पथ पर चलना होगा।

जब तक अंतः करण के दिव्य संगीत के साथ आप का एकाकार नहीं होता, तब तक आप बाह्य संगीत को सुनें व आनंदित हों, न कि केवल उसे कानों में पड़ने मात्र तक रखें। अंतः करण में विद्यमान दिव्य संगीत ही ‘अनहद नाद’ है – एक अमूल्य योगिक अनुभव। हर व्यक्ति जो एक संपूर्ण वर्ष उत्तम ध्यान साधना में संलग्न हो पाए, वह इस दिव्य अनुभव का योग्य अधिकारी बन सकता है। इस एक वर्ष की अवधि में से छ: मास पूर्ण अनुशासन पूर्वक इस पथ पर व्यतीत करने होंगे।

कृपया स्मरण रखें कि बिना गहन प्रयास किए, वास्तविक अनुभव असंभव है। इसमें मैं सहर्ष आपका सहयोगी बन सकता हूँ। कुछ भी वास्तविक अथवा दिव्य प्राप्त करने हेतु आपको अत्यधिक प्रयास तो स्वयं ही आरंभ करना होगा ताकि आपकी आकांशा यथार्थ का रूप ले पाए।

हरे कृष्ण
स्वामी