आत्म-परिष्कार के योग की व्याख्या में हमने मानसिक परिवर्तन के अंतर्गत अनेक प्रकार के अभ्यासों का वर्णन किया। संक्षेप में ये अभ्यास मौन, एकांत, त्याग, संकल्प-शक्ति, श्रवण, एकाग्रता व त्राटक से संबन्धित हैं। बहुत से व्यक्ति यह जानने हेतु मुझे संदेश भेजते हैं कि ध्यान करने की उचित विधि क्या है, एवं यह भी कि वे अपने अभ्यास काल में मन को वश में रख कर ध्यान नहीं कर पाते। इस समय हम उस बिन्दु पर पहुँच चुके हैं जब मैं ध्यान के अभ्यास पर विस्तार से चर्चा करूंगा। यदि आप उपरोक्त वर्णित अभ्यासों में प्रयासरत रहें तो आप ध्यान करने की अपनी क्षमता को अनंतगुना विकसित कर पाएंगे। इस लेख में मैं आपके समक्ष एक लघु कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ।

एक बार एक धनी, किन्तु अप्रसन्न स्त्री, जो जीवन में अंध-विश्वासों को बहुत स्थान देती थी, वह एक साधु के सम्मुख पहुंचती है। वास्तव में वह व्यक्ति एक साधु न होकर, साधु वेश में एक साधारण औसत बुद्धि का प्राणी था। वह सांसारिक लोगों से भौतिक विषयों पर कुछ इस प्रकार वार्तालाप करता था कि लोगों को उसकी बातों से एक प्रकार की राहत का अनुभव होता था। साधु सोचता था कि चूंकि वे लोग उसे धन व अन्य सामग्री भेंट करते हैं तो उन लोगों की बातें सुनने में कोई दुविधा नहीं। वास्तव में यही उसकी आजीविका का साधन था, और लोग सोचते थे कि साधु से बात करके उन्हें अपनी कठिनाईयों से निजात मिल जाएगी। अस्तु, वह धनी स्त्री अपने कष्टों व शिकायतों की एक लंबी सूची के साथ उस साधु के समक्ष पहुँचती है।

उसकी तथाकथित समस्याएँ मूल रूप से स्वनिर्मित व अति निम्न स्तर की थीं। आप किसी रोग का निदान कर सकते हैं, अथवा रोगी को निरोग कर सकते हैं, किन्तु आप पहले से ही स्वस्थ व्यक्ति को कैसे स्वस्थ करेंगे? वह स्त्री सब कुछ पा कर भी अप्रसन्न थी। वह स्वस्थ थी, उसका परिवार सभ्य था, उसके पास प्रचुर जमा पूंजी थी, अच्छा घर था – अर्थात, उसके पास सब कुछ था। साधु ने सोचा कि उसके पास ऐसा कौन सा अमृत या मंत्र है जो वह उस स्त्री को दे सकता है। किन्तु, वह उसे खाली हाथ भी नहीं लौटाना चाहता था।

एक लंबी सोच के बाद उसने स्त्री से कहा, “मैं तुम्हें एक अत्यंत शक्तिशाली, प्राचीन, चमत्कारिक वस्तु प्रदान करूंगा जो तुम्हारी सभी कठिनाईयों को दूर कर देगी। इसे सबसे छुपा कर रखना होगा।”

स्त्री बात समझ जाती है।

वह उस स्त्री को तांबे का छेद वाला एक सिक्का प्रदान करता है व कहता है कि पूर्णिमा की रात्रि उस सिक्के को पीपल के पेड़ के नीचे मिट्टी में दबा दे।

“किन्तु उस चमत्कार के घटित होने के लिए एक शर्त अवश्य पूर्ण होनी चाहिए,” वह बोला।
“जिस समय तुम इस सिक्के को दबाओ, उस क्षण तुम्हारे मन में किसी तीन टाँगों वाले श्वेत हाथी, एक लंगड़े वानर अथवा बोलने वाले मेंढक का विचार बिलकुल नहीं आना चाहिए। यदि तुमने एक पल के लिए भी इनमें से किसी का चिंतन किया तो चमत्कार विफल हो जाएगा।”

वह स्त्री साधु को मिष्ठान, स्वर्ण व वस्त्र आदि भेंट देकर प्रसन्नता पूर्वक विदा हो जाती है। पूर्णिमा आने में अभी दस दिन शेष थे। वह प्रतिदिन स्वयं को स्मरण करवाती है कि उसे तीन टाँगों वाले हाथी, लँगड़े वानर या बोलने वाले मेंढक का चिंतन नहीं करना। और, उस रात जब उसे चमत्कार का उपयोग करना था, उसके मन में केवल और केवल उन तीनों का ही विचार था जिनके बारे में सोचने की रोक थी।

इस तथ्य पर विचार करें।

वह चमत्कार विफल हो गया, और, इसके लिए वह किसी को भी दोषी नहीं ठहरा सकती थी। यदि साधु ने उसे यह नहीं कहा होता कि क्या नहीं सोचना तो, संभवतः, उसके मन में किसी तीन टाँगों वाले हाथी अथवा बोलने वाले मेढक का विचार कभी भी न आता। जब आप उन विषयों पर अपना ध्यान अधिक केन्द्रित करते हैं जो आप अपने जीवन में नहीं चाहते, जो दुखदायी हों, किन्तु बार बार उन्हीं का चिंतन करते रहते हों, तब आप उन अवांछित परिस्थितियों को स्वतः जीवन में आकर्षित कर लेते हैं।

यह कथा आपको ध्यान के विषय में हर वह बात समझाती है जिसका जानना आपके लिए आवश्यक है। जब आप इस तथ्य पर अधिक बल देते हैं कि ध्यान के अभ्यास के दौरान मुझे क्या क्या नहीं सोचना, अथवा क्या नहीं करना, तब आप अशांति, अटकाव एवं भटकन अनुभव करेंगे। अपने मन की स्वाभाविक व निर्मल स्थिति को जानने व पाने हेतु, जिसे समाधि भी कहा जाता है, आपको पूर्णतः स्वाभाविक रूप से ध्यान का अभ्यास सीखना होगा। बस धीरे धीरे, प्रेमपूर्वक, ध्यान की वस्तु पर एकाग्र होते हुए व सभी प्रकार के बौद्धिक चिंतन को त्यागते हुए आप स्वतः उस दिव्य आनंद की अनुभूति में विश्रांति पाने लगेंगे।

आगामी लेख में मैं दो प्रकार के ध्यान, व उसके पश्चात, चार प्रमुख व्यवधान व उन पर नियंत्रण की विधि पर प्रकाश डालूँगा।

यदि आप ध्यान के प्रति समर्पित हो जाएँ, तो कौन आपको रोक सकता है? यदि आप अपने मन की न सुनें तो और कौन है जो वार्तालाप कर रहा है?

शांति।
स्वामी