एक समय की बात है, कुछ बच्चे समुद्र तट पर खेल रहे थे। वे रेत पर महल और अन्य संरचनाएं बनाने में व्यस्त थे। कुछ बच्चों के पास अधिक सामान थे अन्य की तुलना में। उनके पास बेलचा, मग, बाल्टी व कुछ अन्य उपकरण थे। अपना महल बनाने में उन लोगों ने घंटों लगाए।

उनमें से एक बच्चे को संरचना बनाने में कोई रुचि नहीं थी, वह केवल गौर से सब देख रहा था। बाद में दोपहर के समय जब सारे बच्चे अपने रेत के महल की लगभग पूर्णता तक पहुँच गए, वह बच्चा महल को रौंदने और एक लात में ध्वस्त करने के प्रलोभन को नहीं रोक सका। और फिर एक लात में उसने एक महल को धराशायी कर दिया।

दूसरे सारे बच्चे उसकी पिटाई करने के लिए इकट्ठे हो गए। उन्होंने उस पर मुक्के से प्रहार किया, प्लास्टिक के बेलचे से भी उसे चोट पहुंचायी, उस पर रेत भी फेंका। इन सबके कारण उसके शरीर पर खरोंच पड़ गए, और चेहरे पर भी घाव का चिन्ह बन गया। वह वहाँ से दूर जाकर रोने लगा। दूसरे सारे बच्चे बहुत नाराज़ थे, उन्हें उससे कोई सहानुभूति नहीं थी, वे पुनः महल बनाने में जुट गये। मुश्किल से एक घंटा गुज़रा होगा जब अंधेरा होना आरम्भ हो गया। लोग अपने घरों को जाने लगे। बच्चों ने भी उस दिन के लिए अपना काम वहीं समाप्त कर दिया।

जाने के पहले उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरे के महल को रौंद डाला। कुछ मिनटों तक ऐसा करने के बाद, अपने पूरे दिन के परिश्रम को मिट्टी में मिलाकर, वे घर चले गए।

वह अकेला, पिटा हुआ बच्चा यह सोचता रहा कि क्या उसकी कार्यवाही गलत थी या समय, या फिर उसे इसलिये पीटा गया कि उसे उस महल को ढाहने का कोई अधिकार ही नहीं था क्योंकि उसने उसे नहीं बनाया था? उसने सोचा ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही कार्यवाही जो उसने की तो दूसरों का क्रोध भड़क गया जबकि दूसरों ने स्वयं वही कार्यवाही की तो खुशियों का झरना बहने लगा।

चलिए एक क्षण के लिए उपरोक्त कहानी में वर्णित किसी भी कार्यवाही का आकलन नहीं करते हैं। इस कहानी के अर्थ पर विचार करते हैं। कोई अंतर नहीं पड़ता आप चाहे जिसका समर्थन करें, यह कुछ भी रेत के महल से अधिक स्थायी नहीं है। अनुशासन जबकि आवश्यक है, क्रोध को केवल किसी बहाने से ही सही ठहराया जा सकता है, आप चाहे जैसे भी इसे न्यायोचित बतायें सच्चाई तो यह है कि यह क्रोध करनेवाला और क्रोध झेलनेवाला दोनों को आहत करता है।

जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट में संकेत दिया था, मैं आपकी सहायता करता हूँ विभिन्न प्रकार के क्रोधी लोगों को समझने में। मुख्यतः वो लोग निम्नांकित तीन वर्गों में आते हैं –

१. पाषाण शिल्पकार

सोचिये छेनी का प्रयोग कर पत्थर पर एक लकीर बना दी जाए। यह उसमें सदा के लिए रह जाएगा। कुछ लोगों में क्रोध पत्थर पर खींची लकीर के जैसा होता है। परिस्थितियाँ, संयोग, जीवन की कुछ घटनाएं, फिर परिस्थितियों और घटनाओं के प्रति उनका दृष्टिकोण उनको क्रोधित कर देता है। जिन परिस्थितियों से वो गुजरें हैं, वे उसे भुला नहीं पाते हैं, वे अक्षम होते हैं क्षमा करने में जिन्होंने उनके साथ गलत किया, फलतः अपने ह्रदय में क्रोध और नकारात्मकता को पकड़े रखते हैं। उत्कीर्ण किये हुए चिन्ह की तरह क्रोध इनके मस्तिष्क पर स्थायी चिन्ह छोड़ देता है। इनका भरना कठिनतम होता है। उस पत्थर की सोचिये, उसकी अपरिवर्तनीय क्षति तो हो गयी, किसी भी तरीके से वापस जाकर पत्थर को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं लाया जा सकता है। इस तरह का क्रोध निकृष्टतम होता है। वो लोग, जो अपने ह्रदय में नकारात्मकता को छनने और उबलने देते हैं, पत्थर के मूर्तिकार के तुल्य हैं। वे ज्यादातर निराशावादी और नकारात्मक, उद्विग्न और चिड़चिड़े रहते हैं। प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति, प्रत्येक नकारात्मक भावना, सिर्फ क्रोध ही उनकी प्रतिक्रिया होती है। प्रत्येक घटना के साथ, उनका रोष और बढ़ जाता है, उनके क्रोध की रेखा और गहरी एवं मोटी उत्कीर्ण हो जाती है।

२. रेत शिल्पकार

इस तरह के क्रोधी हमारे संसार में सामान्यतः अधिक हैं। विचार करके रेत पर खींची गयी लकीर, चाहे कितनी भी गहरी और कितनी भी मोटी हो, वह स्थायी नहीं होती। रेत के महल की दीवार चाहे कितनी भी सुदृढ़ क्यों न हो, एक लहर आती है और उसे किनारे से बहा ले जाती है। ठीक इसी तरह बहुत से लोग क्रोध तो करते हैं पर उसे ह्रदय में बसा कर नहीं रखते, वे उसे जाने देते हैं। जब उन्मत्त होते हैं, वो अपने विचारों या निर्णयों के महल बना सकते हैं, लेकिन आनंद की एक तरंग, अच्छे समय की एक लहर, क्षमा की एक पहल, पश्चाताप की एक झलक जब दोषी की तरफ से दिखती है, ये शीघ्र ही क्रोध की दीवार को गिरा कर अपने सामान्य प्रसन्नता की स्थिति में लौट जाते हैं। बुद्धिमान और दयालु अपने ह्रदय को इतना शुद्ध अवश्य रखते हैं कि वे पत्थर के मूर्तिकार नहीं बने, वे क्रोधित हो सकते हैं किन्तु उसे जाने देते हैं। अंततः रेत के लिए यह किसी क्षति का कारण नहीं बनते, लकीरें धुल जाती हैं, क्षण भर में संरचनाएं ध्वस्त हो जाती हैं।

३. लहरों पर बहनेवाला

उत्कृष्ट प्रकार! यदि आप लहरों पर बहनेवाले का अवलोकन करें, आप पायेंगे कि ये भी लकीरें खींचते हैं, लेकिन पानी पर। जितनी शीघ्रता से लकीर खींची जाती है वैसे ही वो ग़ायब हो जाती हैं। पानी पर बहनेवाले का क्रोध क्षणिक होता है। जितनी तेजी से वो ऊपर चढ़ता है उतनी ही शीघ्रता से वह नीचे भी उतर जाता है। इससे पहले कि ये दुःख और ठेस पंहुचानेवाले कोई शब्द बोलें, इनका क्रोध ठंडा हो जाता है, ये क्रोध को अपने ह्रदय में बसा कर नहीं रखते, कोई संरचना नहीं बनाते, यद्यपि अस्थायी, वो लहरों की सवारी करते हैं और उसे जाने देते हैं।
अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया एक व्यक्ति को तालाब के जैसा बना देती है, एक स्वच्छ जलाशय, शांत और स्थिर।

अपने क्रोध पर विजय पाने के लिए, अपने स्वयं के स्वभाव को समझिये, आप शिल्पकार हैं या लहरों पर बहनेवाले, और अपने क्रोध की प्रवृत्ति को जाँचिये, यह ज्वालामुखी या काफी को ब्रू करने का यंत्र है। उसके बाद, स्वयं को अपने क्रोध से शक्तिशाली बनने की दिशा में कदम बढ़ाइये, क्योंकि यदि आप प्रबल हैं तो क्रोध पर विजय पा लेंगे, अन्यथा ये आप पर हावी हो जाएगा।

इसमें मैंने क्रोध भाव का सार बताया है, अपने अगले पोस्ट में, मैं इससे उबरने की वास्तविक प्रक्रिया को लिखूंगा। तब तक आप अपनी और अपने क्रोध की प्रवृत्ति पर विचार करने में कुछ मिनट लगाइये । आप स्वयं को जितना जानेंगे, आप जो भी बनना चाहते हैं अच्छे से बन पायेंगे।

शांति।
स्वामी