“त्याग” संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है – जाने देना, छोड़ देना, परित्याग कर देना, संबंध विच्छेद कर लेना, स्वयं को वस्तु के आकर्षण से मुक्त कर लेना। त्याग का अभ्यास वह शक्तिशाली माध्यम है जिसका परिणाम अत्यंत वृहद होता है। यह अभ्यास आपमें मूलभूत परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है, और, यही वह अभ्यास है जिसके द्वारा आप अपनी परमानंद की स्थिति प्राप्त कर उसी में स्थित रह सकते हैं।

कर्म का त्याग असंभव है। प्रत्येक मनुष्य सदैव विचार, वाणी अथवा शरीर द्वारा ( मनसा – वाच्या – कर्मणा ) कर्मरत रहता है। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –
ना ही देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफल त्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ (भ० गी० १८.११)
व्याख्या – जब तक प्राणी देह में है, कर्म का संपूर्ण त्याग असंभव है। किंतु जब प्राणी असंग हो जाता है व कर्म फल के प्रति अलिप्त हो जाता है, वास्तव में तब वह योगी कहलाता है।

प्रयास के बिना यह संभव नहीं हो सकता। यह कोई स्वतः सिद्ध कृत्य नहीं है। अनासक्ति व परित्याग की ऐसी स्थिति तक पहुँचने से पूर्व, समर्पित भाव सहित इस पर कार्य करना आवश्यक है। यहाँ इस प्रश्न की सार्थकता बनती है कि – वह कार्य क्या हो सकता है? मेरे आज के लेख का केंद्र बिंदु यही है।

अन्य किसी भी गुण की ही भाँति, विरक्त भाव को भी सीखा जा सकता है। विरक्त भाव के साथ जीवन यापन करना सर्वथा संभव है। यह, आपकी सोच के विपरीत, अत्यंत सुगम भी है। आपको केवल निम्नलिखित तथ्यों का व्यावहारिक अभ्यास करना है, व परिणाम आप स्वयं आंक सकते हैं। इस अभ्यास को स्पष्ट रूप से समझने व व्यावहारिकता में लाने के लिए मैं इसे दो भागों में विभाजित कर रहा हूँ। प्रथम स्तर पर भौतिक पदार्थों का त्याग आता है, यह मानसिक बल बढ़ाता है। दूसरा स्तर विचारों अथवा भावनाओं के त्याग का है । इसे आगामी लेखों में भावनात्मक परिवर्तन के अंतर्गत समझेंगें। अभी के लिए मेरे विचार भौतिक त्याग पर केंद्रित हैं।

आप अपनी पसंद की वस्तुओं/पदार्थों का परित्याग करना आरंभ करें। वास्तविक रूप से, यही अभ्यास है; परित्याग करना आरंभ करें। तो क्या आपको अपनी कार, घर एवं अन्य उपयोगी सामग्री को त्याग देना होगा? नहीं, कदापि नहीं। हमारी आसक्ति साधारणतः वस्तुओं में नहीं होती बल्कि उनके द्वारा प्राप्त सुख व प्रसन्नता हमें आसक्त करते हैं। आप चाय के प्रति नहीं वरन चाय पीने से प्राप्त सुखानुभूति के प्रति आसक्त होते हैं। अतः यदि आप चाय के स्वाद से प्राप्त सुख का त्याग करने के इच्छुक हो जाएँ तो चाय पीने की आदत आपको स्वतः, बिना प्रयास के ही, छोड़ देगी।

त्याग करने का अभ्यास प्रथम स्तर पर उन वस्तुओं की पहचान से आरंभ होता है जो आपको अतिप्रिय हों। उनमें से किसी एक वस्तु से आरंभ करें। एक निश्चित अवधि के लिए उसे छोड़ने का निश्चय करें। वह एक सप्ताह, एक मास, एक वर्ष अथवा आपके द्वारा निश्चित कोई भी समयावधि हो सकती है। कृपया निम्न तालिका का अवलोकन करें –

त्याग

त्याग के समग्र रूप से अभिप्राय है कि अपनी अतिप्रिय वस्तु के ग्रहण, उसकी इच्छा, उसका चिंतन व उसके विचार मात्र का भी पूर्णतः त्याग। उपरोक्त तालिका के आधार पर, एक उदाहरण के साथ मैं इस अभ्यास की विवेचना यहाँ कर रहा हूँ –

आपको कॉफी पीना अतिप्रिय है। केपूचिनो आपका पसंदीदा स्वाद है। पिछले कई वर्षों से आप नित्य दिन में दो बार अपनी पसंदीदा कॉफी का आनंद लेते आ रहे हैं। आप इसके अभ्यस्त हो चुके हैं। यदि किसी दिन आपको आपकी कॉफी का प्याला न मिले तो आपको उसका अभाव अखरने लगता है। संभवतः अपनी आदत अनुसार कैफ़ीन की मात्रा न मिलने पर आपको सिरदर्द भी आरंभ हो जाता हो। यही आसक्ति है, जो आपसे आपकी स्वतंत्रता छीन कर आपको वस्तुओं का गुलाम बना देती है (इस विषय पर अधिक जानकारी हेतु मेरा सत्य लेख को पढ़ें )। तब एक दिन, स्वयं को त्याग के अभ्यास-मार्ग पर आरूढ़ करते हुए, आप ४० दिन तक कॉफी न पीने का निश्चय करते हैं। अब उन ४० दिनों में यदि –

१. आप एक बार भी कॉफी पी लेते हैं (तालिका में ग्रहण वाली पंक्ति पढ़े ) – कॉफी ग्रहण करने का अर्थ है आपका अभ्यास टूट जाना। इसका प्रभाव लाल रंग द्वारा दर्शाया गया है। यह तत्कालीन असफलता है। आपको पुनः आरंभ करना होगा।

२. कॉफी के लिए इच्छा बने रहना – इसका अर्थ है कि आप अपने मस्तिष्क से कॉफी की इच्छा निकालने में असमर्थ हैं। आप अपनी उस इच्छा का दमन कर रहे हैं। आपका अभ्यास दृढ़ है किंतु अभ्यास का स्तर २०% तक निम्न स्तर पर आ गया है।

३. कॉफी के बारे में चिंतन करते रहना – बार बार कॉफी का विचार आप में स्वतः कॉफी पीने की इच्छा जागृत कर देगा। स्मृति के अभाव में व्यर्थ का चिंतन बना रहता है। जब कभी कॉफी का ध्यान आए, उस समय यदि आप अपने मन को धीरे से किसी दूसरे विषय पर ले जाने की स्मृति बनाए रखें तो समझें आपका अभ्यास अच्छे स्तर पर है।

४. कॉफी का विचार – कॉफी को देख कर अथवा अन्य किसी को कॉफी पीता देख कॉफी का विचार मन में आ सकता है। इससे कोई परहेज नहीं। आवश्यक यह है कि ऐसा विचार मन में उठते ही उसका परित्याग कर दिया जाए। विचारों का आना स्वाभाविक है। जब आप अपने अभ्यास व संकल्प के प्रति सचेत व सतर्क रहते हैं तो विचार शक्तिविहीन व हानिरहित हो जाते हैं; वे उठने के साथ साथ ही विलुप्त होते चले जाते हैं।

जब आप त्याग का मार्ग अपनाते हैं तो आप बंधन मुक्त हो जाते हैं। यह आपको स्वतंत्रता, शांति व संतुष्टि के स्तर पर ले जाता है।

अंततः, यदि आप हर उस प्रसंग से स्वयं को असंग रख पाएँ जो आपके दुख का कारण हो, हर वह दुखद भावना; नकारात्मक/असंगत विचार आदि, तो आप अपनी आनंदमय स्थिति का स्वतः अनुमान लगा सकते है।

आगे बढ़ें व त्याग करना सीखें ताकि आप स्वयं को स्वाधीन कर सकें।

शांति।
स्वामी