एकनिष्ठ एकाग्रता बनाने हेतु यह अंतिम अभ्यास है। विगत दो लेखों में मैंने श्रवण – सुनने का अभ्यास, एवं एकाग्रता – केन्द्रीकरण का अभ्यास, इन दो पर चर्चा की; दोनों की संरचना आपके द्वारा एकनिष्ठ एकाग्रता बनाने में सहायतार्थ की गई है। इस लेख में मैं त्राटक – स्थिर दृष्टि, के अभ्यास पर प्रकाश डालूँगा। अपनी दृष्टि किसी एक वस्तु पर स्थिर करने का ढंग त्राटक कहलाता है। वास्तविक ध्यानावस्था प्राप्त करने हेतु अपनी दृष्टि को स्थिर कर पाने की क्षमता अत्यंत आवश्यक है।

यदि एक ध्यानयोगी अपने नेत्रों को स्थिर नहीं कर सकता तो वह देहातीत अवस्था पाने में असफल रहेगा। ऐसा मुख्यतः इसलिए क्योंकि यदि आप अपनी पाँच कर्मेन्द्रियों – नेत्र, नासिका, कान, मुख एवं त्वचा – द्वारा अपने शरीर को सदा कुछ न कुछ प्रदान करते रहेंगे तो आपका देह के प्रति ध्यान भी सदा बना ही रहेगा। ऐसा देहाध्यास ब्रह्मांड से एक होने में बाधा है। यह आपको ध्यानावस्था में जाने से रोकता है ; उस दिव्य आनंद से दूर रखता है जिसे समाधि कहा जाता है। एक लंबे अंतराल तक, बिना हिले डुले, अविचल, एक ही स्थिति में बैठे रहने की योग्यता एक सच्चे योगी का अचूक लक्षण है। अपनी दृष्टि को एक बिन्दु पर स्थिर करने की योग्यता एक सिद्ध योगी का प्रमाण है।

संक्षेप में त्राटक की विधि इस प्रकार है –
१. किसी एक सुखद आसन में, हो सके तो घुटने मोड़ कर, बैठ जाएँ।
२. अपने समक्ष, लगभग 3 फुट की दूरी पर, एक मोमबत्ती जला लें।
३. यान रखें की वह मोमबत्ती या जलती हुई वस्तु व आपके नेत्रों की एक ही समान ऊंचाई हो।
४. कम से कम 10 मिनट तक बिना पलकें झपकाए उस लौ को निहारते रहें। क्रमशः समयावधि बढ़ाते जाएँ।
५. वास्तविक अभ्यास के दौरान अपने इधर उधर भटकते विचारों के प्रति सचेत रहें व धीरे से प्रेम पूर्वक अपने मन को पुनः ध्यान की वस्तु पर लाते रहें।

कृपया निम्न विवरणी का अवलोकन करें –

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मान लें कि आप दस मिनट की अवधि के लिए त्राटक का अभ्यास कर रहे हैं। उस दस मिनट के लिए आप को एक चट्टान की भांति स्थिर रहना है व साथ ही अपने नेत्रों को भी अविचल रखना है। यह अति आवश्यक है कि आप पलकें बिलकुल भी न झपकाएं। नेत्रों से अश्रुपात आरंभ हो जाएगा, किन्तु आपको स्थिर ही रहना है। जब जब मन भटके, उसे धीरे से, प्रेमपूर्वक पुनः ध्यान की वस्तु पर स्थापित करें। आप त्राटक के लिए किसी भी वस्तु का चयन कर सकते हैं किन्तु यदि मोमबत्ती कि ज्योति पर यह अभ्यास हो तो इसका आपके मन पर एक निर्मल, पावक प्रभाव पड़ता है। इस अभ्यास को दिन में कम से कम दो बार अवश्य करना चाहिए – प्रातःकाल व रात्रि को सोने से पूर्व। इस अभ्यास का एक भाग यह है कि आप धीरे धीरे व अनुशासित रूप से नेत्रों को स्थिर रखने की अवधि को बढ़ाते चलें। इसके लिए संकल्प बल व धैर्य आवश्यक है। यदि आप में यह दोनों गुण विद्यमान हैं तो आपको इस अभ्यास से उत्तम लाभ अवश्य होगा।

त्राटक का उचित रूप से किया गया अभ्यास साधक के मन को स्थिर व शांत करने में अति सहायक होता है। एकनिष्ठ एकाग्रता व उत्तम स्मरण शक्ति एवं स्मरण किए हुए तथ्यों को पुनः मानस पटल पर लाने में यह एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। तथापि, इसके लाभ यहीं तक सीमित नही हैं। आज मैं आपके साथ एक योगिक ज्ञान की गुह्य बात साझा कर रहा हूँ कि आपकी देह दस विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं द्वारा संचालित होती है। उनमें से पाँच के विषय में मैं शारीरिक परिष्कार के अंतर्गत चर्चा करूंगा। उनके नाम ‘मानसिक अवसाद’ शीर्षक के लेख में वर्णित हैं, यदि आप जानना चाहें तो उस लेख को पढ़ें। शेष पाँच ऊर्जाएँ हैं – नाग, कूर्म, कर्कर, देवदत्त व धनंजय। इनका कार्य क्षेत्र क्रमशः डकार, छींकना, नेत्रों का झपकना, जम्हाई लेना तथा त्वचा पर खिंचाव ऐंठन है।

त्राटक के अभ्यास से यह पाँच ऊर्जायें स्थिर होती हैं जिससे शरीर की उपरोक्त स्वचालित क्रियाओं पर आपका संयम होने लगता है। एक उन्नत श्रेणी के साधक के लिए यह संयम अनिवार्य है, यदि वह अपने अन्तःकरण के उस शांत, दिव्य स्वरूप का अविरल आस्वादन पाने का इच्छुक है। ध्यानावस्था के दौरान यदि उपरोक्त शारीरिक क्रियाओं में से कोई भी स्वतः आ जाए अथवा होने लगे तो तत्काल क्षण देह बोध हो जाता है जो दिव्य से एकाकार होने में बाधक हो जाता है।

इसके साथ ही एकाग्रता से संबंधित व्याख्या समाप्त होती है। इस श्रंखला का अगला लेख आपको इस विषय के मुख्य बिन्दु तक ले जाएगा, वह है – ध्यान।

लेख पढ़ते रहें।

शांति।
स्वामी