एक बार एक गांव के निवासी एक शेर से परेशान थे। हर रात वह शेर गांव में चुपचाप घुस कर कुछ असहाय भेड़ और बकरियों का शिकार करता था। कभी कभी वह गाय या भैंस का भी शिकार करता था। शेर को पकड़ने मे या उसको मारने मे ग्रामीणों का हर उपाय असफल रहा।

आखिरकार, एक बहादुर आदमी ने एक सुझाव दिया, “किसी तरह, हमे दिन के समय शेर को आकर्षित करना होगा ताकि जब वह पास आये तब हम उस पर हमला कर सकें। इस जानवर से छुटकारा पाने का यही एक रास्ता है।”
“लेकिन, ये बिल्ली के गले मे घण्टी बांधने जैसा काम करेगा कौन?” एक बुज़ुर्ग ने कहा।
“मेरे पास ये करने के लिए सही योजना है। इतना तो स्पष्ट है कि जब तक दिन ना ढ़ल जाये तब तक शेर गांव के अंदर नही आता। हमे ही जंगल में जाना होगा। मैं एक बेहतरीन निशानेबाज़ हूँ। मैं एक गाय के भेस में जंगल जाऊँगा और अपनी बंदूक लेकर चुपचाप खड़ा हो जाऊँगा। जैसे ही वो मेरी और आयेगा, मैं गोली चलाकर उसे मार दूँगा । उसे बचने का कोई मौका ही नहीं मिलेगा।”

ग्रामीणों ने उस शानदार उपाय के लिए उसकी प्रशंसा की। उन्होने उसे चारों ओर से गाय की खाल से लिपटा दिया और ध्यान से गाय के मुंह में उसकी बंदूक रखी। जंगली घास भर कर उन्होने उसे रूबरू गाय जैसा बना दिया। फिर गाय की रूप में उस आदमी ने जंगल में प्रवेश किया।

मुश्किल से आधा घंटा ही बीता होगा कि सबने उस आदमी दौड़ कर गांव की ओर वापिस आते देखा। उसकी बंदूक हाथ में नहीं थी, उसके कपड़े फटे हुए थे और उसके भेस से घास बाहर निकल कर गिर रही थी। गाय का सिर तो अभी भी उसके सिर पे था लेकिन अब वह असली गाय जैसा नहीं लग रहा था।

उसकी यह हालत देख कर गांववाले जल्द ही इकट्ठे हुए और उन्होने उसकी मदद की। उन्होने उसे बिठाकर पानी पिलाया और उसे शांत किया।

एक व्यक्ति ने उसकी यह हालत देख कर कहा, “तुम तो बड़े डरे हुए और परेशान लग रहे हो। क्या उल्टा शेर ने तुम पर हमला कर दिया?”
“शेर? अरे भई, शेर तक तो मै पहुंच ही नही पाया। जंगल की ओर जाने की देर थी कि बैलों ने मेरा पीछा करना शुरू कर दिया। मुझे असली गाय समझ कर वे कामातुर बैल बेताहाशा मेरे पीछे भागे। बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा कर आया हूं”।

यह सुनकर सबकी हंसी छूट गयी।

मज़ाक को एक तरफ रखा जाये तो इस कहानी मे एक बहूमूल्य उपदेश भी है। वह आदमी एक असली गाय को पेड़ से बाँध कर पेड़ पर चढ़कर शेर का इंतज़ार कर सकता था लेकिन उसकी बजाय वह एक बहरूपिये की भांति आडंबर मे पड़ गया। वो बन बैठा जो वो दूर दूर तक नही था। ना केवल कि वह अपने लक्ष्य को पूरा करने में विफ़ल रहा बल्कि एक अप्रत्याशित स्थिति का सामना कर उसने खुद को खतरे में ड़ाला। कुछ समय पहले मैंने पजामा पहन कर जीना लिखा था। चाहे तो आप उसे दुबारा पढ़ सकते हैं।

जब आप वो बनने का प्रयास करते हैं जो आप हैं नहीं या जब आप किसी और जैसा बनने का दिखावा करते हैं, तब यह आप पर बहुत बड़ा बोझ बन जाता है। इससे आप जीवन मे बेचैन रहते हुए आप स्वयं के अस्तित्व को भूलने लगते हैं। एक नई भूमिका निभाने का बेवजह वजन कन्धो पर आ पड़ता है। अगर नकाब पहन कर जियोगे तो आपकी आंतरिक और बाहरी दुनिया तनाव और उलझनें से भर जायेगी।

माना के संसार मे जीने के लिये शायद यह संभव नहीं कि आप सदैव एक ही तरह के बने रहो, कई बार अलग-अलग भूमीकायें निभानी पड़ती है, लेकिन एक ज्ञानी महापुरुष और एक साधारण व्यक्ति में यही अंतर है कि प्रबुद्ध केवल वर्तमान क्षण मे जीते हुए अपनी भूमिका निभाते हैं, जबकि आम इंसान उस भूमिका को अपनी पहचान समझ कर उसमे जीना शुरु कर देता है। इससे वह स्वयं के अस्थित्व और अपने भीतर बसे हुए ईश्वर से दूर चला जाता है । उदाहरणार्थ, एक सैन्य अधिकारी घर आने पर भी अपनी पत्नी, बच्चों और अन्य लोगों को अपने सैनिकों की भांती सख्ती से पेश आता है। हालांकि वह ना तो वह अपनी वर्दी में है और ना वह अपने कार्यालय में, फिर भी वह अभी भी एक अधिकारी की तरह बर्ताव करता रहता है। उसने अपनी भूमिका को अपनी पहचान बना लिया है। तो क्या यह संभव है कि कोई आसानी से क्षणभर में ही अपनी भूमिका बदल सके। जी हाँ। इसे ही वर्तमान पल में जीना कहते हैं।

अपनी भूमिका को निभाइये लेकिन ध्यान रहे कहीं वो आपकी पहचान ना बदल दे। बेशक भविष्य के बारे मे सोचो परन्तु जियो वर्तमान मे। फिलहाल इस क्षण आप यहाँ रहिये और इस क्षण में जीने का प्रयास कीजिये। भेस कितना ही उत्तम क्यों ना हो आखिरकार वो केवल एक भेस ही रहता है।

शांति।
स्वामी