आप सब को मेरी ओर से दीपावली की (एक दिन पूर्व) हार्दिक शुभ कामनाएँ। आप शान्तिमय, जगमगाते हुए आने वाले दो दिन उल्लासपूर्वक मनाएँ! विभिन्न धर्मों में व अन्य धर्म ग्रंथों के अनुसार दीपावली का त्यौहार भगवान राम के, रावण संहार के पश्चात, सीता माता व लक्ष्मण सहित पुन: अयोध्या आगमन की खुशी में मनाया जाता है। सहस्रों वर्षों से यह इसी प्रकार मनाया जा रहा है। किसी भी सगुण उपासक (ईश्वर के साकार रूप का पूजक) अथवा हिंदू धर्म के अनुयायी के लिए यह पौराणिक न हो कर एक ऐतिहासिक कथा है। ऐसे साधक के लिए इस कथा के गोपनीय अर्थ का महत्त्व न के बराबर है, चूँकि भक्ति व चिंतन एक साथ नहीं रह सकते।

भक्ति मार्ग में यह आवश्यक नहीं कि आपकी आस्था को किसी तर्क अथवा युक्ति का सहारा लेना पड़े। अंतर्भाव मनुष्य को बुद्धि के दायरे से परे ले जाते हैं। चूँकि मन का शुद्ध स्वाभाव हर तर्क-वितर्क व चिंतन से ऊपर होता है, अतः तर्क-वितर्क प्रतिबंधित मन की उपज होते हैं। तथापि, एक योगी का दृष्टिकोण भिन्न होता है। उसकी मान्यातानुसार, हर प्रसंग का कोई अर्थ अवश्य होता है, चूँकि धार्मिक ग्रंथ महानतम तपस्वियों व कालातीत संत-महात्माओं द्वारा रचित व प्रतिपादित किए गये हैं।

अस्तु, रामायण – भगवान राम के महाकाव्य – का गोपनीय अथवा योगिक अर्थ क्या है? इस अति ग़ूढ, गोपनीय अर्थ को समझने का केवल प्रयत्न भर करने में भी मैं स्वयं को अक्षम पाता हूँ। मात्र ऐसा विचार करना भी अभिमानपूर्ण है, चूँकि मात्र एक बूँद उस अथाह सागर की थाह भला किस प्रकार ले सकती है! हाँ, यदि वह स्वयं को सागर में पूर्ण समाहित कर स्वयं सागर हो जाए, तब संभवतः ऐसा हो पाए। किंतु, एक बार जब बिंदु सिंधु हो गई तो वह उस बूँद की स्थिति या संघर्ष को कैसे समझे ! खैर, अपनी समाधिस्थ अवस्था में मैंने जो जाना, वह मैं आप के साथ बाँट रहा हूँ –

रावण दश शीश धारण किए, एक दैत्य था, जो अथाह शक्ति व प्राक्रम का स्वामी था। उसके नाभि-स्थान पर अमृत कलश विद्यमान था। भगवान राम – विष्णु अवतार – सद्चारित्र-संपन्न, धर्म की प्रतिमूर्ति थे। उनकी अर्धांगिनी सीता माता – भक्ति व निष्ठा की साक्षात देवी, पूर्णतः पतिपरायण थीं। लक्ष्मण सेवा, संकल्प एवं दृढ़ निश्चय के प्रतीक हैं। यह दीपावली की भूमिका है।

रावण महान तपस्वी था, वास्तव में वह एकनिष्ठ व गहन एकाग्रता का प्रतीक है। उसके दस शीश हमारी दस क्रियात्मक व ज्ञानात्मक इंद्रियों के प्रतीक हैं। यह दर्शाता है की यदि इंद्रियाँ पूर्णत: एकाग्र हों किंतु उनकी चेतन शक्ति अनुपयुक्त दिशा की ओर प्रवाहित होने लगे तो व्यक्ति उसका दुरुपयोग करता है। ऐसा योगी जो एकाग्रता की चरम सीमा को छू ले किंतु उसका क्रोध व मद अनियंत्रित हो, ऐसी स्थिति में उसका जीवन अर्थहीन है। कोई योगी सभी योगिक क्रियाओं का संपूर्ण ज्ञाता हो किंतु यदि उसने वास्तविक समाधि का अनुभव नहीं किया तो वह पुनः मनोविकारो की गर्त में गिर सकता है। यदि समाधिस्थ अवस्था में जगत की वास्तविकता का संपूर्ण विश्लेषात्मक चिंतन न हो पाए तो ऐसा योगी भी पुनः अपने विकारों का दास बन जाता है। चूँकि वास्तविक कार्य का आरंभ उस समय होता है जब आप समाधि के अनुभव के पश्चात उस अवस्था को संम्पोषित कर पाएँ। नाभि-क्षेत्र में विद्यमान अमृत, योग के रहस्यों व मणिपुर चक्र (नाभि में उपस्थित मनोतांत्रिक जाल) का प्रतीक है।

प्रभु श्री राम समाधिस्थ पुरूष के द्योतक हैं (वह सिद्ध जो अपने पूर्णतः शांत निज स्वरूप में सुदृढ़ है )। वे इससे भी कहीं उच्च स्तर – धर्म व करूणा के दिव्य पथ पर आरूढ़ हैं। इसके फलस्वरूप, उनके हृदय में उचित-अनुचित का कोई भेद नहीं। सीता माता पवित्रता एवं प्रकृति की दिव्य शक्ति का प्रतीक हैं, और कुण्डलिनी रूपी नारी-शक्ति की द्योतक। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब योगी भगवान राम के सदृश सिद्धावस्था में स्थित हो, तो प्रकृति रूपी सीता स्वयं सहचरी के रूप में उनकी सेवा में सदा उपस्थित रहती हैं। और, दिशाहीन इंद्रियाँ (रावण) ऐसी परम-भक्ता को आकर्षित करने में विफल रहती हैं। लक्ष्मण जी यह स्मरण करवाते हैं कि एक योगी के लिए संकल्प शक्ति व दृढ़ निश्चय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। लक्ष्मण जी निद्रा एवं भोग-लालसा के पूर्ण रूप से विजयता थे व उन्होंने चौदह वर्ष तक पूर्णतः संयमित व पवित्र जीवन यापन किया। योग के मार्ग में संयम व अनुशासन अत्यंत आवश्यक हैं। चौदह वर्ष का समय काल आत्म साक्षात्कार में लगने वाली औसत समयावधि का द्योतक है।

अतः योग मार्ग पर सफलता प्राप्ति हेतु जिज्ञासु को भगवान राम के अनुरूप धर्मपालन व मर्यादित जीवन (मनसा-वाच्या-कर्मणा संपूर्ण नैतिकता); लक्ष्मण के अनुरूप त्याग (अनासक्त भाव) व सीता माता अनुरूप पवित्रता का पालन करना होगा। ऐसे साधक के लिए साक्षात्कार निकटतम है।

मुझे श्री रामचरितमानस की कुछ चौपाई स्मरण में आ रही हैं, मैं इन्हें स्मृति से बोल रहा हूँ, अतः कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें –

नाथ नहिं रथ ना तन पद त्राणा, केहि बिधि जितब बीर बलवाना ||
सुनहु सखा कहु कृपा निधाना, जेहि जय होई सो स्यन्दन आना ||1||

सौरज् धीरज ते रथ चाका, सत्य सील दृढ ध्वजा पताका ||
बल बिबेक दम परहित घोरे, छमा कृपा समता रजु जोरे ||2||

ईस भजनु सारथि सुजाना, बिरति चरम संतोष कृपाणा ||
दान परसु बुद्धि सक्ती प्रचण्डा, बर बिग्यान कठिन कोदण्डा ||3||

अमल अचल मन त्रोन समाना, सम जम नियम सिलिमुख नाना ||
कवच अबेध बिप्र गुरु पूजा, एहि सम बिजय उपाय ना दूजा ||4||

सखा धर्ममय अस रथ जाके, जितन कतहु कहुँ रिपु नहि ताके ||5||

महा अजय संसार रिपु जित सके सो बीर ||
जाके अस रथ होइ दृढ सुनहु सखा मतिधीर ||6||

व्याख्या –
विभीषण श्रीराम से बोले – “हे नाथ ! आपके पास न ही रथ है, न कवच, और न ही चरण पादुका हैं। आप रावण जैसे महा प्रतापी यौद्धा से कैसे विजयी हो पाएँगे?”

कृपा सिंधु प्रभु राम ने कहा – “प्रिय, इस तथ्य पर ध्यान दो कि जीत के लिए आवश्यक रथ भिन्न भिन्न होते हैं –

शौर्य व दृढ़ता उस रथ के पहिए हैं; सत्य एवं शील-चरित्र विजय पताका के प्रतीक चिन्ह व स्तंभ हैं; शक्ति, कुशाग्र बुद्धि, आत्म-संयम व सर्वहिताय भाव रथ के अश्व हैं। क्षमा, करूणा, एवं समभाव उसकी लगाम हैं। ईष्ट के प्रति भक्ति भाव रथ का सारथि है; उदासीनता कवच है व आत्म-संतुष्टि कृपाण हैं। परोपकार कुलिश है व बुद्धि उसकी प्रचंड शक्ति है। ज्ञान ही सशक्त धनुष है।

एक स्थिर एवं पवित्र मन तरकश है व आत्म-संयम, इंद्रिय-संयम व अनुशासन विभिन्न तीर हैं। गुरु-भक्ति व ज्ञानी जनों का सम्मान अभेद्य कवच है। जीतने के लिए इससे अधिक शक्तिशाली उपाय और कोई नहीं। जिसके पास धर्म का ऐसा रथ विद्यमान हो, उसकी स्थिति विजय-पराजय के चिंतन से कहीं उच्च पटल पर होती है, चूँकि उसका ऐसा कोई शत्रु नहीं रहता जो अजय हो। ऐसे धर्म रथ पर आरूढ़ वीर पुरूष अपने सर्वाधिक दुर्जैय शत्रु – इह लोक (भौतिक जगत के भोगों का आकर्षण) पर भी पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है।”

एक बार पुनः मेरी ओर से शुभ एवं सुरक्षित दीपावली। अपने रथ पर शालीनता पूर्वक आरूढ़ रहें।

कृपया अपना व एक दूसरे का ध्यान रखें।

हरे कृष्ण।
स्वामी