क्या आपको कभी अपने साथी से एक साधारण सी बात करने में भी संकोच होता है, जैसे कि आप सप्ताहांत में क्या करना चाहते हैं? और कोई बात कहने से पूर्व आपने अपने मन में उस वार्तालाप को बार-बार दोहराया है? मात्र इसलिये कि आपको पता नहीं कि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। या इससे भी महत्वपूर्ण बात, आप डरते हैं कि उनकी प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं होगी। वे आप पर क्रोधित हो जाएंगे, यहाँ तक कि झल्ला पड़ेंगे।

यदि ऐसा हुआ है तब आप अवश्य ही अपने उदर में होने वाली मंथन की भावना से परिचित होंगे। जब आपको अपने उदर में अप्रिय व्यग्रता का अनुभव होता है जैसे कि आप रोलर कॉस्टर पर हैं जो एक अन्धाधुन्ध गति से नीचे जा रहा है। आपको अपनी हृदय गति तीव्र और स्पष्ट सुनाई देती है, आप अकस्मात हतोत्साहित हो जाते हैं। और फिर आप अत्यधिक चिंता ग्रसित हो जाते हैं। वह इस समय किस प्रकार व्यवहार करेंगे और आप उनकी प्रतिक्रिया का कैसे सामना करेंगे? इसी तरह बहुत कुछ। इस विषय पर चर्चा के विचार से ही आप काँप उठते हैं।

फिर आप प्रतीक्षा करते हैं। उनसे बात करने के लिये उचित समय की प्रतीक्षा। आप आशा करते हैं कि इस बार वे आपको सुनेंगे और आप उनकी प्रतिक्रिया की चिंता किये बिना अपने दिल की बात कह पाएंगे। आप पूरे संवाद को अपने मन में दोहराते रहते हैं क्योंकि आप अपने शब्दों के प्रति सतर्क रहना चाहते हैं। आप उन्हें प्रेम करते हैं एवं उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाना चाहते, परंतु अपनी बात भी कहना चाहते हैं। आप स्वयं को उनके आवेग के लिये सज करते हैं। परंतु वास्तविकता में आपको कुछ भी तैयार नहीं कर पाता। उनकी प्रतिक्रिया बिलकुल भी भिन्न नहीं होती। आप हमेशा की तरह वही अनुभव करते हैं- अक्षुत, दोषी, तुच्छ और आहत।

यदि आप जानते हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ तब आपको सहायता की आवश्यकता है। परंतु आपका कहना है कि सहायता तो आपके साथी को चाहिये जो कि भावनात्मक रूप से अशांत और मनोग्रहीत है। निस्संदेह। फिर भी आपको सहायता की आवश्यकता है। आपने अपने आप दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को प्रबंधित करने का अवास्तविक काम ले लिया है। उन्हें यह समझाने की बजाय कि वे अपने आचरण और भावनाओं के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं, आप सोचते हैं कि आपके कार्य आपके साथी की भावनाओं को सुधार सकते हैं। यह बड़ी भूल है।

एक प्रबल रिश्ता वह होता है जिसमें दोनों साथी ना केवल एक दूसरों का साथ निभाते हैं परंतु स्वयं अपनी देखभाल भी करते हैं। वे समझते हैं कि उन्हें अपने जीवन के लिए स्वयं उत्तरदायित्व लेना चाहिए। जब यह उत्तरदायित्व केवल एक साथी पर होता है, तो ऐसा संबंध अभिशप्त हो जाता है। यह न तो स्थिर है और ना ही व्यावहारिक। यदि आप मुझसे पूछें तो यह उचित भी नहीं है।

प्रस्तुत है इन्टरनेट पर प्रचलित एक साधारण किंतु गहन कथा जो मैंने सर्व प्रथम मेलोडी बेट्टी की “कोडिपेंडेंट नो मोर” नामक पुस्तक में पढ़ी थी।

एक महिला अपने गुरू से शिक्षा ग्रहण करने हेतु एक पहाड़ पर एक गुफा में रहने गई। उसने कहा कि ज्ञान की खोज में सीखने हेतु जो कुछ भी है, वह सब सीखना चाहती है। गुरू ने उसे एक पुस्तकों का ढेर दिया और उसे एकान्त में रहने को बताया ताकि वह अध्ययन कर सके।

“क्या तुमने जो भी जानने योग्य है वह सब सीख लिया?” प्रत्येक दिन गुरू उससे पूछता।
“नहीं,” हर बार वह यही कहती, “अभी नहीं”।

तब गुरू उसके सिर पर एक छड़ी के साथ प्रहार करता। ऐसा महीनों तक चलता रहा। वही प्रश्न, वही उत्तर, वही प्रहार। फिर एक सुबह जब गुरू ने प्रहार करने हेतु छड़ी उठाई, महिला ने झपटकर उनसे वह छड़ी ले ली और उस हमले को बीच हवा में रोक लिया।

दैनिक प्रताड़ना को समाप्त करके उसे राहत मिली किंतु प्रतिशोध से डरते हुए स्त्री ने गुरु को देखा। उसे आश्चर्य हुआ कि गुरू मुस्कुरा रहे थे।

“बधाई हो,” गुरू ने कहा “तुम उत्तीर्ण हो गयीं। जो कुछ भी जानने योग्य है, वह सब तुम जानती हो।”
“परंतु कैसे?” महिला ने पूछा।
“तुम्हें यह ज्ञात हो चुका है कि जानने योग्य जो कुछ भी है वह सब तुम नहीं जान सकतीं” उसने उत्तर दिया “और तुमने पीड़ा को रोकना सीख लिया है”।

आपका दुःख उसी क्षण समाप्त हो जाता है जब आप यह जान लेते हैं कि आप संभवत: किसी संबंध में सभी परिदृश्यों को नियंत्रित नहीं कर सकते। आप दूसरे व्यक्ति की भावनाओं और विचारों को सुधार नहीं सकते। उन्हें भी अपने जीवन का आंशिक (अथवा पूर्ण) उत्तरदायित्व लेना चाहिये। आप स्वयं का ध्यान रखना सीख जाते हैं। ऐसा नहीं है कि आप दूसरे व्यक्ति को अब कम पसंद करते हैं। वास्तव में, आपका प्रेम अब बढ़ गया है, क्योंकि विषाक्तता अब उत्तरदायित्व में परिवर्तित हो चुकी है।

एक विषाक्त संबंध में इस समझ का घोर अभाव होता है कि दूसरे व्यक्ति की आवश्यकताएं क्या हैं? निषिद्ध साझेदार विशेषज्ञ नियंत्रक होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि, वे अपनी बात मनवा ही लें परंतु नियंत्रक तो अवश्य ही होते है। वे आप पर उनके अत्यधिक निर्भरता का प्रदर्शन करके आपके द्वारा एक विशिष्ट व्यवहार को निकाल सकते हैं। वे ऐसा जानबूझकर या चालाकी से नहीं कर रहे हैं। वे केवल बाध्य हो कर ऐसा कर रहे हैं क्योंकि ऐसा व्यवहार उनके लिए अब तक काम किया है। परंतु शीघ्र ही, यह दोनों लोगों के लिए घुटन हो जाती है क्योंकि यह थकाऊ और कष्टदायक है। वहाँ विनोद के लिये कोई स्थान नहीं है क्योंकि जो भी स्थान बचा था वह चिंता और भय ने घेर रखा है। आप पूछेंगे कि इसका क्या समाधान है?

एक उत्साहित महिला ने अपने कार्यस्थल से अपने पति को फोन किया।
“बधाई हो!” उसने खुशी से चिल्लाते हुए कहा “मैंने जैकपॉट में २० करोड़ रुपये जीते हैं।”
“मुझसे परिहास कर रही हो!” पति उतने ही उत्साह से चिल्लाया।
“अपने कपड़े बांध लो” उसने कहा “अब मैं छुट्टी के लिए तैयार हूँ।”
“सर्दी या गर्मियों के कपड़े?”
“सारे। मैं चाहती हूँ कि तुम छेह बजे के पहले मेरे घर से बाहर निकल जाओ।”

आपका उत्तर है, वैराग्य। मैं यह नहीं कह रहा कि आप उस चुटकुले वाली महिला जैसा आचरण करें। और ऐसा मैं किसी गुप्त दार्शनिक या आध्यात्मिक विचार से नहीं कह रहा। मैं किसी भी संबंध के संदर्भ में वैराग्य को इस प्रकार देखता हूँ। भौतिक दूरी वैराग्य नहीं है (परंतु कभी-कभी यह मदद कर सकती है)। वैराग्य का अर्थ है, दूसरे व्यक्ति को समय व स्थान प्रदान करना ताकि वे अधिक जिम्मेदार हो सकें। यह एक अनुस्मारक है कि आप स्वयं की देखभाल किये बिना दूसरे व्यक्ति की देखभाल नहीं कर सकते। यह एक समझ है कि आप उन वस्तुओं को करने के भी अधिकारी हैं जिनसे आपको प्रसन्नता मिलती है। आपको भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना दूसरों को।

वैराग्य इस तथ्य की स्वीकृति है कि आप जिन लोगों को प्रेम करते हैं वे अपनी भावनाओं के लिये स्वयं उत्तरदायी हैं। उन्हें अपने जीवन (न कि आपके जीवन) का नियंत्रण करने देकर आप वास्तव में उनकी सहायता कर रहे हैं। यह आरंभ में कष्टकर हो सकता है परंतु अंत में यह आपके संबंधों में एक नई जीवन शक्ति देता है। यह एक प्रकार की तटस्थता विकसित करने जैसा है ताकि आप उन छोटी वस्तुओं के विषय में चिंता न करें और तुरंत सब कुछ ठीक करने की इच्छा का त्याग करें। आप उसे ठीक नहीं कर सकते जिसका सृजन आपने नहीं किया। हर समय यह संभव नहीं है।

वैराग्य से यह बोध होता है कि अधिकतर अशांत साथी स्वेच्छा से बुरा व्यवहार नहीं करते हैं। उनकी परिस्थितियों का सामना करने की प्रक्रिया उन्हें एक निश्चित रूप से व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। परंतु आपकी निर्लिप्तता आपको अधिक प्रभावी ढंग से सब कुछ का सामना करने की शांति प्रदान करेगी। घर्षण और संघर्ष में भी सहजता से रहना वैराग्य है। यह अपनी प्रतिक्रिया का परीक्षण करने जैसा है। बजाय इसके कि जब स्थिति प्रतिकूल हो तो जो भी भावनाएं या विचार पहले मन में आएं उसे कार्यान्वित कर दिया जाए। यह आपको तब तक अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है जब तक आपका साथी यह समझ नहीं लेता कि आप में से कोई भी अपने साथी के कारण सदैव भयभीत व पूर्ण रूप से सतर्क नहीं रह सकता।

यह समझ लें कि वैराग्य समाधान का मात्र एक पहलू है। और भी बहुत कुछ है जो बाध्य देखभाल से संकट में आ जाता है। आसक्ति से देखरेख करने पर किसी का भला नहीं होता। यदि आप एक स्वस्थ संबंध रखना चाहते हैं तो देर-सवेर आपको अपने लिये खड़ा होना पड़ेगा। सच्चे प्रेम में प्राकृतिक रूप से एक स्तर की निर्लिप्तता होती है अन्यथा यह बहुत असंगत, असुविधाजनक हो जाता है। अहितकर संबंध जुनून एवं आसक्ति के बंदी होते है। जबकि दूसरी तरफ प्रबल संबंधों का पोषण मित्रता एवं स्वतंत्रता से होता है। अप्रत्याशित देखभाल प्रेम को निर्बल करती है।

अपने लिये बोलना सीखें। डरें नहीं। सांस लें। निर्लिप्त हों। इसी क्षण सब कुछ ठीक करने का प्रयास न करें। यदि आपने अपनी देखभाल करना शुरू कर दिया तो कोई नहीं मरने वाला। इसके विपरीत जैसे ही आप अपने पैरों पर खड़े होंगे तब आपका और दूसरों का जीवन और भी सुंदर हो जाएगा। अंततः यह नवीन शक्ति आपको अधिक प्रेम, देखभाल, आत्मविश्वास और प्रसन्नता देगी।

यह लेख थोड़ा लम्बा हो गया है परंतु संबंधों के विषय पर लेख कठिन संबंधों के समान खींचे जा सकते हैं!

शांति।
स्वामी