एक प्रसिद्ध कथा है कि कज़ाकिस्तान के राजा ने अपने शाही दूतों को भारत के सम्राट जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के पास तीन गहन प्रश्नों के साथ भेजा। अकबर के नव-रत्न, नौ रत्न, असाधारण प्रतिभा युक्त नौ व्यक्ति थे। उनमें से एक था बीरबल जो अपनी वाकपटुता एवं बुद्धिमत्ता के लिये प्रसिद्ध था। राजा उन प्रश्नों के उत्तर स्वयं सुनना चाहता था इसलिये बीरबल को उत्तर देने के लिये भेजा गया।

“ईश्वर कहाँ रहता है”, कज़ाकिस्तान के राजा ने अपना प्रथम प्रश्न पूछा।
बीरबल ने उत्तर में एक गिलास दूध की मांग करी। जैसे ही बीरबल को दूध मिला उसने गिलास में अपनी उंगलियाँ डुबोईं और उन्हें रगड़ने लगा।
उसने अपना सर हिलाते हुए कहा – “इस दूध में मक्खन नहीं है”।
दरबार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति ठहाका लगाने लगा, और राजा ने कहा “मक्खन प्राप्त करने के लिये तुम्हे दूध को मथना पड़ता है।”
“निस्संदेह महाराज”, बीरबल ने कहा। “मक्खन तो दूध में ही है किंतु हम उसे देख नहीं सकते। हम मक्खन का स्वाद ले सकें उससे पहले दूध को कुछ प्रक्रियाओं से जाना पड़ता है। इसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति में रहता है परंतु ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने हेतु हर किसी को स्वयं को शुद्ध करना पड़ता है। उसे अपनी चेतना को मथ कर अपने अधम विचारों, अनुभवों व कामनाओं को मिटाना पड़ता है।”

“अति उत्तम”, राजा ने प्रसन्न होकर कहा। “और ईश्वर क्या खाता है?”
दरबार में चुप्पी छा गयी।
“यह स्पष्ट है कि यदि ईश्वर रहता है तो वह कुछ खाता भी होगा”, राजा ने कहा।
“निस्संदेह महाराज”, बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया। “ईश्वर खाता है, वह मनुष्य के झूठे अहंकार को खाता है। हमारा इतिहास इसका साक्षी है। अंततः दैवी-न्याय के कटघरे में सभी को न्याय मिलता है। ईश्वर की प्राप्ति करने वाले को अपना अहं अर्पण करना पड़ता है।”

“ईश्वर क्या करता है?”, राजा ने तीसरा प्रश्न किया।
“इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये आपको मेरे पास आना पड़ेगा”, बीरबल ने कहा।
उसके इस निर्देश से राजा को थोड़ा बुरा लगा किंतु उत्तर जानने को उत्सुक राजा अपने सिंहासन से उतर कर वहाँ पहुँचा जहाँ बीरबल खड़ा था।
“मैं आपके प्रश्न का उत्तर आपके सिंहासन पर बैठने के पश्चात ही दे सकता हूँ”, बीरबल ने अपना शीश झुकाते हुए कहा।
इस सुझाव पर दरबारियों की त्यौरियाँ चढ़ गयीं और दरबार में कानाफूसी होने लगी।
“तो फिर ऐसा ही हो”, राजा ने कहा, “मुझे उत्तर मिलना ही चाहिये।”

शालीनतापूर्वक बीरबल उन शाही सीढ़ियों को चढ़कर सिंहासन पर बैठ गया। एक स्थान जहाँ राजा के अतिरिक्त कोई भी, कभी न बैठा था।
अपने हाथों को हीरे जड़ित हत्थों पर रखकर बीरबल एक सम्राट की भांति बोला – “ईश्वर यही करता है राजन, एक क्षण में मेरे जैसा एक साधारण व्यक्ति, जो कि एक निर्धन परिवार में पैदा हुआ है, राजा बन जाता है, जबकि दूसरी ओर आप, जन्मतः राजा, बिना किसी प्रतिरोध के सिंहासन से उतार दिये जाते हैं।”

“बीरबल तुमने बिना किसी संदेह के यह सिद्ध कर दिया है कि धरती का सबसे चतुर व्यक्ति अकबर के दरबार में रहता है।”
राजा ने उसे प्रचुर मात्रा में पुरस्कार दिया और बीरबल को शाही विदाई दी गयी।

इस कथा को बताने का मेरा यह तात्पर्य नहीं है कि ऊपर कोई बैठा है जो सब कुछ नियंत्रित कर रहा है। यह मैं आपके व्यक्तिगत विश्वास पर छोड़ता हूँ। इसे मैंने यहाँ इसलिये साझा किया क्योंकि जब पहली बार मैंने इसे सुना तो इसमें निहित बीरबल की गहन आध्यात्मिकता एवं उसके चतुर उत्तर मुझे बहुत अच्छे लगे। मैंने सोचा आपको भी आनंद आएगा। बीरबल के उत्तरों में, विशेषकर प्रथम उत्तर में महान सत्य है।

प्रायः लोग मुझसे पूछते हैं कि वे अपने जीवन में ईश्वर की उपस्थिति को कैसे महसूस करें। उन्हें जो कुछ भी भाग्य से मिला है मैं उन्हें उसके लिये कृतज्ञ होने को कहता हूँ क्योंकि कृतज्ञता ही नकारात्मकता का विषहर है। और जब आप सकारात्मक तथा कृतज्ञ होते हैं तो इस संसार में सभी कुछ दैवी दिखता है। किंतु और भी निरंतर दैवत्व की अनुभूति कैसे करें? मैं कहता हूँ अपनी चेतना में अनुकंपा का अभ्यास करें। किंतु वे कहते हैं कि यह सरल नहीं है। फिर मैं समझता हूँ कि आत्म-शुद्धिकरण ही एकमात्र मार्ग है। जितना ही आप स्वशुद्धिकरण करते हैं आप उन वस्तुओं को देखने की उतनी ही अधिक संवदेनशीलता विकसित कर लेते हैं जो सामान्यतः मनुष्य की अंतर्दृष्टि से परे है।

सदाचारी जीवन तथा ध्यान का नियमित अभ्यास आपको शुद्ध कर सकता है। सदाचार को अपनाना, ध्यान के नियमित अभ्यास अथवा किसी धार्मिक अनुशीलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। हाँ ध्यान अवश्य आपके मन को प्रबल करता है। यह आपको सचेत बनाता है जिससे कि प्रलोभन (और वे बहुत आएंगे) की स्थिति में आप अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रह सकेंगे। किंतु मेरा आज का विषय ध्यान नहीं है, वह है नम्रता। क्योंकि नम्रता ही दैवत्व का बीज है।

आध्यात्मिक आनंद से अभिभूत एक प्रधान पादरी अत्यधिक शीघ्रता में पूजा-स्थल पहुँचता है। वह अपने घुटनों पर बैठता है और चिल्लाने लगता है – “मैं कुछ नहीं हूँ! ईश्वर मैं तो केवल एक तुच्छ व्यक्ति हूँ! इस से अधिक कुछ नहीं!”
वहाँ उपस्थित पादरी, मुख्य पादरी की असाधारण नम्रता एवं धार्मिक भावुकता को देखता है। ईश्वर के प्रेम से अभिभूत होकर वह भी चिल्लाते हुए पूजा-स्थल की ओर भागता है और कहता है – “ईश्वर, मैं कुछ नहीं हूँ! मैं कुछ नहीं हूँ! ईश्वर!”
निकट ही एक दरबान पोंछा लगा रहा था। उसने देखा कि कैसे दो अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति ईश्वर में लीन थे। उसके रोंगटे खड़े हो गये। ईश्वर भक्ति एवं उत्कट उत्सुकता से भरा, वह अपना पोंछा फेंकता है और वह भी पूजा-स्थल की ओर भागता है और कहने लगता है – “मैं कुछ नहीं हूँ! हे ईश्वर! मेरी सुनो, मैं कुछ नहीं हूँ! कुछ नहीं!”
यह देख प्रधान पादरी दूसरे पादरी की ओर देखता है और कहता है – “इस साधारण दरबान की यह हिम्मत – सोचता है कि वह कोई नहीं है!”

मिथ्या नम्रता सभी आध्यात्मिक परीक्षाओं में असफल होती है। दैवी मार्ग में प्रदर्शन अथवा दिखावे की कोई स्थान नहीं।

गुरु नानक ने बहुत सुंदरता से मिथ्या बाहरी नम्रता और वास्तविक भीतरी नम्रता में इस प्रकार अंतर बताया है –

मिठातु नीवी नानका गुना कमगिाइया ततु।।
सभु को निवई आप कौ पर कौ निवई न कोई।।
धरि तराजू तोलिये निवई सो गौरा होई।।
अपराधी दूना निवई जो हमता मिरगाही।।
सीसि निवायिए किया तीयई जा रिदई कुसुधे जाही।।
(श्री गुरू ग्रंथ साहिब, पेज ४७०, सलोक मेहला१)

मधुरता और नम्रता, हे नानक,
अच्छाई और सदगुण का सार है ।
हर कोई स्वयं के आगे झुकता है,
कोई भी किसी और के आगे नहीं झुकता।
जब तराजू पर तौलोगे तो
भारी पक्ष ही नीचा होता है।
पापी, एक शिकारी के समान, दुगना झुकता है।
किंतु सर झुकाने से क्या मिलेगा,
यदि हृदय ही अशुद्ध हो? ।। १।।

जैसे-जैसे आप अपना अहं छोड़ते जाते हैं आप स्वभावतः विनम्र होते जाते हैं। और नम्रता अपने नित्यप्रति जीवन में ईश्वर की उपस्थिति को आत्मसात करने का सर्वप्रथम गुण है। नम्रता के रहित व्यक्ति ईश्वर के प्रति शुष्क बौधिक समझ या कठोर अंध-विश्वास से अधिक कुछ नहीं पा सकता। नम्रता ही महान संतों, पैगम्बरों या मसीहाओं की विशेषता थी। वे साधारण मनुष्यों की भांति हमारे बीच रहे और अपने कार्यों को चुपचाप करते रहे।

फलों से लदा वृक्ष सदैव थोड़ा झुका होता है। किसी बोझ के कारण से नहीं किंतु इसलिये कि उसके पास प्रदान करने हेतु कुछ है। व्यवहार एवं भाषा में नम्रता आपको ईश्वर के समीप ले जाती है। आपके पास जितना अधिक अर्पण करने के लिये है, स्वभावतः आप उतने ही विनम्र हो जाते है। उसी तूफान में जहाँ प्रबल हवाएं विशाल वृक्षों को गिरा देती हैं, घास के नर्म तिनके सकुशल नाचते झूमते रहते हैं।

शांति।
स्वामी