अरण्य का जीवन यापन स्वयं में एक दिव्य अनुभव है, यदि कीट-पतंगे, मशक व मूषक का सानिध्य विस्मरित हो पाए तो! वन के हिंसक जीव तो पालतू पशु अथवा सामाजिक प्राणी जैसा व्यवहार बना लेते हैं किंतु कीट-पतंग व मूषक ने तो मानो वन्य जीवन अपनाते समय अपना संपूर्ण ईमान पीछे छोड़ दिया हो। प्रकृति ने आपके विचारों के प्रशिक्षण हेतु उन्हें वहाँ स्थापित किया है। जब आप उनके सामीप्य में ही जीने के अभ्यस्त हो जाते हैं, तत्पश्चात मनुष्य प्रजाति के साथ समन्वय बनाना बाल-क्रीड़ा मात्र प्रतीत होता है। अपने सात माह की ध्यान साधना के दौरान मैं एक टूटी फूटी झोंपड़ी में रहा। वह पुरानी थी व न जाने कब से उसी तरह पड़ी थी जैसे आप के पास कई पुराने उपकरण रखे रहते हैं। उसमें बहुत से मकड़ी के जाले थे, कुछ बहुत महीन थे व कुछ अन्य दिखाई देते थे। संख्या में ये इतने अधिक थे जितने उस झोंपडी की टूटी छत पर रखे घास के तिनके भी नहीं थे।

कुछ ऐसा भी था जो इन जालों से भी अधिक संख्या में था – वह था झोंपड़ी की दीवारों में छिद्रों की संख्या। वह दीवारें लकड़ी के छोटे छोटे टुकड़ों को बहुत बेतरतीब ढंग से एक दूसरे के साथ सटा कर रखने से बनी हुई थीं। ऐसा प्रतीत होता था कि किसी ने बिल्कुल बेमन से यह कार्य किया होगा, अथवा उसे पूरा परिश्रमिक नहीं दिया गया, अन्यथा दोनों बातें हों। ये मकड़ी के जाले मुझे स्मरण करवा रहे थे कि कैसे हमारा मन अत्यंत चतुराई से विचारों के जाल बुनता रहता है। दीवारों के छिद्र यह भान करवा रहे थे कि कैसे मनुष्य की धारणाएँ अखिल ब्रह्मांड के अस्तित्व को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट देती हैं।

सैकड़ों माक्षिकाएँ व भिंड उस स्थान पर भिनभिनाते रहते थे, विशेषकर इसलिए चूँकि भूमि पर चारों और असंख्य नन्हे नन्हे नील, श्वेत व पीत वर्ण के पुष्प महक रहे थे। लंगूरों को विशेष रूप से पीत वर्ण के पुष्प रुचिकर लगते थे मानो उन अनुशासन-हीन चंचल वानरों को विशेष स्वाद-कलिकाएँ प्राप्त हों। मेरे सामने प्रत्यक्ष प्रमाण था कि किस प्रकार अवसर मिलने पर याचक भी चयनकर्ता बन सकता है। जीव विज्ञान के एक सिद्धांत के अनुसार वानर हमारे पूर्वज हैं, किंतु मेरे मन में उनके प्रति कोई आदर भाव नहीं आता था, चूँकि वे हमारे आवेशपूर्ण मन की ही भाँति उपद्रवी थे। एक अस्थिर मन जो कभी एक वस्तु पर नहीं टिक पाता, उसी प्रकार ये चंचल वानर एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदते फाँदते रहते थे। फिर भी, वे थे बहुत प्यारे और कभी कभी मैं उनके शरीर की कोमल रूँवें दार त्वचा की सराहना किए बिना नहीं रह पाता था, वे कोमल रूँवे वहाँ के अतिशीत वातावरण व शून्य से नीचे के तापमान में उनकी रक्षा करते थे। कहना होगा कि इतने सब के बावजूद वह वानर इस मानव पर विजय नहीं पा सके। ये लंगूर शहरी वानर की तरह न हो कर, चाँदी के रंग जैसे रूँवा दार त्वचा लिए, पूरी तरह काले मुख वाले, कोयले जैसी काली लंबी भुजाओं वाले थे।

लंगूर से माक्षिका की और चलते हुए, वहाँ मुझे अनेकों बार मधु मक्खी, चींटी व मकड़ी का अत्यंत करीब से निरीक्षण करने का अवसर मिला। उन्हीं अंतरंग पलों में यह व्याख्या उद्घाटित हुई जो आज मैं आप सब के सम्मुख रख रहा हूँ। मैंने पाया कि मधुमक्खी व चींटी सदा कार्यशील रहती हैं व मधुमक्खी अधिक बैचैन रहती है। गाय, बकरी अथवा मृग की भाँति इन्हें मैंने कभी भी सुस्ताते हुए नहीं देखा। छत्ते के ऊपर भी ये निरंतर भिनभिनाति ही रहती थीं। मधुमक्खी व चींटी में एक समानता यह है कि दोनों किसी दूसरे के लिए कार्य करती हैं। अपनी अपनी रानी के लिए, और वे सदा झुंड में रहती हैं।

एक अन्य ध्यान देने योग्य बिंदु यह है कि ये सदा एकत्र करने में ही जुटी रहती हैं। शायद इसलिए क्योंकि ये किसी दूसरे के लिए कार्य करती हैं, अत: रानी यह सुस्थापित करती है कि मात्र मामूली उपहार के लिए (वह भी यदि मिल पाए) ये सब हर पल दासतापूर्वक कार्यशील रहें। अन्य मधु माक्खियों ने इसे अपने जीवन जीने के ढंग के रूप में स्वीकार कर लिया है। यदि सहस्रों जन एक श्रमिक की भाँति कार्यरत हैं तो संभवत: यही उचित, सभ्य, सामाजिक, लाभप्रद व ‘एकमात्र’ कार्यशैली हो सकती है – साधारण मनुष्य की सोच कुछ ऐसी ही होती है। ऐसा प्रतीत होता है, मधुमक्खी कभी एक पल रुक कर मनन नहीं करना चाहती। उन सब में एक समान सामूहिक बुद्धि क्रियाशील है जिसके अनुसार यदि अन्य सभी एक विशेष दृष्टिकोण पर चल रहे हैं तो अवश्य ही वह गुणवत्ता पूर्ण होगा। मैंने देखा कि रानी मधु मक्खी श्रमिक मधु मक्खी से आकार में बड़ी होती है। केवल आकार ही नहीं, उसकी देह में एक अनुपम सुगंध होती है जो उसे “रानी” का ताज धारण करने हेतु राजसी सम्मान के सुयोग्य बनाती है।

अपनी रोचक तुलनात्मक व्याख्या आपके सम्मुख रखने से पूर्व मैं आपका ध्यान मकड़ी की क्रियाशीलता की ओर ले जाना चाहूँगा। मकड़ी एक विलक्षण व स्वतंत्र परिचालक है। मकड़ी अपने भोजन के लिए न तो भिनभिनाती है, न ही इधर उधर विचरती है। वह अपनी प्रखर बुद्धि का परिचय देते हुए एक उपयुक्त स्थान का चयन करती है व चुपचाप अपना कार्य प्रारंभ कर देती है। वह भविष्य को लेकर लेशमात्र चिंतित नहीं। अपना जाल बुनकर वह धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करती है, अक्सर जाल के अंदर या ऊपर बैठ कर नहीं, बल्कि उसके बाहर रह कर। मैंने कभी किसी मकड़ी को बैचैन अथवा अशांत मुद्रा में नहीं देखा। वह वर्तमान क्षण के लिए जीती है व कभी भी समूह में नहीं रहती, न ही दीन हीन हो किसी की दासता अपनाती है। वह श्रद्धा से जीती है किंतु अंध-श्रद्धा से नहीं। मैंने पाया कि यदि बहुत दिन तक उसके जाल में शिकार नहीं फँसता, तब मकड़ी नया जाल बनाना आरंभ कर देती है।

एक सक्षम व्यक्ति की भाँति, मकड़ी अपना कार्य सुचारू ढंग से पूर्ण करती है, बिना अति परिश्रम किए। जैसे ही कोई कीट उड़ता हुआ उसके जाल में उलझता है, मकड़ी तत्काल उसकी ओर बढ़ना आरंभ कर देती है। इस बार वह मूषक की भाँति फुर्तीली व सतर्क है। वह अपने शिकार पर शिकंजा कसती है, उसे मार कर उसका भक्षण करती है, जब तक उसकी शुधा शांत न हो जाए। जैसे जैसे समय बीतता है, हर नई प्रात:काल होने पर प्रकृति स्वयं उसके जाल तक ताज़ा भोजन पहुँचाने का प्रबंध करती है। एक परम भक्त की भाँति, मकड़ी ने उचित समय पर यथोचित कर्म करने के पश्चात पूर्ण समर्पण में जीने की कला सीख ली है। मकड़ी इस विश्वास पर जीती है कि उसका भोजन उसे अवश्य प्राप्त होगा चूँकि शायद वह यह जानती है कि अंतत: हर कर्म अपना फल अवश्य प्रदान करता है।

अत: आप चयन कर सकते हैं – मकड़ी अथवा मधु मक्खी! चयनकर्ता आप हैं। हालाँकि भौतिक जीवन में भी उनकी कार्यशैली के अनुरूप ही परिणाम प्राप्त होंगे, तथापि यहाँ मेरा ध्यान आध्यात्मिक उपलब्धि पर है।

रानी मधु मक्खी की भूमिका आपके मन की है। यदि आप अपने मन के अनुरूप कार्यरत रहेंगे, तो यह विपदा आप स्वयं बुला रहे हैं, वह भी स्वल्प मात्र लाभ के लिए। यह आपको अनावश्यक कड़ी मेहनत में व्यस्त रखेगा व आप अपने अंतिम श्वास तक मधुमक्खी की भाँति कोलाहल करते रहेंगे व बैचैन दौड़ते भागते रहेंगे। मधुमक्खी की भाँति आप रस लेते समय उस पुष्प की सुगंध का आस्वादन तो ले पाएँगे किंतु मधु पर आपका कोई अधिकार नहीं होगा। छत्ते में एकत्रित मधु एक रानी मधु मक्खी (आपका मन) के लिए भी अपर्याप्त है। एक दिन कोई अन्य व्यक्ति संपूर्ण मधु-वाटिका ले कर चलता बनेगा। रानी मधु मक्खी की दासता में कार्य न करें। विरोध आरंभ करने के लिए मात्र एक भाव ही पर्याप्त है, जिसे बनाए रखने में महान प्रयत्न व बुद्धिमत्ता आवश्यक होती है, व अपने विरोध में सफल होने के लिए भाव, प्रयत्न, बुद्धिमत्ता के साथ असाधारण संकल्प शक्ति, दृढ़ता व अनुशासन भी आवश्यक हैं।

यदि आप मधु मक्खी की बैचैन व अशांत जीवनशैली का विद्रोह आरंभ कर रहे हैं तो कृपया परिणाम मिलने तक तत्परता पूर्वक परिश्रम करने हेतु सज्ज रहें। आपका कार्य अति विशाल है – इस अशांत वातावरण में विश्रान्ति अनुभव कर पाना। आपका लक्ष्य उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण व साहसपूर्ण है – रानी मधु मक्खी को अपना दास बनाना। किंतु, यह प्राप्ति योग्य है। मन की स्थिरता आपको पर्वत समान अटल बना देगी व आपकी निर्भीक नैतिकता आपको वह सुगंध प्रदान करेगी जो रानी मधु मक्खी को आपका दास बना देगी व आपके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगा। साँप का दंश सिंह से लाखों गुना अधिक प्राण घातक हो सकता है किंतु यह सिंह की गरिमा व उसका स्वाभाव है जो उसे वनराज की उपाधि प्रदान करता है, चूँकि सामान्य स्थिति व सामान्य कारणों के समय, सिंह केवल तभी शिकार करता है जब वह शुधा से पीड़ित हो।

यदि आप विद्रोह के पक्ष में नहीं, तब आप एक मकड़ी की भाँति विनम्र बन सकते हैं। इसके लिए भी एक अर्थपूर्ण मानसिक परिवर्तन आवश्यक है। मधु मक्खी बने रह कर अपनी रानी मक्खी की दासता के विरुद्ध विद्रोह व दृढ़ संकल्प आवश्यक हैं, किंतु मक्खी न हो कर मकड़ी बनना एक पुनर्जागरण (नव चेतना) के समान है। बड़े बड़े झुंड में न रह कर, अब आप को एकांत में शांतिमय जीवन का अभ्यस्त होना होगा। सदा उचित कर्म में व्यस्त, आप संपूर्ण समर्पण व आस्थामय जीवन जीना सीख लेते हैं। आप यहाँ वहाँ भटकना छोड़, स्थिर होकर अपने ईश्वरीय भाव में स्थिति बनाए रखते हैं। आप अपने कर्तव्य कर्म निष्काम भाव से करने लगते हैं – उचित या अनुचित, दोनों फल ईश्वर पर छोड़ते हुए। अब आपका मन न तो उस मधु के लिए लालायित है और न ही उन पुष्पों की अल्पकालिक सुगंध के प्रति आकर्षित। जिस प्रकार मकड़ी अपना जाल केवल भोजन प्राप्ति हेतु बुनती है, उसी प्रकार अब आपके हर कार्य का एक ही प्रयोजन है – अपने ईष्ट का साक्षात्कार।

मकड़ी निरंतर सतर्क रहती है, दीवार से चिपके हुए, जैसे ही शिकार को जाल में फँसा पाती है, तत्काल वह उसकी ओर लपकती है। आपको भी एक उत्तम भक्त की भाँति सदा सर्वदा अपने भक्ति भाव में दृढ़ व ईश्वर की दिव्य-सेवा के प्रति तत्पर रहना चाहिए। इसके लिए अत्यंत सतर्कता आवश्यक है ताकि प्रभु सेवा का एक भी अवसर आप चूक न जाएँ। जब आपका समर्पण मकड़ी की भाँति उच्चतम स्तर का होगा, तब वह परम-दिव्य सत्ता स्वयं आपकी संभाल करेगी। दूसरे शब्दों में, आप उस दयामय की दिव्य-कृपा के सुपात्र बन जाएँगे। मकड़ी अपना जाल अवश्य बुनती है किंतु स्वयं उसमें कभी नहीं उलझती, जैसे आत्म-साक्षात्कारी महापुरूष इस जगत में रहते हुए भी यहाँ के मोह माया के जाल में फँसते नहीं। मकड़ी की भाँति, ऐसा महापुरूष भली भाँति समझता है कि यह जाल तो मात्र साधन-पूर्ति का माध्यम है। यदि सावधानी न रखी तो एक न एक दिन वह स्वयं इस जाल का शिकार बन जाएगा। वह जगत में ऐसे रहता है जैसे दाँतों के मध्य जिहवा, हर प्रकार का स्वाद चखते हुए भी स्वयं न कटती है न ही चबाई जाती है।

जैसे मधु मक्खी की उपलब्धि उसका छत्ता व मकड़ी की उसका जाला होता है, इसी प्रकार आपका जीवन आपकी स्वयं की सृजनात्मक उपलब्धि है। आपने अपने घरौंदे का सृजन कठिन परिश्रम द्वारा भिन्न भिन्न पुष्पों के रस-सुगंध एकत्र कर के किया है, व, अनेकों बार इसे बनाने की प्रक्रिया में आपने कई कड़वे घूँट भी पीए होंगे। मकड़ी की भाँति संपूर्ण जीवन जाल बनाने हेतु गोल गोल घूमने में ही व्यतीत न कर, आप कभी बीच में थोड़ा रुके अवश्य होंगे – अपने जीवन की समीक्षात्मक तुलना व मूल्यांकन हेतु – ऐसी मेरी आशा व अनुमान है। भले ही आप मकड़ी हों अथवा शिकार, किंतु जाल में फँस जाने की स्थिति में आपके सम्मुख संघर्ष व पीड़ा ही प्रस्तुत होंगें।

जाएँ व हर्ष-उल्लासपूर्वक जीवन जीयें! आसक्ति रहित होकर पुष्पों का रसास्वादन करना सीखें, बस तभी तक जब तक आप अपने अंत:करण में व्याप्त अथाह प्रेम-रस का अन्वेषण न कर लें। अपने जीवन रूपी जाल का ताना बाना निरंतर यत्न व परिश्रम से बुनते बुनते, कृपया स्मरण रखें कि कहीं उसकी बुनावट इतनी विषम न हो जाए कि वह आपके लिए जी का जंजाल बन जाए। आप इससे कहीं उत्तम पाने की योग्यता रखते हैं!

शांति।
स्वामी