मुल्ला नसरूद्दीन अपने पड़ोसी के द्वार पर दस्तक देता है। वह द्वार खोलता है, नसरूद्दीन का अभिवादन कर उसे बैठने को कहता है।

मुल्ला कहता है, “मुझे आपको कुछ बताना है। आप को सुन कर अच्छा नहीं लगेगा किन्तु सत्य को स्वीकार करना ही पड़ता है।”
पड़ोसी चिंतित स्वर में पूछता है, “क्या बात है?”
“तुम्हारे बैल ने मेरी गाय पर प्रहार कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया है। यदि उसका अभी, इसी क्षण, उपचार न हुआ तो वह मर भी सकती है।” नसरुद्दीन कहता है। “मुझे लगता है कि यही उपयुक्त होगा कि आप एक नयी गाय के लिए धन दें, अथवा इस घायल गाय का पूरा उपचार करवा दें।”
“यह सब बकवास है,” पड़ोसी क्रोध में बोला, “एक जानवर द्वारा किए कृत्य के लिए मालिक को कैसे उत्तरदायी ठहरा सकते हैं? मैंने आपकी गाय पर प्रहार नहीं किया और न ही मैंने उसे घायल किया है। इसलिए मुझसे किसी प्रकार कि क्षतिपूर्ति की अपेक्षा न करें।”
“ओह! मुझे क्षमा करें। जल्दबाज़ी व घबराहट में मैंने आपको पूरी घटना बताते समय एक गलती कर दी। बात यह है कि वह मेरा बैल था जिसने आपकी गाय को घायल कर दिया है। “नसरुद्दीन तेजी से बोला, “किन्तु मैं समझता हूँ कि अब इस बात के कोई मायने नहीं कि गाय किस की थी और बैल किसका था। हैं तो दोनों ही जानवर! और, अभी अभी आपने अपने विचार स्पष्ट रूप से बता ही दिये हैं।”

पड़ोसी के पास इस बात का कोई उत्तर न था।

बहुधा हर किसी को अपने प्रियजनों से, अपने जीवन से, अन्य लोगों से, यहाँ तक कि हर किसी से उत्कृष्ट व्यवहार, न्याय, सच्चाई व उपयुक्त आचरण की अपेक्षा होती है। प्रश्न यह है कि क्या आप स्वयं यह सब प्रतिदान में दूसरों को देते हैं? इसका तत्कालिक उत्तर संभवतः हाँ में होगा, की हाँ मैं ऐसा करता हूँ । किन्तु क्या वास्तव में आप ऐसा करते हैं? बहुत से लोगों ने दो पृथक नीतियाँ बनाई होती हैं – एक जो सुविधाजनक हों वह अपने लिए, व दूसरी जो कठिन व आदर्शवादी हों वह दूसरों के लिए।

साधारणतः जिस व्यक्ति से उनका सामना होता है, अधिकांश समय उस ने भी दो विभिन्न मापदंड अपनाए होते हैं। ऐसा विरोधाभास ही आपसी मन-मुटाव, परेशानियों व कड़वाहट का मूल कारण बनता है। यदि आपके द्वारा निर्धारित नीतियाँ अपने व दूसरों के लिए एक ही हैं, तो आपकी आधी कठिनाइयाँ स्वतः समाप्त हो जाएंगी। करुणा यही है कि आप औरों के प्रति सहिष्णु व उदार हों परंतु अपने लिए बनाए नियमों व नीतियों का स्वयं कड़ाई से सर्वश्रेष्ठ स्तर तक पालन करें। जो व्यक्ति करुणामय होता है, समस्याएँ स्वयं को उसके जीवन से हटा लेती हैं।

कभी कभी अचानक पैदा हुए अवांछनीय उद्गार व कृत्य, भले ही वे कितने भी अंजाने में हुए हों, दूसरों को दुख पहुंचा देते हैं। वह एक वाहन-दुर्घटना से पनपा क्रोध, कोई असत्य कथन, अथवा ऐसी कोई भी स्थिति हो सकती है जब आपके मूल स्वभाव के स्थान पर तत्कालिक झुंझलाहट पूर्ण व्यवहार सामने आ गया हो। बिलकुल यही सब दूसरों पर भी लागू होता है। वे भी आप ही की तरह एक साधारण मनुष्य हैं, व साथ ही, उनमें भी वही दिव्यता विराजमान है जो अन्य किसी में होती है। यदि आप यह स्मरण रखें तो आपकी विचार धारा, आपका दूसरों के प्रति व्यवहार रूपांतरित हो जाएगा ; आप अन्य लोगों के साथ अधिक प्रेमपूर्वक रह पाएंगे।

यहाँ मैं माया एंजेलो की कही एक बात बताने के लिए उत्सुक हूँ , “मुझे यह समझ आया है कि लोग यह भूल जाएँगे कि आपने क्या कहा; लोग यह भूल जाएँगे कि आपने क्या किया; किन्तु लोग यह कभी नहीं भूलेंगे कि आपने उन्हें कैसा महसूस करवाया।”

आगे बढ़ें! किसी को विशेष महसूस करवाएँ। सही रूप से आचरण करें। दूसरों के लिए बनाए अलग मापदण्डों को त्याग दें, सबके लिए केवल एक ही मापदंड रखें जो आपके स्वयं के लिए है। आप हल्काफुल्का व उन्मुक्त महसूस करेंगे।

संभवतः यही क्षण सर्वोत्तम हो पारस्परिक आदान-प्रदान की नीति उच्चरित करने के लिए, इस उक्ति को कहने के लिए, वह उक्ति जो विश्व भर के धर्मों द्वारा अनुकरणीय है – “दूसरों के प्रति वही व्यवहार करें जो आप स्वयं के लिए चाहते हैं।”

शांति।
स्वामी