ध्यान मुख्यतः दो प्रकार का होता है। एक होता है एकाग्रतापूर्ण ध्यान, जिसे अचल एकाग्रता भी कहा जाता है; व दूसरा होता है चिंतनशील ध्यान जिसे विश्लेषणात्मक अनुसंधान भी कहा जाता है। एक उत्तम साधक दोनों प्रकार के ध्यान में निपुण होता है। एक साधक के ध्यान की उत्तमता का पैमाना है कि वह केवल एक ही विचार पर पूर्ण रूप से उतने लंबे समय तक स्थिर रह पाये जितने समय तक उसकी इच्छा हो। एक अति आवश्यक सूत्र जो सदा स्मरण रखने योग्य है, वह यह है कि ध्यान एक कौशल है; यह एक कला है। यदि संकल्प दृढ़ हो तो यह किसी के द्वारा भी सीखा जा सकता है व निरंतर अभ्यास द्वारा इसमें प्रवीणता प्राप्त की जा सकती है।

इस कौशल को सीखने का केवल एक सुमार्ग है, वह है – अभ्यास, सतर्कता पूर्वक अभ्यास। और, इस कला में प्रवीण होने का भी एक ही सुमार्ग है, वह है – सतत अभ्यास, दृढ़ अभ्यास। यह अभ्यास यदि किसी के मार्ग-दर्शन में किया जाये तो आपकी सफलता की संभावना कई गुना अधिक हो जाती है। हाँ, वह मार्ग-दर्शन एक यथार्थ माध्यम के द्वारा आप तक पहुंचना चाहिए, किसी अनुभवी शिक्षक द्वारा, न कि मात्र एक उपदेशक द्वारा; एक दक्ष-कर्ता न कि मात्र एक मधुर भाषी वक्ता। यदि आपका मार्ग-दर्शक स्वयं अचल एकाग्रता व स्थिरता स्थापित नहीं कर सकता, तो वह आपको शाब्दिक ज्ञान का भंडार तो प्रदान कर सकता है किन्तु व्यावहारिक आधार पर मार्ग-दर्शन देने में असमर्थ होगा। वह आपको ध्यान की गहनतम अवस्था व गुह्यता से परिचित नहीं करा पाएगा।

इस लेख में मैं दो प्रकार के ध्यान का अंतर, संक्षेप में, प्रस्तुत करूंगा –

एकाग्रतापूर्ण ध्यान

इस प्रकार के ध्यान में साधक अपने विचारों को स्थिर करता है व मन को किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करता है। कृपया मेरे उन लेखों का अवलोकन करें जिनमें एकाग्रता के विभिन्न अभ्यासों का वर्णन है। यह विधि प्रमुख्यतः साधक द्वारा तन व मन दोनों की स्थिरता स्थापित कर पाने के उद्देश्य से रचित की गई है। जब तक आप सम्पूर्ण स्थिरता स्थापित नहीं कर पाएंगे, तब तक आपका देहाध्यास (शरीर-बोध) छूट नहीं पाएगा; अस्तु, ध्यान के अभ्यास में भी आपका देह के साथ तादात्मय बना ही रहेगा जो आपके अभ्यास में भटकाव लाएगा। और, जब तक आप सम्पूर्ण रूप से देहाध्यास से ऊपर नहीं उठ जाते, तब तक आपको उस सार्वभौमिक एकात्मता का बोध नहीं हो सकता। जब तक आप सम्पूर्ण-स्थिरता स्थापित करने में सफल नहीं होते, आपके सभी अनुभव बौद्धिक स्तर की कल्पना मात्र हैं।

उन अनुभवों का कोई तात्विक मूल्य नहीं होता और वे प्रायः अर्थविहीन ही रहते हैं। ऐसे अनुभवों को दोहराया नहीं जा सकता। वे आपकी परिशुद्धि, परिमार्जन, मार्ग-दर्शन व सामर्थ्य बढ़ाने में सहायक नहीं होते। यह एक कटु सत्य है।एकाग्रता का अटल अभ्यास आपके शरीर की दस प्रमुख ऊर्जाओं को स्थिर करता है व सुगमता पूर्वक चट्टान की भांति स्थिर बैठने में आपका सहायक बनता है। एकाग्रतापूर्ण ध्यान इस मार्ग का प्रथम चरण है। यदि आप अपने ध्यान की वस्तु पर अपनी इच्छा के अनुरूप लंबी अवधि तक केन्द्रित नहीं रह पाते तो आप चिंतनशील ध्यान अथवा विश्लेषणात्मक अनुसंधान के लिए अभी तैयार नहीं हैं, चूंकि प्रमुख रूप से मन तो अभी भी अस्थिर अवस्था में ही है।

एक अस्थिर मन विवेकपूर्ण बुद्धि द्वारा व्यापक विश्लेषण करने में असमर्थ होता है। एकाग्रता पर स्वामित्व होते ही अलौकिक दिव्य-बोध व परमोत्कृष्ट दिव्य-चेतना स्वतः उजागर हो जाते हैं। मेरा ध्येय आपके साथ ध्यान-प्रणाली, पथ के व्यवधान, उनसे ऊपर उठने की विधियाँ, विविध भटकाव, विपथगमन, व इस अभ्यास के विभिन्न चरणों को साझा करना है। यदि आप वास्तव में एक उत्तम ध्यान-योगी बनने का उद्देश्य रखते हैं तो मेरा सुझाव है कि आप मानसिक परिवर्तन के अंतर्गत लिखे सभी लेख पुनः अवश्य पढ़ें। कृपया इन्हें समय दें व ध्यानपूर्वक पढ़ें। यह अध्ययन ही मूल आधार है। भले ही आपको लगता हो कि आपने इन लेखों से उद्धत मुख्य संदेश समझ लिए हैं, तथापि इन्हें पुनः पढ़ें। एक बार पढ़ने के उपरांत, जिन लेखों में एकाग्रता व उसके अभ्यासों का वर्णन है, उन्हें एक बार और पढ़ें। जब तक उन अभ्यासों की अतिशय महत्त्वता आप पूर्ण रूप से आत्मसात न कर लें, तब तक आपके लिए एकाग्रतापूर्ण ध्यान पर पूर्ण स्वामित्व पाना कठिन होगा।

चिंतनशील ध्यान

अपने शरीर पर सम्पूर्ण स्थिरता स्थापित करने के उपरांत व मन को स्वेच्छा से किसी भी समय, चाहे जितनी लंबी अवधि के लिए, एक विचार/वस्तु पर केन्द्रित करने में सक्षम हो जाने पर, आप चिंतनशील ध्यान के लिए तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार के ध्यान के अभ्यास से आप स्वतः एक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हैं जिसके द्वारा हर प्रकार का वास्तविक ज्ञान प्रकट होने लगता है; जीवन के विभिन्न आयामों का आभास व इसी प्रकार के अन्य अनुभव होने लगते हैं जिन्हें शब्द-रूप देना असंभव है। दिव्य, अलौकिक ज्ञान प्रस्फुटित होने लगता है। ध्यान मार्ग के ग्रन्थों में इसके लिए एक शब्दावली है – अचल विपशयना – अर्थात मानसिक गतिविधि विहीन अंतर्दृष्टि।

मोनियर विलियम्स संस्कृत शब्दकोश में विपशयना का अर्थ है – उन्मुक्त अवस्था; बिना किसी पदचिन्ह के। और, यही तो मूल कुंजी है, जब प्रतिबंधित मन लवलेश मात्र भी न बचे, जब आपको बौद्धिक स्तर से ऊपर उठने की अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाये; हर प्रकार के परिकलन से ऊपर; वह होता है – लोकोत्तार, अनुभवातीत ज्ञान; परम-सत्य अंतर्दृष्टि जो अन्तःकरण से प्रकट हुई है। यह किसी प्रकार के अनुबंधित ज्ञान, विश्लेषण, अथवा विचार-विमर्श की उपज नहीं है। यह चिंतनशील ध्यान का प्रसाद है। यह एक उन्नत स्तर का अभ्यास है। इस पर मैं आने वाले समय में प्रकाश डालूँगा।

इस श्रंखला में आगामी लेख होगा – एकाग्रतापूर्ण ध्यान का वास्तविक अभ्यास।

लेख पढ़ते रहें।

शांति।
स्वामी