कल मुझे एक रोचक टिप्पणी प्राप्त हुई –

क्या आप, कृपया, उन सभी महाकाव्यों व कथाओं पर अपने विचार व्यक्त करेंगे जो हम सब पढ़ते हैं? हर बार जब उन्हें पढ़ते हैं तो भिन्न उत्तर मिलते हैं व भिन्न प्रश्न भी सामने आते हैं। मुझे एक अनुभूति होती है कि बहुत से प्रसंग विगत काल में घटित हुए, और तत्वज्ञानी ऋषि-मुनियों ने इसे एक सुअवसर समझा और प्राणी-मात्र के भले के लिए उन्हें एक महान विचारणा के रूप में अनुवादित किया। मुझे अभी भी पूर्ण विश्वास नहीं कि यह सब वास्तव में घटित हुआ, और, क्यों केवल कुछ ही व्यक्तियों ने इसे देखा? दूसरे, यदि आप भगवद् गीता, रामायण, महाभारत इत्यादि का पठन-पाठन करें तो हर पंक्ति, हर बार पढ़ने पर, एक नया ही परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती है। मैं चाहता हूँ कि इस पर आप अपने विचार साझा करें व इनके पठन-पाठन की उपयुक्त प्रक्रिया भी बताएँ ताकि हम इनमें से उचित सत्व ग्रहण कर पाएँ। मुझे नहीं लगता कि यह एक कथा मात्र है। यह एक संदेश है जिसे हमें पढ़ना व समझना है। कृपया टिप्पणी करें।

आपके उपरोक्त कथन से मैं यह समझता हूँ कि आप कुल मिला कर तीन प्रश्न पूछ रहे हैं –

१. विभिन्न रचनाओं के गुप्त अभिप्राय
२. हर बार पढ़ने पर भिन्न व्याख्या
३. ऐसे ग्रंथों के पढ़ने का उचित प्रक्रम

धार्मिक ग्रंथों का गोपनीय अर्थ

समय के साथ-साथ मैं मुख्य पौराणिक व दूसरी कथाओं के अर्थ खोलता रहूँगा, जैसे वो मुझ पर उद्घटित होंगे। मैं अपनी क्षमता अनुरूप मुख्य महाकाव्यों पर भी प्रकाश डालूँगा। परन्तु, कृपया ध्यान रखें कि ऐसे महाकाव्य उन प्रबुद्ध ऋषि-मुनियों द्वारा रचे गये थे जो केवल साधारण मनुष्य नहीं थे, वरन अपनी तपस्या के बल पर स्वयं दिव्य-स्वरूप हो चुके थे। वे ज्ञान एवं प्रकाश के साकार रूप थे। उनकी तपस्या की अवधि एवं गुणवत्ता ने उन्हें सब कुछ अपरंपरागत रूप से देखने की क्षमता प्रदान की। अपनी कठोर तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त मन की असाधारण स्थिरता ने उन्हें तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता भी प्रदान की।

अपनी तुच्छ बुद्धि, जो सरसों के एक दाने के एक अरब हिस्से से भी छोटी है, द्वारा यह दावा करना कि मैं इनके गुह्य-ज्ञान की व्याख्या कर सकता हूँ, कुछ निर्भीकतापूर्ण होगा, यदि पूर्णतया दंभपूर्ण न भी कहा जाए तो। मैं इसे एक बौद्धिक स्तर का अभ्यास नहीं बनाना चाहता। हालाँकि मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरी समाधिस्थ अवस्था में सभी प्रकार के रहस्योदघाटन प्रस्फुटित होते हैं । परंतु ऐसे रहस्योद्घाटनों को जब शब्दों का रूप दिया जाता है तो वे हर प्राणी की समझ में आ भी सकते हैं और नहीं भी। और तो और, हो सकता है यह कुछ लोगों की धार्मिक भावनाओं को क्षति भी पहुँचा दे।

जो कुछ भी मुझे प्राप्त हुआ है उसे शब्दों का रूप देना चुनौतीपूर्ण है। चूँकि, एक, भाषा अपने में सीमित घटक है व, दूसरे, यह विषय विचार-विमर्श से परे है। इतना कहने के पश्चात मैं अपनी बढ़बढ़ चालू रखूँगा। यदि यह किसी मनुष्य को, किसी भी प्रकार से, कभी भी प्रेरित कर सके, अथवा किसी एक जिज्ञासु को भी उसका स्वयं का सत्य पाने में सहायक हो, तो मेरा कार्य पूर्ण हो गया।

प्रत्येक पठन से नया अभिप्राय

यही है जो इन्हें कालातीत बनाता है। पाठक के भाव, उसके ज्ञान की गहराई व एकाग्रता के अनुरूप, जितनी बार ऐसे साहित्य को पढ़ा जाए, उतनी बार एक भिन्न अर्थ निकल कर सामने आएगा। यही एक मौलिक व अपरंपरागत रचना की पहचान है। कोई भी ऐसा साहित्य जो केवल शुष्क बुद्धिमत्ता या लेखन-शैली के कौशल का परिणाम है, कुछ समय पश्चात अपनी चमक खो देगा। ऐसी ग़ूढ रचनायें जो अत्यंत मार्मिक-विश्लेषण या गहन भक्तिपूर्ण भावों से ओतप्रोत होकर उद्धत की गई हों, वे कभी भी अपनी मौलिकता नहीं खोती। एकमात्र यही वह गुण है जो ‘सनातन धर्म’ (जिसे सामान्यत: हिन्दु धर्म के नाम से जाना जाता है) के पुरातन ग्रंथों को इसी धर्म की अनेकानेक आधुनिक रचनाओं से पृथक करता है।

एक योग्य गुरु की अनुपस्थिति में ये कथाएँ पाठकों को यूँ ही स्तंभित करती रहेंगी। हमारे सभी धर्म ग्रंथ, बिना अपवाद के, गुरु द्वारा मौखिक रूप से ही शिष्य को हस्तांतरित किए गये थे। ऐसी मौखिक अभिव्यक्ति के दौरान जहाँ आवश्यक होता, गुरु इन कथाओं के गोपनीय अर्थ भी बताते। ऐसी आवश्यकता पूर्ण रूप से गुरु के विवेक पर आधारित थी, जो शिष्य का उसकी बौद्धिक व मानसिक योग्यता के लिए ध्यानपूर्वक परीक्षण करते थे।

समय में बदलाव, कागज की खोज व लेखन सामग्री के आगमन के साथ, जिज्ञासुओं ने ऐसी रचनाओं को प्रलेखों का स्वरूप देना आरंभ किया। तत्वज्ञानी महापुरुषों ने नश्वर शरीर त्याग दिए किंतु धर्म-ग्रंथ पीछे रह गये। अधिकत: जिज्ञासुओं ने यह अवधारणा बना ली कि इन पुस्तकों का बौद्धिक चिंतन-मनन मात्र उन्हें परम-बोध के लिए सज्जित कर देगा। ऐसे बाल-सुलभ व आलस्यमय निष्कर्ष ने अत्यंत पवित्र एवं महानतम वैदिक आराधना को मात्र कर्म-काण्ड में रूपांतरित कर दिया जो कि कर्ता एवं दर्शक, दोनों के लिए नीरस प्राय: बन गये।

यह विचार करना कि राम वास्तव में इस धरती पर अवतरित हुए अथवा वह किसी के मन की उपज मात्र हैं, एक व्यर्थ कार्य है। आस्तिक के लिए ऐसे आश्वासन की कोई आवश्यकता नहीं, और नास्तिक के लिए किसी भी स्तर का प्रमाण उसे बदल नहीं सकता। अतः परेशान क्यों हों!

यदि यह मान्यता कि ईश्वर ने राम अथवा कृष्ण अथवा क्राइस्ट, या फिर किसी अन्य रूप में इस पृथ्वी को शोभायमान किया, आपको परम शांति की खोज में सहायक होती है; यदि ऐसी मान्यता आपको सदाचार व करुणा के मार्ग पर चलने में सहायक है; यदि यह मान्यता आपको एक योग्य व्यक्ति बनाती है व विश्व को उन्नत बनाने की ओर प्ररित करती है, तो आपको अपनी मान्यता पर दृढ़ रहना चाहिए।

और यदि ईश्वर को नकारने से, या उसका मनुष्य-रूप धारण करने की क्षमता का खंडन-मात्र आपको उपरोक्त सब करने में सहायक है, तो आपके लिए ईश्वर में आस्था रखने का कोई कारण ही नहीं बनता। यदि धर्म-शास्त्र आपको विलक्षण कहानियाँ प्रतीत होती हों और कल्पना से अधिक कुछ नहीं लगते हों, किंतु वह मान्यता आपको मानव जाति के कल्याण में सक्षम, समर्थवान बनाती हो, तो मैं चाहूँगा कि आप भले ही, आस्तिक न हो कर, नास्तिक ही रहें।

जब आस्तिक सोचता है कि नास्तिक मूर्ख है व नास्तिक समझता है कि आस्तिक, तो यह मात्र यही दर्शाता है कि किसी को भी अंतरयात्रा का भान नहीं है, और दोनों ने ही दूसरों के दृष्टिकोण को अपना रखा है; और उनकी मान्यता केवल बौद्धिक संरचना मात्र है; उनकी स्वयं की खोज से कोसों दूर। दोनों से ही दूर रहें। अपना सत्य स्वयं खोजें। अपनी स्वयं की खोज के उपरांत, कोई भी परिपेक्ष्य ग़लत नहीं लगेगा।

धर्म-ग्रंथों के पठन का उचित प्रक्रम

सच पूछें तो कोई उचित या अनुचित तरीका नहीं होता। पिछले भाग के अंतिम चार अनुच्छेदों के अनुक्रम में ही (कृपया उन्हें दुबारा पढ़ें), जो कोई अर्थ अथवा मार्ग आपको परम शांति पाने में सहायक होता हो, वह आपके आत्म-साक्षात्कार की यात्रा का प्रारंभिक बिंदु बन जाता है।

धर्म-ग्रंथ आपकी खोज में सहायक होने चाहिएं, वे स्वयं एक खोज नहीं होते। वे कुछ प्राप्त करने का माध्यम मात्र हैं न कि अपने आप में स्वयं एक प्राप्ति। वे मनुष्य जो केवल पठन मात्र से ही सत्य को समझने का प्रयास करते हैं, सामान्यत: और अधिक उलझन, या अल्पावधि की आस्थाएँ उनका अभिवादन करती हैं।

मैं भगवद् गीता का एक श्लोक उद्धत करना चाहूँगा। आप इसे अध्याय ४ में देख सकते हैं। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –

तद्विधि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ||

अर्थात – तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के सम्मुख संपूर्ण समर्पण-भाव, आस्था व आदर सहित; साष्टांग दंडवत प्रणाम व सेवा अर्पण करते हुए प्रस्तुत हों। चतुराई को बिल्कुल छोड़ कर, विनम्रतापूर्वक उनके समक्ष प्रश्न रखें। वे तत्वदर्शी महापुरुष तब तुम्हें उस तत्वज्ञान का ग़ूढ अर्थ बताएँगे।

गुरु-शिष्य परंपरा स्वयं में अद्वितीय है। संपूर्ण ज्ञान को वास्तव में जानने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे महापुरुषों का मार्गदर्शन लिया जाए। मार्गदर्शन की राह में निम्न दो बाधाएँ मनुष्य को रोकती हैं –

१. अभिमान –जब जिग्यासु यह सोचता है कि उसने सब जान लिया है; सीखने की प्रक्रिया वहीं समाप्त हो जाती है। अब उसे गुरु की बात सुनने की आवश्यकता अथवा इच्छा महसूस नहीं होगी।
२. तत्वज्ञानी महापुरुष की अनुपस्थिति – जब आप इस मार्ग पर श्रद्धापूर्वक एवं दृढ़ता से आगे बढ़ते रहते हैं, तो या तो ईश्वरीय-सत्ता स्वयं आपको आपके गुरु से मिलवाने के अनुकूल परिस्थितियाँ बनाएगी; अथवा आपके अंत:करण का “गुरु” स्वयं आगे बढ़ कर आपका हर पग पर मार्गदर्शन करता रहेगा। यह दूसरी अवस्था बहुत से अधपके जिज्ञासुओं द्वारा पलायन का माध्यम भी बना ली जाती है; इससे उनकी स्वयं की ही हानि होती है – ‘साक्षात्कार’ के अनुभव से च्युत हो कर।

जब ज्ञान प्राप्ति का प्रश्न आता है तो यदि आपका गुरु के साथ केवल सखा भाव ही होगा, तो आपको ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। अर्जुन श्री कृष्ण के भ्राता व सहचर थे, परन्तु वे भी पहले श्री कृष्ण के चरण कमलों में संपूर्ण समर्पण करते हैं, और अपने को शिष्य रूप में प्रस्तुत करते हैं – {कार्पण्यदोषोपहतभाव पृच्छामि त्वां…} (भ० गी० – २।७)। इस प्रकार के संपूर्ण समर्पण व भावपूर्णता के पश्चात ही श्री कृष्ण कालातीत वेदों, सांख्य, भक्ति, योग व अन्य ज्ञान की तात्विक व्याख्या करते हैं।

जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए आतुर एवं अपने झूठे अहम भाव को अलग करने का इच्छुक होता है, तब मानें कि वह गुरु की खोज “आरंभ” करने के लिए तैयार है। और, जब मनुष्य इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए तैयार होता है, गुरु का उस के जीवन में पदार्पण होता है। लेकिन ऐसा मनुष्य जो अपने अहम भाव से पूरी तरह ग्रसित है, उसके सम्मुख यदि ईश्वर स्वयं भी साक्षात रूप में उपस्थित हो जाएँ, तो वह भी उसे हिला नहीं पाएँगे। वरना क्यों हिरण्यकशयप ने भगवान नरसिंह का विरोध करके, मुक्ति की अपेक्षा अपना विध्वंस स्वीकारा?

गुरु अपरिहार्य नहीं होता। मैं यह निर्भीक कथन कुछ दंभपूर्ण ढंग से कह रहा हूँ। तथापि, गुरु आपको मार्ग देखने व उस पर तत्परतापूर्वक चलने में सहायता कर सकता है। धर्म-ग्रंथों की ही भांति, गुरु लक्ष्य पाने का माध्यम है।

शांति।
स्वामी