हमारा आश्रम सुंदर पहाड़ों से घिरा है। यहाँ एक विस्तृत एवं उथली नदी बहती है। अपने जलमार्ग और प्रवाह के माध्यम से नदी स्वयं को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर रही है। नदी का उथलापन मुझे उन व्यक्तियों की याद दिलाता है जो भौतिक सुख की प्राप्ति में सतही एवं अगंभीर हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपनी शांति तथा अपने व्यक्तित्व का गाम्भीर्य खो देते हैं।

एक पाठक जिन का आश्रम परियोजना में निस्वार्थ भागीदारी और योगदान रहा, उन्होंने निम्नलिखित प्रश्न किया। कईं व्यक्तियों ने मुझ से इस प्रकार के प्रश्न किए हैं।

प्रभु, क्या आप मन और विचारों को नियंत्रित करने के विषय पर हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं? ये बुमेरांग के समान होते हैं जिसे आप जितनी तीव्रता से भी फेंकें वे वापस आप ही के पास लौट कर आते हैं। विचारों को नियंत्रित करने का जितना भी प्रयास करें वे उतने ही अधिक मात्रा में मन में आते हैं तथा और अधिक अशांति एवं निराशा पैदा करते हैं। आप के अनुसार इन पर विजय पाना सबसे कठिन कार्य है, किंतु यह असंभव नहीं है और जब हम इसे करने में सफल हो जाएं तो अत्यंत आनंद का अनुभव करेंगे।

मन को नियंत्रित करने के कार्य को एकाग्रता कहते हैं। इस प्रकार के नियंत्रण को बनाए रखने की कला को ध्यान कहते हैं। मन को अपने भीतर की ओर केंद्रित कर के मन के साथ ऐक्य प्राप्त करने को समाधी कहते हैं। मन पर नियंत्रण प्राप्त करने से स्वत: ही विचारों की प्रवाह रुक जाती है और इस का विपरीत भी सही है। ऐसा इसलिए क्योंकि मन और विचार अविभाज्य हैं। ये केवल सांकेतिक परिभाषाएँ हैं। भविष्य में मैं इस विषय (ध्यान) पर विस्तार से लिखूँगा। मन की शांति प्राप्त करने हेतु एक दृढ़ एवं उत्सुक प्रयास की आवश्यकता है। अपने ध्यान के स्तर एवं गुणवत्ता को सुधारने के लिए, ध्यान करते समय जब भी आप अपने मन को भटकते हुए पाएं तो आप को उसे वापस अपने ध्यान के केंद्र अथवा ध्यान के विचार पर लाना होगा। यह धीरे से बिना अत्यधिक परिश्रम एवं तनाव के किया जाना चाहिए। अनावश्यक रूप से निरंतर और कठिन प्रयत्न एवं संघर्ष से मन को नियंत्रित करने का प्रयास मन को बेचैन और व्याकुल कर देगा।

बजाय इसके कि आप लंबी अवधि का ध्यान सत्र करने का प्रयास करें जहाँ आप को थकान हो और एकाग्रता में चूक का अनुभव हो, आप ध्यान के छोटी अवधि के अनेक सत्र करें। तीक्ष्ण ध्यान बनाए रखा जाना चाहिए और सत्र की अवधि को नियमित रूप से बढ़ाया जाना चाहिए। साधकों के लिए मैं भविष्य में ध्यान के विषय पर विस्तार से लिखूँगा – ध्यान का मार्ग, पूर्वापेक्षा, प्रथा, कार्यसिद्धि, बाधा तथा परिणाम इन सब पर विवरण दूँगा। तब तक इतना जान लें – एक मन जो समाज से और अन्य व्यक्तियों से प्रभावित हुआ हो उस से विचार उत्पन्न होते हैं। मन की स्वाभाविक अवस्था वास्तव में परम आनंद है – लगभग ऐसी अवस्था मानो मन हो ही नहीं।

जब तक आप अंत तक ना पहुँचें हार ना मानें। यदि आप इस मार्ग पर निष्ठा से और परिश्रमपूर्वक चलते रहें तो आप पर अवश्य ईश्वर की कृपा होगी। कैसे? ध्यान करें और जानें।

शांति।
स्वामी