एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, “हम अपना ध्यान-सत्र समाप्त करने के उपरांत प्रार्थना क्यों करते हैं?”
“ऐसा हम ईश्वर का धन्यवाद करने हेतु करते हैं की चलो यह समाप्त हुआ”, गुरु ने परिहास किया।

यद्यपि ऐसा परिहास में कहा गया है, किन्तु, कभी कभी ध्यान ऐसे भाव ही देता है। सच्चे एवं अनुशासनशील जिज्ञासुओं के लिए ध्यान-मार्ग एक दुष्कर यात्रा है। आप भावनाओं के मस्से हटा रहे होते हैं, विचारों के घट्टों से छुटकारा पा रहे होते हैं, इच्छाओं की परतें उतार रहे होते हैं, आप अपने मन को स्थिर करने का प्रयास कर रहे होते हैं। यह सब सुगम नहीं। मन को शांत व पूर्णत: स्थिर करने हेतु उत्तम कौशल व प्रयास की आवश्यकता होती है।

मैंने अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण समायावधि ध्यान के विविध स्वरूपों एवं विभिन्न प्रणालियों के प्रयोग में निवेशित की है। कुछ प्रणालियों का केंद्र-बिन्दु व्यापक मानस दर्शन होता है, कुछ ध्वनियों का आग्रह रखते हैं, बहुत सी विधियाँ यंत्र-मण्डल पर आधारित हैं, कुछ श्वास व्यवस्थापन की बात करते हैं, बहुत से स्वयं के विचारों अथवा संवेदनाओं पर ध्यान देने की बात करते हैं। किन्तु, ध्यान एक कृत्रिम संवेदनशीलता सृजित करने के विषय में नहीं है, यह अपनी सर्वाधिक सहज अवस्था को खोजने के विषय में है – एक उत्तम जागरूकता एवं स्पष्टता की अवस्था। अतः मैं ध्यान की जिस पद्धति को वरीयता देता हूँ वह है – महामुद्रा, चूंकि यह पद्धति मानसिक रचनाओं को मिटाने और अपने मन को जैसा वह वास्तव में है वैसा देखने पर बल देती है – स्थिर, अनंत-अथाह व शाश्वत।

विगत कई वर्षों तक मैंने महामुद्रा का अभ्यास दोनों – तांत्रिक व अतान्त्रिक विधियों से किया है व पाया कि यह वास्तव में अद्वितीय है। महामुद्रा का अक्षरक्ष: अर्थ है महान छाप। आप इसका अर्थ ऐसे भी लगा सकते हैं जैसे स्थिरता की छाप; शांति, आनंद अथवा तो मात्र एक रिक्तता की छाप। किस प्रकार हमारा विश्व (यह विश्व नहीं!) हमारे विचारों की ही मानसिक कल्पना है, इस तथ्य की मैं किसी अन्य समय सहर्ष विवेचना करने को तत्पर रहूँगा। वर्तमान के लिए कृपया मुझे आपके साथ ध्यान के छ: प्रमुख सिद्धांतों को, उसके उद्गम पर एक लघु परिचय सहित, साझा करने की अनुमति दें।

1500 वर्ष पूर्व भारतवर्ष में एक महान ध्यानयोगी हुए। उनका नाम था तिलोपा। बुद्ध – गौतम बुद्ध – की ही भांति उन्होंने भी अपने साम्राज्य का त्याग कर दिया व सच्चे जिज्ञासुओं हेतु ध्यान के सार-तत्व को एक निश्चित रूप प्रदान करने निकल पड़े। उन्होंने इसे महामुद्रा का नाम दिया व मौखिक रूप में इस ध्यान-पद्धति को अपने प्रमुख शिष्य नेरोपा को प्रदान किया, जो स्वयं भी एक अद्वितीय विद्वान थे। जब नेरोपा ने महामुद्रा को भली भांति सीख लिया तो तिलोपा ने उन्हें छ: स्वर्णिम वर्जनाओं से अवगत करवाया – इस सम्पूर्ण पद्धति का मात्र छ: शब्दों में सारांश। मौलिक संस्कृत निर्देश वर्तमान में प्रचलित नहीं हैं किन्तु अंग्रेजी अनुवाद में, उनकी राय संक्षिप्त व स्वर्ण तुल्य है। तिलोपा के अनुसार, और मैं इसका पूर्ण अनुमोदन करता हूँ, एक उत्तम ध्यानयोगी ध्यान के समय निम्नलिखित छ: बातों से बचता है –

१. अभिज्ञान – अतीत के विचारों का पीछा न करें।
२. आकलन – वर्तमान के विचारों का पीछा न करें।
३. कल्पना – भविष्य में क्या घट सकता है इसकी कल्पना न करें।
४. परीक्षण – अपने विचारों का विश्लेषण न करें।
५. निर्माण – एक अनुभव को निर्मित करने की चेष्टा न करें।
६. विचलन – इधर-उधर न भटकें, मात्र इसी क्षण में स्थित रहें।

उपरोक्त निर्देशों के पालन में आप जितना अधिक परिश्रम करेंगे उतना अधिक आप ध्यान से लाभ पाएंगे। यदि आप ध्यान करने बैठते हैं व अपने विचारों का विश्लेषण, अनुस्मरण इत्यादि करने लगते हैं तो ऐसे में आप मानसिक स्थिरता एवं शांति अनुभव करने की दिशा में प्रगति नहीं कर पाएंगे। इस प्रकार के जिज्ञासु की राह में बेचैनी, आलस्य, विचार एवं विभिन्न छवियों जैसे चार प्रमुख व्यवधान सदा बाधा पहुँचाते रहेंगे। बीते समय में मैंने इन चार व्यवधानों पर लेख लिखें हैं। आप इस ब्लॉग के ‘खोज करें’ बिन्दु का उपयोग कर अधिक अध्ययन कर सकते हैं।

जिस प्रकार सागर में लहरें निरंतर निर्मित होती रहती हैं उसी प्रकार मन में विचार निरंतर आते रहते हैं। उत्तम ध्यान के अति उत्तम लाभ में से एक होता है – विचारों का सम्पूर्ण विराम। यह एक असाधारण भाव है; मेरे पास इस का उल्लेख करने के लिए कोई शब्द नहीं कि निरंतर कई घंटे तक उस स्थिति में रहना कैसा होता है। यदि आप ध्यान-मार्ग में वास्तव में गंभीर हैं तो तिलोपा के छ: उपदेश-शब्द आपकी तीव्र-उन्नति में अति सहायक सिद्ध होंगे।

संक्षेप में – ध्यान करते समय पुनः स्मरण न करें, अप्रसन्न न हों, एवं अतीत पर पश्चाताप न करें। अपने वर्तमान जीवन की घटनाओं का परीक्षण न करें। भविष्य की कल्पना न करें। किसी भी विचार का विश्लेषण न करें। जब भी कोई विचार उपजे तो उसके पीछे न भागें। वह स्वतः मिट जाएगा। किसी भी विशेष अनुभव के लिए लालायित न हों, अन्यथा आप उस अनुभव की मानसिक रूपरेखा तैयार करने में लग जाएंगे, जो आपके ध्यान को निम्न स्तर पर ले आएगा। अपने मन को इधर उधर न भटकने दें। केवल इस समय यहीं विद्यमान रहें, इस वर्तमान क्षण में। अपनी जागरूकता को सतर्कतापूर्वक बनाए रखें।

यदि आप अनुशासित हो कर ध्यानयोग का सतत अभ्यास करते रहें तो यह मात्र एक अभ्यास न रह कर, एक शांतिमय मन:स्थिति में परिणित हो जाता है।

महामुद्रा ध्यान के मार्ग पर एक जिज्ञासु प्रगति की नौ अवस्थाओं से गुजरता है। आगामी लेख में मैं उन अवस्थाओं का संक्षिप्त वर्णन सहर्ष प्रस्तुत करूंगा।

शांति।
स्वामी