अनेकानेक लोगों के साथ हुए वार्तालाप में, बहुत का यह प्रश्न होता है कि एक गृहस्थ के लिए आत्म-साक्षात्कार की क्या संभावनाएँ हैं व उसका इस पथ पर प्रथम पग क्या होना चाहिए? एक पाठक ने निम्न प्रश्न पूछा, जिसका उत्तर लेख रूप में प्रस्तुत करने से अन्य जिज्ञासु पाठकों को भी लाभ होगा, ऐसा विचार कर, मेरा उत्तर प्रस्तुत है –

प्रभुजी प्रणाम! हमें अति हर्ष है कि आप हमारे मध्य पुन: उपस्थित हैं ताकि हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्याप्त विभिन्न संघर्षों का सामना करते हुए हम जैसे दुर्बल मन के व्यक्तियों को उचित मार्ग दर्शन प्राप्त हो सके। स्वामीजी, मन की परम चेतन अवस्था अथवा विशुद्ध दिव्य आनंद की प्राप्ति हेतु आधारभूत घटक (पूर्वपेक्षाएँ) क्या हैं? इसका प्रारंभ कहाँ से किया जाए? सांसारिक प्राणी अपने गृहस्थ धर्म संबंधी कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए, किस प्रकार दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ सकते हैं? जीवन में व्याप्त अनेकों मलिनताओं के होते हुए यह कैसे संभव हो? जय माता दी

प्रमुख पूर्वापेक्षाएँ

अपने आत्म स्वरूप को जानने की तीव्र ललक व व्याकुलता एवं मार्ग पर अनवरत बढ़ते रहने का दृढ़ संकल्प – यह प्रमुख पूर्वापेक्षाएँ हैं। कृपया पुराने लेख प्रकृति और आप का पुन: अवलोकन करें व उसके अंतिम भाग, जिसमें दस सूत्र वर्णित हैं, उनका विवेचन करें।

आरंभ

यदि आप ध्यान मार्ग के पथिक हैं तो प्रतिदिन ध्यान में बैठना आरंभ करें, हो सके तो दिन में दो बार। यदि आपको अपने ईष्ट देव के दर्शन की अभिलाषा है तो सर्वप्रथम ईष्ट के साथ एक अंतरंग संबंध विकसित होना अनिवार्य होता है। अपने ईष्ट के दिव्य नामस्वरूप का जप करते हुए उनका अश्रूपूर्ण आह्वान करें। क्या आपको यह अनुचित सा प्रतीत हो रहा है? किंतु, कृपया ऐसा ही करें व परिणाम की विवेचना करें। अपना प्रत्येक कार्य अपने ईष्ट के प्रति समर्पित करें। आपका भोजन ग्रहण करना, श्वास लेना, निद्रा लेना व उठना – प्रत्येक कर्म अपने ईष्ट के प्रति ही हो। यह मार्ग सरल व मंद गति है, किंतु ऐसा समर्पण आपको अति शीघ्र पवित्र कर सकता है।

दृढ़-संकल्प

यहाँ प्रश्न आपकी प्राथमिकताओं का है। क्या आप अपने समय में से प्रतिदिन एक घंटा मेरे लिए रख सकते हैं? यदि नहीं, तो क्या आप मेरे द्वारा कहे गये तथ्यों पर हर क्षण विचार कर सकते हैं, उदाहरण स्वरूप – स्नान करते हुए, गाड़ी चलाते हुए, इत्यादि? यदि नहीं, तो क्या आप टी.वी. देखने अथवा समाचार पत्र पढ़ने का समय बचा कर आध्यात्मिक मार्ग में समर्पित कर सकते हैं? यदि नहीं, तो क्या आप प्रत्येक वर्ष, कुछ दिन, विशेष रूप से आध्यात्मिक यात्रा हेतु निकाल सकते हैं, जैसे ध्यान शिविर में उपस्थित होना? वहाँ मैं स्वयं आप सब के उचित मार्ग दर्शन हेतु सहर्ष उपस्थित रहूँगा। यदि नहीं, तो जीवन की हर परिस्थिति में क्या आप करुणा व अहिंसा का सदगुण धारण कर सकते हैं एवं व्यावहारिक स्थिति में सत्य आचरण को ही अपना धर्म मान सकते हैं? यदि नहीं, तो क्या आपके प्रत्येक भाव, प्रत्येक मनोभाव का उत्तर केवल और केवल प्रेम ही हो सकता है? अब कल्पना करें कि यदि उपरोक्त कथित प्रत्येक सुझाव आप अपने जीवन में धारण कर लें तब आपकी स्थिति कहाँ होगी।

यदि आप आरंभ में प्रबल भाव से प्रयासरत हो पाएँ तो विशुद्ध आत्मिक ऊर्जा का स्राव स्वत: आपेक्षित बदलाव ले आएगा। यदि आप मार्ग पर धैर्य पूर्वक, उचित विधि अनुसार, अविरल चलते चलें, तो अपने प्रयासों में तीव्रता लाने का भाव भी स्वत: उजागर होने लगेगा। अत: दोनों स्थितियों में आप गंतव्य तक अवश्य पहुँचेंगे। एक समय ऐसा आएगा कि दिव्य आनंद में स्थाई स्थिति पाने हेतु आपको संपूर्ण समर्पण के भाव सहित हर कार्य करना होगा। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भविष्य में समय निकालेंगे – ऐसा सोचने से कहीं उचित यह होगा कि आप प्रारंभ तो करें। उपरोक्त सुझावों में से कोई एक, दो अथवा हो सके तो सभी अपनाएँ। मेरे मतानुसार मैं आत्म-परिष्कार की संपूर्ण प्रणाली आपके सम्मुख प्रस्तुत करने का आकांशी हूँ। टुकड़ों में दी गई जानकारी अधिक उपयोगी नहीं हो पाएगी, और संपूर्ण प्रणाली लिपीबद्ध करने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए।

अशुद्ध भावों से मुक्ति

एक नमकीन जल से भरे ग्लास की कल्पना करें। आपका लक्ष्य जल से नमक पृथक करना है। इसके लिए डिस्टिलेशन इत्यादि अनेक विधियाँ आपको ज्ञात हैं और सभी समान रूप से प्रभावी सिद्ध होती हैं। किंतु, उनके परिचालन हेतु निश्चित उपकरणों की आवश्यकता होती है। सुगम विधि यह है की उस ग्लास में ऊपर से स्वच्छ जल डालना आरंभ करें। शीघ्र ही जल बाहर बहने लगेगा। यदि आप स्वच्छ जल डालते रहें तो अंत में ग्लास में नमक युक्त जल की एक भी बूँद शेष नहीं बचेगी व पूर्ण ग्लास स्वच्छ जल से भरा होगा। यही स्थिति आपके मन की भी है। यदि आप ध्यान मार्ग नहीं अपना सकते (जिसकी तुलना उपकरणीय विधियों से की जा सकती है), तब आप अपने मन को दिव्य भावों व नैतिक विचारों से सिंचित करना आरंभ करें। हर प्रकार की दुष्प्रवृतियों से आप स्वत: मुक्त होते चले जाएँगे – एक निर्मल, स्वच्छ, निष्कलुषित मन के अधिपति।

बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि ले – अतीत को बदला नहीं जा सकता। अत:, कृपया स्वयं से रुष्ट न हों व एक नव संकल्प से नव आरंभ करें। आज तक जीवन में जो घटित हुआ अब उसका कोई औचित्य नहीं। यदि आप आत्म-शुद्धि का मार्ग अपनाना चाहें जो आत्म-रूपांतरण की ओर जाता है, तो आप ऐसा अवश्य कर सकते हैं। मेरी जानकारी में ऐसा कोई संत-महात्मा नहीं जिसने कभी एक भी अनुचित कार्य न किया हो। यदि ऐसे कुछ थे भी तो इस से उन पापियों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया जो महात्मा बन गये। एक महात्मा व पापी में मुख्य अंतर यही होता है कि महात्मा सदैव नैतिकता पूर्ण आचरण करते हैं व हर भाव का प्रति-उत्तर केवल और केवल प्रेम द्वारा ही देते हैं। पापी द्वारा प्रतिक्रिया होती है किंतु महात्मा सदा क्रिया ही करते हैं, वह भी बिना अपेक्षा के। जब तक आप स्वयं न चाहें, अन्य कोई आपके द्वारा करुणा का मार्ग अपनाने में रूकावट नहीं डाल सकता।

यदि आप अपनी कार्य शैली में परिवर्तन नहीं लाएँगे, तब प्रकृति भी आपको कुछ नया प्रदान किस प्रकार कर पाएगी! यथार्थ यह है कि हम जैसा बोते हैं वैसा ही, अनंत गुना होकर हमें पुन: प्राप्त होता है!

शांति।
स्वामी