यह लेख व आने वाले तीन लेख, उचित रीति से ध्यान करने में सफल होने के लिए आपकी कुंजी हैं। मैं आपके साथ ध्यान की सामान्य चार त्रुटियों की चर्चा करने जा रहा हूँ। इन चार व्यवधानों एवं इन्हें त्रुटिरहित बनाने के उपयुक्त उपायों की अनिवार्यता के बारे में मैं जितना कहूँ उतना कम होगा। यदि आप वास्तव में एक उत्तम ध्यानयोगी बनने के इच्छुक हैं तो कृपया इन तथ्यों को भली भांति समझने व पूर्ण रूप से आत्मसात करने में जितना भी समय लगे, लगाएँ।

अपने पिछले लेख में मैंने उन सभी से, जो ध्यान के मार्ग पर सजग हैं, यह विनती की थी कि वे एकाग्रता के अभ्यास से सम्बद्ध सभी लेख पुनः पुनः पढ़ें व विचार करें, किन्तु मैं जानता हूँ कि आप में से किसी ने भी, हालांकि सैंकड़ों पाठक स्थायी रूप से मेरे लेख पढ़ते हैं, तथापि, एक पाठक ने भी वास्तव में ऐसा पूर्ण रूप से नहीं किया। और, मुझे इस बात में कोई परेशानी नहीं, किन्तु, मैं चाहता हूँ कि आप यह भली भांति समझ लें कि यहाँ किसी भी प्रकार का कोई संक्षिप्त उपाय काम में नहीं आएगा। यदि आप समाधि का अनुभव चाहते हैं; उस शांत, दिव्य स्थिति की अनुभूति, उस परमानंद का रसास्वादन, तो वह प्रबल प्रयास के बिना नहीं होगा। जब तक आप ध्यान को अपनी सर्वोपरि प्राथमिकता नहीं बनाते, आपके लिए इस मार्ग पर निरंतर बने रहना सहज नहीं। आप जितना चाहे अध्ययन- पठन कर सकते हैं, आप सम्पूर्ण विश्व में विचरण करते रहें, भले आप हर समय बुद्धिमत्ता की बातें सुनते रहें, आप साधु-संतों के सानिध्य में रहें अथवा ऐसा और भी कुछ करते रहें, किन्तु इन सब में से कुछ भी उस दिव्य-परमानंद की अनुभूति व स्थिति का अनुभव पाने हेतु प्रयाप्त नहीं। अंततः, उस अमृत का आस्वादन पाने हेतु आपको स्वयं ही साधना करनी होगी।

आज के विषय पर विस्तृत चर्चा से पूर्व मैं आपको ध्यान का प्रयोजन पुनः स्मरण करवाना चाहूँगा – वह है मन को स्थिर करना व इसे इसके दिव्य, मौलिक व अप्रतिबंधित रूप में कार्य करने देना।

सामान्य दृश्य-विधान

आपके मन की वर्तमान स्थिति अनेकों घटकों द्वारा प्रतिबंधित है, जैसे विकास-क्रम, समाज, धारणाएँ, आकांशाएँ, बुद्धि, दूसरों से प्राप्त ज्ञान, इत्यादि। इन सब से पृथक हो कर ही साधक अपने मन के उस परम स्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है जो सत्य, वास्तविक, व अलौकिक है। जैसे ही आप ध्यान के लिए बैठते हैं, हर प्रकार के अवांछित विचार मन में दौड़ने लगते हैं। जैसे जैसे एकाग्रता बनाए रखने के प्रयास में आप आगे बढ़ते हैं, आप एक तरह की बेचैनी अनुभव करना आरंभ कर देते हैं। ऐसा अनुभव होता है कि आप अपने विचारों से जितना दूर रहने का प्रयास करते हैं, वे विचार उतना ही और बलशाली होते जाते हैं व आप को बेचैन कर देते हैं। यह सामान्य है। एक बार जब आप ध्यान की परम अवस्था में पहुँच जाते हैं, तदोपरांत आप उस परम स्थिति को सहज ही बनाए रख पाते हैं।

प्रमुख व्यवधान

प्रथम रुकावट है – बेचैनी। यह चिंता, विद्वेष, उत्तेजना, अथवा इंद्रिय-आवेश – किसी भी रूप में हो सकती है। यह स्थिति आरंभिक, मध्यवर्ती, व उन्नत – सभी साधकों के लिए सामान्य है। केवल सिद्ध ही इससे बच पाए हैं, वह भी अपने निरंतर अभ्यास व अनुभव के बल पर। एक साधक व सिद्ध में यही अंतर है कि सिद्ध इस बेचैनी के उदय होते समय ही जागरूक होता है व तत्क्षण मनोनियोग का प्रयोग कर अपने मन को शांत कर लेता है, जबकि एक साधक ऐसा नहीं कर पाता व उस बेचैनी को अपने ऊपर हावी होने देता है, जिससे उसका अन्यथा स्थिर मन, अधीर व असंतुलित हो जाता है।

ध्यान के दौरान जब आप बेचैनी अनुभव करते हैं व जैसे जैसे यह बढ़ती जाती है, तब आप को हिलने-डुलने, बैठने की मुद्रा बदलने, बात करने अथवा ध्यान से उठ जाने की तीव्र इच्छा हो सकती है। भूत व भविष्य से संबन्धित भावनाएं, अनुभव, निर्णय व विश्लेषण इत्यादि विचारों के रूप में आकर आपको चिंतित, उत्सुक, अथवा उत्तेजित कर सकते हैं। किसी उपयुक्त अथवा अनुपयुक्त कृत्य से संबन्धित कोई चिरकालिक विचार आपमें पश्चाताप का भाव ला सकता है। यह सब विचार ही हैं और ये आपको बेचैन कर देंगे। एकाग्रतापूर्ण ध्यान के अभ्यास के समय आपको किसी भी प्रकार के सही-गलत, अच्छे-बुरे, इत्यादि के परीक्षण संबन्धित चिंतन में नहीं लगना। बस यह स्मरण रखें कि ये सब केवल विचार मात्र हैं, उन्हें जाने देना, वहीं छोड़ देना सीखें व उनसे ऊपर उठें – यदि आप उत्तम ध्यान के सुबोध सत्रों का आनंद चाहते हैं। जब भी बेचैनी उत्पन्न हो, अधीर न हों। इसका कारण सामान्य है, व, उपचार सरल।

बेचैन मन – एक चिड़चिड़ा शिशु

आइये एक उद्धरण की सहायता से बेचैनी के कारणों को समझने का प्रयास करें –
कल्पना करें कि आप एक शॉपिंग मॉल में हैं। आपके साथ तीन वर्ष का शिशु भी है। वह आपका हाथ पकड़ कर एक सुशील बालक की भांति प्रसन्नतापूर्वक आपके साथ चल रहा है, तभी उसे एक टॉफी-चॉक्लेट से भरा, सुसज्जित, चमकता-दमकता, कार्टूनों की तस्वीरों व उसकी पसंद की अन्य सामग्री से भरपूर, एक स्टोर दिखाई दे जाता है। वह उस स्टोर में जाना चाहता है। किन्तु, आपके अपने अन्य कार्यक्रम हैं, अतः आप चाहते हैं कि वह चुपचाप आपके साथ आगे चले।

वह शिशु उस चॉक्लेट स्टोर में जाना चाहता है किन्तु आप उसे आगे ले जाना चाह रहे हैं। उसका प्रयास तीव्र होने लगता है, साथ ही आपकी उसके हाथ पर पकड़ भी। उसका स्वर तीव्रतर हो रहा है, और आपका और प्रभावशाली। वह वहाँ से हिल ही नहीं रहा और आप भी झुक नहीं रहे। वह और अधिक उत्तेजित हो जाता है व वहीं जमीन पर लोटपोट हो कर चिल्लाने लगता है। अब ऐसी स्थिति में आपके पास चार विकल्प हैं –
१. उसे उसी प्रकार चिल्लाने दें, हालांकि आप इतने लोगों के बीच लज्जित अनुभव कर रहे हैं।
२. उसे यह कह कर मनाने का प्रयास करें कि किसी अन्य दिन आप उसे अवश्य ही स्टोर में ले जाएँगे।
३. उसे स्टोर में ले जाएँ।
४. उसे बाध्य कर अपनी गोद में उठा कर गाड़ी की ओर दौड़ पड़ें।
यह स्थिति वांछनीय नहीं है, और न ही उपरोक्त विकल्पों में से कोई भी सुखद लग रहा है। जब आपका मन बेचैन होने लगता है तो बिलकुल ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मन एक चिड़चिड़े शिशु की भांति व्यवहार करने लगता है। वह अपनी बात मनवाने के लिए हर प्रकार की युक्ति प्रयोग में लाने लगता है।

कारण

जब आप ध्यान में बैठते हैं व एकाग्र होने के लिए अधिक यत्न करते हैं, तब आपका मन बेचैन हो उठता है। उस समय वह एक ही मुद्रा में बैठे रहने, एकाग्र रहने,व स्थिर रहने के अनुशासन को तोड़ देना चाहता है। प्रतिबंधित मन की रचना, आपकी इच्छा के अनुरूप कार्य करने की नहीं होती; वह नेतृत्व हेतु इतना शक्तिशाली होता है कि आप स्वयं मन की इच्छानुसार चलने लगते हैं। यही आपकी चित्तवृतियाँ हैं – मन के वह विचार जिन्हें आसानी से त्याग पाने में आप असमर्थ हैं। बेचैनी तब उत्पन्न होती है जब आप स्वाभाविक का अन्वेषण अस्वाभाविक रीति से करना चाहते हैं; जब आप समझने के स्थान पर, उन विचारों का दमन चाहते हैं; जब आपका लक्ष्य परित्याग न होकर अवहेलना करना होता है; जब आप उन्हें निकल जाने देने के स्थान पर पकड़े रहते हैं।

उचित ध्यान प्रक्रिया में स्वीकृति, जागरूकता, अभिवृति व संतुलन होता है। यह वह कौशल है जो व्यक्ति को सीखना होता है – उस संतुलन को पाना व उसे यथारूप बनाए रखना होता है। यह मात्र स्थिर बैठे रहने के लिए स्थिर बैठना मात्र नहीं है, यदि ऐसा होता तो सभी पशु महान ध्यान योगी कहलाते। यह नेत्रों को बंद कर यह दर्शाने का प्रयास कि आप विचार शून्य अवस्था में हैं – ऐसा भी नहीं है। यदि यही ध्यान की उचित प्रक्रिया होती तो सभी शीतनिद्रा में सुप्त जीव-जन्तु उत्तम ध्यान योगी होते। यह तो समन्वय बनाए रखने की कला है; मन की स्वाभाविक, सहज स्थिति।

समाधान

बेचैनी के निराकरण का सर्वोत्तम उपाय यह है कि उस क्षण आप ध्यान की प्रक्रिया को वहीं रोक दें। हो सके तो उसी मुद्रा में स्थित रहें, किन्तु, एकाग्रता बनाने का प्रयास न करें। स्वयं के साथ कुछ समय वार्तालाप करें। विश्रांति का अनुभव करें। ध्यान करने के सभी प्रयास रोक दें। एक गहरा श्वास लें। अपनी रुचिनुसार किसी विषय पर स्वयं के साथ वार्तालाप करें; किसी उत्तेजनापूर्ण विषय पर नहीं, बल्कि ऐसा कुछ जो आपको एकाग्र होने की प्रक्रिया से विराम दे। यदि इतना करने से भी बेचैनी समाप्त न हो तो वहाँ से उठ जाएँ व कुछ समय पश्चात पुनः आरंभ करें। हमें मन रूपी बालक को तब तक इधर उधर उलझाए रखना है जब तक वह चॉक्लेट स्टोर उसकी आँखों से ओझल न हो जाये!

जब आपका चित्त थकान अनुभव करे, उसे थोड़ा विश्राम दें; जब चित्त अशांत हो उसे शांत करें। मन को प्रेमपूर्वक शांत करें; मन से वार्तालाप करें। उसे उसका मनपसंद कुछ दें। उसके साथ लंबे अंतराल के लिए कठोर न बनें। हम इसे अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे हैं। इसे हमारे निर्देशानुसार चलना सिखा रहे हैं। धैर्य बनाए रखें। इसे शांत करें। बेचैनी एक साधारण भाव है व मन को शांत करना एक कला है, कौशल है। कभी आपने किसी योग्य कुक्कुर(डॉग)-प्रशिक्षक की कार्य प्रणाली पर ध्यान दिया है? एक उत्तम प्रशिक्षक यह भली भांति जानता है कि कब पुरुस्कृत करना है व कब सजा देनी है; कब बांध कर रखना है व कब खुला छोड़ना है; कब कठोर बनना है व कब प्रेम दर्शाना है। हो सकता है कुछ के पास ये गुण स्वाभाविक रूप से हों, किन्तु अत्यंत सुयोग्य प्रशिक्षकों ने ये गुण अपने सतत अभ्यास, दृढ़ता व अनुभव से निर्मित किए हैं। एकाग्रतापूर्ण ध्यान की प्रक्रिया द्वारा मन को प्रशिक्षित किया जाता है, और जब ऐसा हो जाता है, वह स्वतः ही वश में आ जाता है।

जैसे जैसे आप ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ते चलेंगे, आप सीख जाएँगे कि किस प्रकार चलें ताकि आरंभ से ही बालक उस चॉक्लेट स्टोर अथवा तो खिलोनौं की दुकान, अथवा उन झूलों को देख ही न पाये। यदि वह उन सब को देखेगा ही नहीं तो वह एक प्रसन्नचित्त बालक की भांति पूरा समय आपका सहयोग करेगा, जितना समय आप खरीददारी (मायने ध्यान) कर रहे हों। यह सब अभ्यास से, सीखने से, व निरंतर पथ पर बने रहने से ही संभव है। जैसे जैसे हम आगे विचार करेंगे, मैं आपके साथ विभिन्न अभ्यास व उपयुक्त विधियाँ साझा करता रहूंगा। अभी के लिए, बेचैनी के क्षणों में, ऊपर बताई युक्तियाँ अपना कर मन को शांत करने का अभ्यास करते रहें।

क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि एक शांत मन के स्वामी होने पर आप कितना बलशाली अनुभव कर पाएंगे! एक ऐसा मन जो अंतर्मुख हो चुका हो, जिसने आपके निर्देशानुसार कार्य करना सीख लिया हो, न कि आपको अपना दास बना रखा हो!

कोई चॉक्लेट नहीं, कोई झल्लाहट नहीं!
शांति।
स्वामी