विगत लेख में मैंने ध्यान के समय होने वाली बेचैनी के विषय पर चर्चा की, जो उचित ध्यान प्रक्रिया में सर्वप्रथम व्यवधान है। जैसे कि पहले भी चर्चा हो चुकी है कि मुख्य रूप से चार ऐसी त्रुटियाँ हैं जो साधक के सिद्ध बनने के मार्ग में रुकावट हैं; जो साधक को अपने परम चेतन, परम सत्य स्वरूप के अनुभव से रोके रखती हैं। तथापि, यदि साधक अपने मार्ग पर सुदृढ़ रहता है व इन व्यवधानों के निराकरण में निरंतर कार्यरत रहता है, तब, ऐसा साधक उस दिव्यता, उस परमानंद का आस्वादन अवश्यमेव प्राप्त करता है।

इस लेख में हम द्वितीय व्यवधान पर विस्तृत चर्चा करेंगे , वह है – आलस्य। यह दो प्रकार का है। मान लें कि आपने प्रतिदिन ४५ मिनट ध्यान का अभ्यास करने का निर्णय लिया है। यह आपका संकल्प है। प्रथम प्रकार का आलस्य आपको ध्यान में प्रतिदिन बैठने से रोकता है। आपका चेतन मन आपसे तरह तरह की याचना करता रहता है, चूंकि वह कहीं भी बंधना नहीं चाहता। वह अपने ही मार्ग पर चलना चाहता है व अपने साथ आपको भी खींच लेता है। किसी भी योजना को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने में अनुशासन की विशुद्धता सर्वोपरि होती है, भले ही वह ध्यान के लिए बैठना हो अथवा कोई अन्य योजना। इस प्रकार के आलस्य से बचने का मात्र एक ही उपाय है, और वह है कि अपने मन की बात न सुनना। यदि आप दृढ़ता पूर्वक निश्चय कर लें कि भले ही कुछ भी हो जाये, आपको ध्यान के लिए बैठना ही है, तो धीरे धीरे आपके चेतन मन में यह बात बैठ जाएगी कि मालिक आप हैं, और जब बात अनुशासन में रहने की हो तो आप अपने मन के साथ कोई ढील नहीं बरतेंगे।

इस लेख में मेरा केंद्र बिन्दु द्वितीय प्रकार का आलस्य है, वह स्थिति जो आप ध्यान के दौरान अनुभव करते हैं।

सामान्य दृश्य विधान

जब आप सुस्थिर हो कर, एक मुद्रा में अविचल बैठ कर, ध्यान आरंभ करते हैं, प्रारंभिक कुछ मिनट आप उसका आनंद लेते हैं। आरंभ में, आप चेतन मन की चंचल अवस्था के प्रति जागरूक हैं। आप अपने विचारों को सुव्यवस्थित करने में परिश्रमरत रहते हैं; आप यत्नपूर्वक एकाग्रता बनाए रहते हैं; आप केन्द्रित रहने का प्रयास करते हैं। जब आप यह सब करते हैं, तब आप बेचैनी अनुभव करने लगते हैं। ऐसी बेचैनी आपको हिलने डुलने, विचार करने, अथवा ध्यान प्रक्रिया वहीं समाप्त करने के लिए उत्तेजित कर सकती है। ऐसी बेचैनी हटाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि आप उस क्षण विश्राम लें । हालांकि, जैसे ही आप विश्राम लेते हैं, हो सकता है आपकी मानसिक तीक्ष्णता भी बाधित हो जाये। यदि ध्यान न दिया जाये, तो ऐसा विश्राम निष्क्रियता, उदासीनता, एक प्रकार की तंद्रा, व जड़ता की अवस्था में रूपांतरित हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी मानसिक छवि पर एकाग्र होने के माध्यम से ध्यान कर रहे हैं, तो वह छवि, वह बिम्ब, धुंधला हो कर लुप्त हो जाएगा। यदि आप किसी मंत्र के माध्यम से ध्यान कर रहे हैं तो, वह प्रक्रिया मात्र होती हुई लगेगी, किन्तु आपका उस मंत्र को स्वयं के द्वारा सुनना बाधित हो जाएगा; मंत्र के साथ सम्पूर्ण तादात्मय का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इस स्थिति में आपकी ध्यान प्रक्रिया का प्रमुख अव्यय – सुबोधगम्यता, स्पष्टता – लुप्त हो चुका है और आप मात्र एक स्थिर अवस्था में बैठे हैं, जिसका अब कोई औचित्य नहीं।

आलस्य – एक गंभीर त्रुटि

उचित ध्यान प्रक्रिया में जागरूकता की सर्वाधिक अहम भूमिका है। ध्यान करते हुए आलस्य मन में नीरसता अथवा शरीर में सुस्ती आ जाने का स्वरूप ले सकता है। यदि आपको नीरसता अनुभव हो, अर्थात, एक प्रकार की तंद्रा अथवा स्फूर्तिविहीनता, तब ध्यान की वस्तु की छवि धुंधली होने लगती है; परम चेतना के प्रति सूक्ष्मग्रहिता / संवेदनशीलता , लुप्त हो जाती है। यह तो नींद लेने के समरूप होगा। ध्यानावस्था के दौरान यदि स्पष्टता नहीं है, सतर्कता व सुबोधगम्यता नहीं है, तब आपको अन्तःकरण में विश्रांति का अनुभव भी नहीं हो पाएगा, मन की परम-सहज अवस्था तो अभी दूर की बात है। आप ध्यान के ऐसे सत्र से उठने पर अर्ध-सुखानुभूति अनुभव करेंगे, जैसा आप कुछ समय की निद्रा के पश्चात अनुभव करते हैं। प्रायः, बहुत से साधक इसे ही उचित ध्यान समझ लेते हैं। उत्तम ध्यान में चेतन मन को निद्रा की अवस्था में नहीं पहुँचाना होता; उत्तम ध्यान है – मन को निर्बाध करना, खाली करना। इस प्रकार की मन की निर्बाधता, आनंद का स्तोत्र बन, अपने साथ एक उत्कृष्ट संवेदनशील भाव लाती है। यदि आरंभिक सत्रों में साधक अनुचित विधि से ध्यान करने का अभ्यास बना ले, तो बाद में ऐसे त्रुटिपूर्ण अभ्यास से छुटकारा पाना अत्यंत श्रमसाध्य हो जाता है।

आलसी मन – एक धीमा गजराज

ध्यान से संबन्धित विभिन्न योगिक एवं तांत्रिक ग्रन्थों में एक आलसी मन की तुलना धीमी गति से चलने वाले गजराज से की गई है। नीरसता रूपी व्यवधान एक हाथी की ही भांति विशालकाय होता है। यही कारण है कि अनेक ध्यान संबंधी देवों के हाथ में एक अंकुश प्रदर्शित किया जाता है, एक अस्त्र जो हाथी को प्रेरित करने हेतु प्रयोग होता है। इस प्रकार के अस्त्र का गुह्य अर्थ यही है कि सदा सतर्कता व सावधानी रूपी अंकुश से आलस्य व तंद्रा रूपी हाथी को नियंत्रित करते रहें। जिस प्रकार हाथी जैसा विशालकाय प्राणी यदि मार्ग में आ जाए तो आपकी दृष्टि में व्यवधान उत्पन्न कर सकता है, उसी प्रकार मन का नीरसपन आपके परम आनंद व परम चेतना की एकरूपता के मार्ग में व्यवधान उत्पन्न करता है। एक शीतनिद्रा में अथवा गहन निद्रा में अवस्थित अजगर का उद्धरण लें। वह स्थिर है, शांत है, किन्तु उस स्थिति को ध्यानावस्था नहीं कहा जाता। यदि आप मन से सुस्त हैं अथवा बेचैन हैं, उस समय भले आप कितना भी स्थिर बैठे हों, परंतु, ऐसी ध्यानावस्था अयथार्थ है। त्रुटिपूर्ण ध्यान प्रक्रिया उस बर्तन के समान है जिसमें अनेक छेद हों। जैसे उस बर्तन में जल नहीं ठहर सकता, वैसे ही ऐसे ध्यान से परमानंद की स्थिति ठहर नहीं पाती।

कारण

कल्पना करें कि आप एक विशालकाय चट्टान को हिलाने की चेष्टा कर रहे हैं। आप अपना सम्पूर्ण बल प्रयोग किए जा रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि कुछ समय पश्चात आप निढाल हो जाएँगे व थकान अनुभव करेंगे। बिलकुल ऐसा ही आपके मन के साथ भी होता है। जब आप यत्नपूर्वक एकाग्रचित्त होने के लिए प्रयासरत होते हैं, व बेचैनी अनुभव करने पर भी लगातार प्रयास करते रहते हैं, तब ऐसी स्थिति आती है जब आप थका-मांदा एवं निढाल महसूस करने लगते हैं। उस समय यदि आप सतर्क नहीं, तो उसी क्षण आप निष्क्रियता की अवस्था में पहुँच जाएँगे। ऐसी नीरसता आने पर ध्यान नहीं हो पाता। यदि यह मान कर चला जाये कि शारीरिक रूप से आप पूर्ण स्वस्थ हैं, तो इस बात की अधिक संभावना है कि आप निष्क्रियता की स्थिति से पूर्व बेचैनी अवश्य अनुभव करेंगे। बेचैनी उत्पन्न होने के समय ही यदि उचित युक्ति अपना ली जाये, तो ऐसे में आलस्य पर काबू पाना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है। एक अच्छे धावक के समान, जो अपनी शारीरिक क्षमता, व दर्द को सहन करने की सीमा को धीरे धीरे बढ़ाता है, एक उत्तम ध्यान योगी भी ध्यान की अवधि धीरे धीरे बढ़ाता है। अपने ध्यानाभ्यास की परम अवस्था में मैं एक सत्र में लगातार दस घंटे के लिए ध्यान में बैठा करता था। यह आसान बिलकुल नहीं था, किन्तु इसके परिणाम विस्मयकारी थे। मैंने प्रथम दिवस से ही दस घंटे के लिए बैठना आरंभ नहीं किया था। वास्तव में मैंने एक एक घंटे के अनेकों सत्रों से आरंभ किया व धीरे धीरे, कई वर्षों के अंतराल में, इसे बढ़ाता चला गया। बैठने की उचित मुद्रा इसमें पूर्णत: आवश्यक है जिसके विषय में मैं शारीरिक रूपान्तरण के अंतर्गत चर्चा करूंगा।

समाधान

जिस क्षण आपको अनुभव हो कि ध्यान की तीक्ष्णता घट रही है, तत्क्षण आप मानसिक रूप से प्रयासरत हो जाएँ। आप अपने एकाग्रता के अभ्यास को पुनः आरंभ करें। अपने को स्मरण कराएं कि आपको केन्द्रित रहना है। यदि आपकी सुस्ती किसी शारीरिक थकान का परिणाम है तो आप ध्यान का सत्र वहीं समाप्त कर दें। ऐसा उस स्थिति में हो सकता है जब आपके सत्र ९० मिनट से अधिक के हों। ऐसे समय आपको कुछ विश्राम लेना चाहिए, उठ कर कुछ ताजी हवा में गहरे श्वास लें, थोड़ा जल लें, इधर उधर टहल लें, व पुनः ध्यान-सत्र आरंभ करें। किन्तु, यदि आप मानसिक थकान के कारण सुस्ती अनुभव कर रहे हों, जो कि केवल २० मिनट के ध्यान के उपरांत भी हो सकता है, ऐसे में आप को उठना नहीं चाहिए, न ही अपने ध्यान सत्र को रोकना चाहिए। आपको उसी मुद्रा में स्थिर बैठे हुए, अपनी एकाग्रता एक तेज प्रकाश पुंज पर स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए, अथवा आप अपने ध्यान की वस्तु के किसी मनोहर पक्ष पर एकाग्र होने का प्रयास कर सकते हैं। आपको अपने स्थान से उठे बिना, उसी स्थिर मुद्रा में बैठे हुए मानसिक प्रयासों द्वारा स्वयं को ऊर्जान्वित व तरोताजा करना होगा। कुछ क्षण के लिए अपना ध्यान किसी अन्य वस्तु पर ले जाएँ किन्तु ऐसे विचारों में न उलझें जो आपके ध्यान से असंबंधित हो। जैसे ही स्फूर्ति का अनुभव होने लगे, शांत हो कर पुनः अपना प्रमुख ध्यान आरंभ कर दें। अब आपको अधिक यत्न नहीं करना चाहिए, चूंकि यदि आप ऐसा करते हैं तो आप पुनः बेचैन हो जाएँगे।

संतुलन परमावश्यक है। जब आप बेचैनी अनुभव करें तो थोड़ा विश्रांति की ओर बढ़ें, और जब आप सुस्ती अनुभव करें तो थोड़ा प्रयत्नशील हो जाएँ। ये दोनों ध्यान प्रक्रिया में बार बार व्यवधान उत्पन्न करेंगे। ये प्रायः एक के बाद दूसरा, इसी क्रम में अनुभव होते हैं। इन दोनों त्रुटियों को समझने व ठीक करने के लिए आपको सतर्क होना होगा। अल्पावधि के सुस्पष्ट, सुबोधगम्य सत्रों से आरंभ करते हुए धीरे धीरे समय बढ़ाएँ। आरंभ में, छोटी छोटी समयावधि के लिए त्रुटिरहित ध्यान का अभ्यास करें। जब आप सुस्ती पर अंकुश लगाने व बेचैनी को रोक पाने में समर्थ हो जाएँ, तब समझें कि आप ब्रहमाण्डीय -एकात्मता को अनुभव करने के समीप पहुँच रहे हैं। मैंने कभी नहीं कहा कि यह सुगम है। रस्सी पर चलने का उद्धरण स्मरण रखें।

शांति।
स्वामी