कभी कभी क्रोध में चिल्लाने से मन को राहत मिल सकती है, हमारे भीतर जो कुंठाएं घर कर लेती हैं उन्हें निकालने की यह सहज विधि है। परन्तु जब हम क्रोधित होकर चिल्लाते हैं इससे दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचती है तथा रिश्तों में दरारें आ जाती हैं। इसीलिए यह एक व्यवहारिक विकल्प नहीं है। इसके अतिरिक्त क्योंकि यह क्रोध की भावना से जुड़ा हुआ है, इसीलिए यह हमें निर्बल एवं लज्जित कर देता है। कल्पना कीजिए कि यदि आप बिना क्रोधित हुए चिल्ला सकते। यह संभवत: आपको अभी मूर्खतापूर्ण विधि लगे परन्तु इस लेख को पढने के बाद आपकी विचारधारा अवश्य बदल जाएगी।

शालीनता एवं शिष्टाचार के नाम पर, धर्म का पर्दा कर के, हमारे समाज ने सदैव स्वतंत्र अभिव्यक्ति का बहिष्कार किया है। जब तक हमारे कार्य हमारी जीवनशैली तथा हमारे विचार, समाज के ढाँचे के अनुसार हैं तब तक ही हम इस समाज का एक सम्माननीय अंश बन के रह सकते हैं। यदि हमने इस रूढ़िवादी समाज की नीतियों का विद्रोह किया, तो यह समाज हमें बहिष्कृत कर देता है। सुकरात को इसी कारण विष का प्याला पीना पड़ा, ईसा मसीह को क्रॉस पर चढ़ा दिया गया, तथा अरस्तु को सब कुछ छोड़ के भागना पड़ा। आम जीवन में भी यदि कोई कर्मचारी अपने प्रबंधक से या कोई खिलाड़ी रेफ़री से ऊँचे स्वर में बात करे तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है या मैदान से भगा दिया जाता है। यदि कोई अभिव्यक्ति सामाजिक दायरे के अंदर नहीं आती है तो समाज उसे नष्ट कर देता है।

शारीरिक गतिवधियां जैसे की खेल, ख़रीददारी, व्यायाम या सहवास, ये सब विधियाँ होती हैं, अपने अंदर दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालने की। आप किसी खेल के मैदान में, या किसी व्यायाम करने के स्थान पर चिल्ला सकते हैं। उसके तुरंत बाद आपको शांति की अनुभूति होती है। सब कुछ तरो ताज़ा लगता है। सभी बौधिक गतिविधियाँ एक मार्ग प्रदान करती हैं अपनी अंदरूनी भावनाओं को बाहर निकालने का। कईं व्यक्ति बड़ी बड़ी संस्थाओं एवं सरकारों को कितने ही विषयों के बारे में लिख डालते हैं। वो जानते हैं कि उनके पत्र कभी नहीं पढ़े जायेंगे परन्तु उन्हें ऐसा करने से अपनी भावनाओं को बाहर निकालने का एक मार्ग मिलता है। कितना अच्छा होता यदि आपके पास अपनी सारी नकारात्मक भावनाओं को बाहर निकालने की कोई विधि होती। आप में से कुछ लोगों के अंदर भावनाओं का एक तूफ़ान है जो अपने आप को व्यक्त करने का केवल एक मार्ग ढूंढ रहा है।

यदि हम बच्चों का उदाहरण लें तो हमें यह ज्ञात होगा कि वे आराम से चिल्ला एवं रो सकते हैं, जिनसे वो भावनाओं के बोझ से मुक्त होकर अगले ही पल फिर से खुश हो जाते हैं। समझने की बात यह है कि वे किसी पर चिल्ला नहीं रहे होते वे केवल चिल्ला रहे होते हैं। वे किसी भी सामाजिक दायरे में बंधे नहीं होते। उन्हें अपरिपक्व समझकर लोग उनकी बातों को भूल जाते हैं। जबकि एक वयस्क अपने मन की भावनाओं की उथल पुथल में ही फँस कर रह जाता है। वह केवल चिल्लाता नहीं, दूसरों पर चिल्लाता है। अब मैं इस विषय की जड़ पर आता हूँ। कोई ऐसी जगह ढूँढ़िए जहाँ जाकर आप बिना किसी डर के चिल्ला सकें, वो भी ऊँचे स्वर में। जहाँ आपको इस बात की चिंता न हो कि आपको कोई देख रहा होगा।

तब तक चिल्लाते रहिए जब तक आपके अंदर छुपी सारी चिंताओं एवं भावनाओं का उमड़ता तूफ़ान बाहर न निकल जाए। हो सकता है, आपके जीवन में कुछ पल ऐसे आयें हो, जब आपके साथ किसी ने गलत किया हो परन्तु आप उस समय रोने में अक्षम महसूस कर रहे थे या फिर आप ने किसी अपने को खो दिया हो परन्तु उस विषाद को आप ठीक से व्यक्त नहीं कर पाएँ हों। कुछ ऐसे पल जब आपको समाज के सामने दृढ़ बन कर रहना पड़ा हो जब आपका मन अंदर से घबरा रहा था, या आपके सपने जो आपने अपने परिवार के लिए त्याग दिए। काफी सारी भावनाएं हैं जिनके बोझ तले हम दबे हुए हैं, इन्हें बाहर निकालने की आवश्यकता है। तब तक चिल्लाते रहिये जब तक यह भावनाएं आँसू बनकर आपकी आँखों से न निकलें।

इसे महसूस की जिये, अपने अंदर झांकिए, आपके अंदर कितना भार है। इसमें बहुत सी भावनाओं को तो आप अपने अंदर नहीं रखना चाहते हैं परन्तु आपको इस बात का ज्ञात नहीं है कि इसे अपने अंदर से कैसे निकालें। लोग ध्यान करते हैं, क्रीड़ा करते हैं, व्यायाम करते हैं, अपने आप को इस भार से हल्का करने का प्रयत्न करते हैं। जब एक बच्चा सोता है तब उसका चेहरा एकदम शांत स्वभाव का होता है, क्योंकि वह स्वयं को इस बोझ से वंचित करने में सक्षम है। आप को भी अपने आप को इस बोझ से मुक्त करने की आवश्यकता है। यदि आपके अंदर सकारात्मक भावनाएं हैं तो उन्हे और बढ़ाने का रास्ता ढूंढें। कुंठाओं एवं नकारात्मक भावनाओं को बाहर निकालिए ताकी आप अपने आप को हल्का महसूस कर सकें।

यदि मेरे पास बीस लोगों का समूह होता तो हम तीन दिनों के लिए कहीं दूर चले जाते। मैं आपको अपने अंदर छुपी हुई कुंठाओं को दूर भगाने तथा अपने आप को इस बोझ से मुक्त करने के उपाय सिखाता। ध्यान करने का अर्थ किसी मृत वस्तु के समान बैठना नहीं होता, ध्यान करने का वास्तविक अर्थ है जीवन से परिपूर्ण होना। परन्तु यह सारी बातें मैं आपको किसी और दिन समझाऊंगा।

आप पवित्र हैं, अपनी जयजयकार कीजिये। जो वस्तुएँ आपको अपवित्र बनाती हैं, उनका त्याग कीजिए। इन्हें अपने अंदर भर कर मत रखिए, अपने आप को इनसे मुक्त करिए।

शांति।
स्वामी