बहुत से लोगों द्वारा बहुधा एक बात मुझसे पूछी जाती है कि – वर्तमान क्षण में कैसे रहा जाये? जिज्ञासु मुझे बताते हैं कि वे अपना ध्यान नकारात्मक विचारों व भावनाओं से परे हटाना चाहते हैं, किन्तु वे सदा ऐसा कर नहीं पाते। और तो और, बहुधा ऐसी नकारात्मकता अथवा भटकन उन पर हावी होकर उनके शांत अन्तःकरण में उथल पुथल मचा देती है। गत लेख में मैंने यह बात की थी कि किस प्रकार अपने को नापसंद वस्तु का चिंतन आपके जीवन में उस नापसंद वस्तु को आकर्षित कर लेता है। प्रकृति इसी प्रकार से कार्य करती है।

इस तथ्य को विस्तार पूर्वक समझते हैं। आपका बाह्य संसार आपके अन्तःकरण की स्थिति से अत्यधिक प्रभावित रहता है। आपके विचार, आकांशायें व भावनाएँ (वास्तविक रूप से सभी विचार) – ये सब आपके अन्तःकरण को निर्मित करने वाले प्रमुख घटक हैं। आपका विचार किसी वस्तु से परे हटने का है या उसे पाने का – बस वही विचार आपके अन्तःकरण का मूल-निर्माता बन जाता है। जब आप अपने विचार उन्हीं वस्तुओं पर बनाए रखते हैं जिन्हें आप दूर हटाना चाहते हों तो आप स्वयं अनुमान लगाएँ की आपका अन्तःकरण कैसा बनने वाला है। नकारात्मक भावनाओं, विचारों व भटकन से कैसे बचा जाये, इसके उपाय इस प्रकार हैं –

एक युद्ध के बारे में सोचें। प्रायः शक्तिशाली पक्ष ही विजयी होता है। जो पक्ष अधिक बलवान व बुद्धिमान होगा वही दूसरे को पराजित करेगा। निर्बल एवं बलवान के मध्य निर्बल बलवान द्वारा दमित हो जाता है। बस इसी तथ्य को समझना है। जब आपके नकारात्मक विचार अथवा भावनाएं आपकी सकारात्मकता से अधिक बलवान होते हैं तो वे आपके ऊपर विजय पा लेते हैं। जब तक आप अपने मन की सहज अवस्था को नहीं खोज पाते, वह अवस्था जो नकारात्मक अथवा सकारात्मक से ऊपर उठ जाती है, तब तक आपको सकारात्मक भावनाओं को पकड़े रखना है।

उन विचारों व भावनाओं पर अपना ध्यान लगाएँ जो आपको ऊपर उठाती हों व ऐसी भावनाओं से अधिक शक्तिशाली हों जो आपको विषाद की ओर ले जाती हैं। परिस्थितियाँ भले ही कितनी भी कठिन व कष्टकारी हों, तो भी हर किसी के पास कृतज्ञ होने के लिए बहुत कुछ होता है। अपने जीवन में प्राप्त सभी वस्तुओं के लिए सदा ईश्वर का आभारी होने से आपको सकारात्मक व शक्तिशाली बनने में सहायता मिलेगी। आने वाले लेखों में जब हम भावनात्मक परिष्कार की बात करेंगे, तब मैं कृतज्ञता के अभ्यास को विस्तारपूर्वक बताऊंगा।

वर्तमान में आपका यह कार्य है कि अपने मन के लिए इतने सकारात्मक विचार एकत्र करें कि यह शांति व प्रसन्नता अनुभव कर पाये। जब कभी भी आप उदासी अनुभव करें तो नकारात्मकता के निवारण का प्रयास बिलकुल न करें। केवल अपना सम्पूर्ण ध्यान सकारात्मक विचारों पर केन्द्रित करने का प्रयास करें। परिणामस्वरूप, नकारात्मक विचार अति क्षीण हो जाएँगे।

हर प्रकार की नकारात्मक भावनाओं व भावों – जिसमें क्रोध, ईर्ष्या, व लोभ भी सम्मिलित हैं – का तात्पर्य है कि आप अपने अन्तर्मन में कहीं न कहीं घायल हैं। यह दर्शाता है कि घाव अभी भरे नहीं हैं व आपके दिल में अभी भी घाव के निशान विद्यमान हैं। यहाँ सब के लिए एक समान समाधान नहीं हो सकता। स्वयं आपको ही अपने घावों के लिए उपयुक्त साधन खोजना होगा। क्षमा करते चलें। पुराना छोड़ते चलें। प्रयास करें। यदि आप वह सब जो आपको पीड़ा देता है, उसे छोड़ने का प्रयास आरंभ करें तो घाव स्वतः भरने लगते हैं। यदि आप औरों को आपका सामान पहुंचाने का एक माध्यम मात्र मानें, जैसा कि मैं कहता हूँ – आपके कर्मों के फल का पार्सल लाने वाले – तो लोगों के प्रति आपका दृष्टिकोण परिवर्तित होने लगेगा। उच्च स्तरीय संतुष्टि के अनुभव हेतु, बाँटने का नियम अपना कर देखें व कामनाओं व पराश्रय पर पुनः विचार करें।

शांति।
स्वामी