क्या सब कुछ पूर्वनिर्धारित है या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा शक्ति है? अंततः यदि सब कुछ पूर्वनिर्धारित है तब हम अपने स्वप्नों को पूर्ण करने हेतु कोई प्रयास क्यों करें और यदि यह हमारे हाथों में है, तब हम जीवन में असहाय और अप्रत्याशित परिस्थितियों के माध्यम से क्यों जाते हैं?

मात्र कुछ दिनों पूर्व आश्रम के वार्षिकोत्सव के पर्यंत मैंने एक वक्ता द्वारा कही गयी सुंदर कथा सुनी जिसमें देवी माँ की महिमा का वर्णन किया गया था।

४५० से भी अधिक वर्ष पूर्व, भारत में मल्लुक दास नामक एक किसान था। बचपन से उसने अपने पिता और दादा को खेतों में कठिन परिश्रम करते देखा था, तो उसके अनुसार कठिन परिश्रम ही एकमात्र उपाय था जिसके द्वारा वह अपनी और परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता था। एक दिन भ्रमण करते हुए एक संत उसके गाँव में प्रवचन के लिये रुक गए और मल्लुक भी वहाँ जा पहुँचा।

“वह व्यक्ति जो ईश्वर की इच्छा के आगे पूर्ण समर्पण कर देता है,” संत ने भाषण दिया, “और अपने प्रत्येक कर्म को अपने हृदय में ईश्वर को धारण करके करता है उसे कभी भूखा सोना नहीं पड़ता। ईश्वर सदैव ऐसे व्यक्ति की देखभाल करते हैं।”

“आदरणीय महाराज,” मल्लुक दास ने बीच में कहा, “हो सकता है सबका भरण पोषण करने वाला ईश्वर ही हो किंतु मैं अभी भी अपना जीवन नियंत्रित करता हूँ और अपने कर्मों द्वारा जीविकोपार्जन करता हूँ।”
“यह संभव है। परंतु अंततः ईश्वर की इच्छा ही अभिभावी होती है”, संत ने कहा।
“मैं नहीं समझता कि यदि मैं कोई काम नहीं करूँ तब भी ईश्वर मुझे भर पेट भोजन प्रदान करेंगे।”
“उसकी कार्य शैली रहस्यमयी है” संत ने मुस्कुराते हुए कहा, “और, मैं तुम को बताता हूँ कि यदि वह तुम को भोजन खिलाना चाहता है तब तुम को भोजन अवश्य खिलाया जाएगा।”

मल्लुक ने इसका जोरदार विरोध किया और तर्क चलता रहा। वे अंत में एक शर्त पर सहमत हुए। यह निर्णय लिया गया कि यदि ईश्वर सत्य है तो अगले २४ घंटों में वह किसी न किसी प्रकार से मल्लुक को भोजन खिला ही देगा चाहे मल्लुक कुछ भी करे।

“क्या आप कह रहे हैं कि यदि मैं कहीं छिप जाऊँ और कुछ भी नहीं करूँ, तब भी वह मुझे भोजन खिला देगा?”
“हाँ।”
“ठीक है, यदि ईश्वर कल सूर्यास्त तक मुझे भोजन प्रदान करता है, तो मैं दृढ़ विश्वास रखूंगा और वह सभी कुछ स्वीकार करूंगा जो आप कहेंगे। परंतु यदि वह असफल रहा तो आप अपना चोला त्याग कर मेरे साथ खेतों में काम करेंगे।”
“ऐसा ही हो,” संत ने अपना दंड ऊपर उठाते हुए कहा, “वह यह सुनिश्चित करेगा कि तुम भोजन करो। मुझे पूर्ण विश्वास है।”
“मैं दूर किसी निर्जन स्थान पर चला जाऊँगा।”
“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कहाँ छुपते हो, मल्लुक। ईश्वर सर्वव्यापी है और वह तुम को भोजन खिलाकर ही रहेगा।”

मल्लुक दास बड़ी कठिनाई से नदी पार कर वन में पहुँचा और एक विशाल वृक्ष की ऊँची शाखा पर बैठ गया। वह सोचने लगा कि यहाँ कोई नहीं आएगा। कोई नहीं जानता कि मैं यहाँ हूँ। अब संत की हार सुनिश्चित है। अब मैं देखता हूँ कि ईश्वर मुझे कैसे कुछ खिलाता है। वह धैर्यपूर्वक वृक्ष पर बैठा प्रतीक्षा करता रहा। कुछ घंटों पश्चात देर दोपहर में, मल्लुक ने कुछ शोर सुना। थके हुए यात्रियों का एक समूह जो वन पार कर रहा था, उस विशाल वृक्ष को देखकर वहाँ रुक गया। उन्होंने छाया में आसन बिछाया और अपने सामान को नीचे रख दिया।

भोजन से भरे अपने थैले को एक शाखा से बाँधकर वे पहले हाथ-मुँह धोने के लिये नदी तट पर चले गए। मल्लुक भोजन का थैला देख कर हैरान रह गया। “यह ईश्वर का काम नहीं है, केवल संयोग है,” उसने स्वयं से कहा। “वे किसी भी क्षण वापस आएंगे और इसे ले लेंगे।” निश्चित ही वे यात्री वृक्ष की ओर आते दिखे, तभी एक सिंह के गर्जने से जंगल गूँज उठा। अपने जीवन के लिए प्रार्थना करते हुए वे नदी की ओर मुड़े और जंगल से बाहर भाग गए। मल्लुक उस भोजन के थैले के साथ अकेला रह गया। इस पर भी ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने के लिए वह सज नहीं था। उसने थैला खोलने या उससे कुछ भोजन ग्रहण करने को अस्वीकार कर दिया। उसने सोचा कि कोई भी मुझे तब तक खाने के लिए विवश नहीं कर सकता जब तक मैं स्वयं न चाहूँ।

उज्ज्वल सूर्य अब नारंगी हो गया। संध्या आ गयी और शीघ्र ही अंधेरा होने लगा। मल्लुक भूख से मर रहा था किंतु वह अविचल था। चिड़ियाँ अपने घोंसलों को लौट आईं, रात्रिचर जंतु घूमने लगे। तभी मल्लुक ने निकट आते हुए घोड़ों की पदचाप सुनी। वह डाकुओं का एक समूह था जो अपने छिपने के स्थान की ओर जा रहा था।

“सरदार देखो,” एक घुड़सवार ने थैले की ओर इशारा करते हुए कहा। “कदाचित यहाँ कोई अपना थैला भूल गया।” वह घोड़े पर सवार था और थैला उससे एक हाथ की दूरी पर था। भूमि पर पड़ी चटाई जिस पर कपड़ों की कुछ गठरियाँ पड़ी थीं, वे भी सरदार की दृष्टि में आईं। उन्होंने अनुमान लगाया कि या तो कुछ यात्रियों को किसी जंगली जानवर के कारण भागना पड़ा होगा या यहाँ कोई था जो उनकी आहट सुन कर भाग गया।

“हम थोड़ा भोजन कर सकते हैं।” चोरों ने पास के वृक्षों से अपने घोड़े बाँध दिये और थैला खोला।
“रुको,” सरदार ने चेतावनी दी। “यह हमें पकड़ने की चाल भी हो सकती है। यह भोजन विषैला हो सकता है। हमारे कल के डाके से राजा के सिपाही चौकन्ने होंगे। जिस प्रकार यह चटाई बिछी है और भोजन भी ताजा है उससे प्रतीत होता है कि आसपास कोई है।”

क्षेत्र परिमार्जन करने की इच्छा से उन्होंने अपनी मशालों को जलाया तो उसी वृक्ष पर बैठे मल्लुक दास को देखा। भालों की नोक पर मल्लुक को नीचे उतरने को विवश किया गया। जब मल्लुक ने यह स्वीकार नहीं किया कि वह भोजन उसका है या वह उन लोगों के विषय में कुछ नहीं जानता जो इसे छोड़ गये, तब सरदार आग बबूला हो गया।

“यह भोजन खाओ,” उसने आदेश दिया।
“मैं नहीं खा सकता। मैं नहीं खाऊँगा,” मल्लुक ने विरोध किया।
“इसकी अच्छे से पिटाई करो,” सरदार ने डाकुओं को आज्ञा दी, “और यदि यह भोजन न खाए तो इसे मार डालो।”

मल्लुक की इच्छा के विरुद्ध उसे भोजन खाने पर विवश किया गया। उसे फिर भी जीवित देखकर डाकू विश्वस्त हो गये कि भोजन में विष नहीं था। उन्होंने बाकी बचा भोजन खाया और मल्लुक को पीछे छोड़कर आगे चले गए।

मल्लुक के हृदय से प्रार्थना, विश्वास और कृतज्ञता उमड़ पड़ी और वह बोल उठा –

हरि समान दाता कोउ नाहीं। सदा बिराजैं संतनमाहीं ॥१॥
नाम बिसंभर बिस्व जिआवैं। साँझ बिहान रिजिक पहुँचावैं ॥२॥

ईश्वर के समान दाता कोई नहीं है। वह एक उत्तम हृदय में रहता है। उसी सर्वव्यापी सर्वज्ञ ईश्वर की छाया में सम्पूर्ण सृष्टि चल रही है। वह यह सुनिश्चित करता है कि हर किसी का पेट भरा हो।

मैं जानता हूँ कि कुछ लोग विवाद करेंगे कि यदि ईश्वर देखभाल कर रहा है तब संसार के कईं भागों में बच्चे भूख से क्यों मर रहे हैं? सत्य तो यह है कि मैंने इस कहानी को ईश्वर का महिमागान करने या उसके अस्तित्व की सत्ता को बताने के लिये नहीं किया (जिसकी मात्र अनुभूति की जा सकती है और इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता)। न ही मैं अलौकिक हाथों के साथ भाग्य का आकलन कर रहा हूँ। इसकी अपेक्षा, मैंने यह कहानी किसी अन्य कारण से साझा की है। वह है नियति और स्वेच्छा पर प्रकाश डालना।

मेरे विचार में, नियति और स्वेच्छा का प्रश्न एक दार्शनिक समस्या है और इसका हमारे वास्तविक जीवन से कुछ लेना देना नहीं है। इस प्रश्न को आरंभ करने का कोई अर्थ नहीं है। मात्र कुछ शब्दों को पिरोकर उसके अंत में एक प्रश्न चिन्ह लगा दें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमने एक वैध प्रश्न किया है। क्योंकि हम नियति या स्वेच्छा को न तो सिद्ध कर सकते हैं न ही नकार सकते हैं। जब आप किसी एक को पूर्ण सत्य के रूप में मान लेते हैं, तब आपको उसी के विरुद्ध असंख्य साक्ष्य मिलेंगे।

नियति के साथ हम यह मानकर चल रहे हैं कि जो कुछ भी होना है वह होकर ही रहेगा। और स्वेच्छा की अवधारणा यह बताती है कि जीवन हमारे विवेक से चलता है, कि हम कर्म, भाग्य से अप्रभावित होकर अपना स्वतंत्र चुनाव करते हैं। परंतु सत्य कहीं बीच में है।

किसी भी अवस्था में, मैं जीवन को दूसरे दृष्टिकोण से देखना पसंद करता हूँ। मेरे संसार में, मेरे दृष्टिकोण से यह विषय नहीं है कि क्या पूर्वनिर्धारित और क्या नहीं। हम उचित रूप से इसका निर्धारण नहीं कर सकते हैं। यह इस विषय से अधिक संबंधित है कि क्या कुछ हमारे नियंत्रण में है और क्या नहीं। चाहे अच्छा हो या बुरा, जब हम कोई कार्य करते हैं, हम नहीं जानते कि उससे क्या हो सकता है। हमें हमारे इतिहास में बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। मात्र पिछले २०० वर्षों के महान वैज्ञानिक आविष्कारों का ही परीक्षण करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन महान वैज्ञानिकों और अन्वेषकों ने कईं महत्वपूर्ण वस्तुओं को श्रमसाध्य रूप से खोजा है, परंतु यह सत्य अवश्य है कि जब वे किसी वस्तु की खोज में पूर्णतया लीन थे तब उनका सामना एक नितांत भिन्न विषय से हुआ, बिल्कुल अप्रत्याशित परिणाम। और यही मुख्य शब्द है – संभावना।

हमारे जीवन में होने वाली कुछ घटनाएं हमारी योजना, कौशल और कड़ी मेहनत के कारण होती हैं, जबकि कई अन्य शुद्ध संभावना के कारण होती हैं। आपका संबंध नितांत प्रेमपूर्ण हो सकता है फिर भी आपका साथी किसी और के प्रति आकर्षित हो सकता है। फिर भी एक रूपरेखा के बाहर संभावना भी कार्य नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए, आप टिकट के बिना ही सीधे लॉटरी नहीं जीत सकते हैं। संभावना एक प्रकार की समझ है कि यहाँ बहुत सी वस्तुएं हैं जो हमारे नियंत्रण से परे हैं। हम मात्र प्रयत्न कर सकते हैं और अपने प्रयास से संभावनाओं को बेहतर बना सकते हैं। हमें केवल प्रयास करना है।

जिस क्षण हम प्रयास को अपनी सफलता का आधार बनाना शुरू कर देते हैं और परिणाम को नहीं, हम स्वाभाविक रूप से शांति का अनुभव करेंगे। परंतु हमारा संसार परिणाम, उपलब्धियों और कार्यसिद्धि द्वारा संचालित होता है। उदाहरण के लिए, चाहे आप मानें या न मानें, आपको किसी परीक्षा विषय में कितने अंक मिले हैं वह कभी भी पूर्णतया इस बात पर निर्धारित नहीं हो सकता है कि आपने कितने अच्छे उत्तर लिखे हैं। परीक्षक ने पहले ही कितने पेपर पढ़े हैं, उसकी मनः स्थिति कैसी है, आपकी लिखावट कितनी अच्छी है और कईं अन्य कारण आपको मिले अंक का निर्धारण करते हैं। संभावना, नियति, भाग्य और कर्म? आप जितना कर सकते हैं, उतना ही मिलने वाले अंकों की संभावनाओं में सुधार होगा।

एक कार्य के परिणाम के विषय में चिंतित होने की अपेक्षा, या भाग्य या किसी और वस्तु पर असफलताओं को दोष देने या अपने जीवन में हर वस्तु को नियंत्रित करने के लिए निरर्थक प्रयास करने की अपेक्षा, आपके लिए सबसे अच्छा और लाभदायक है कि पूर्ण क्षमता से प्रयास करें। यदि आप दर्पण में स्वयं को देखकर अपने हृदय पर हाथ रखकर स्वयं से यह कह सकें, “मैं जो भी उत्तम कर सकता था वह मैंने किया” तो यही पर्याप्त है। यदि हो सके तो, अगली बार और बेहतर करें।

एक महिला अपने पति के लिए एक नई गाड़ी खरीदती है और नया ड्राइवर रखती है। पहले दिन के अंत में वह व्यक्ति अपनी पत्नी से शिकायत करता है, “इस ड्राइवर को निकाल बाहर करो। उसने मुझे एक ही दिन में लगभग तीन बार मार ही दिया था।”
“इतने आतुर न हो प्रिये,” पत्नी शांति से उत्तर दिया। “उसे एक मौका और दो।”

यदि जीवन का आकलन स्वेच्छा या नियति के आधार पर किया जाए तो सारांश यह है कि आप जो नियंत्रित करते हैं वह स्वेच्छा है और आप जिसे नियंत्रित नहीं कर सकते वह नियति है। हमारे जीवन में ये दोनों ही पहलू हैं। किसी ने भी मल्लुकदास को शर्त लगाकर जंगल में भाग जाने को नहीं कहा था। यदि वह ऐसा कृत्य नहीं करता तो अगली कईं घटनाएं होने से रोकी जा सकती थीं। पुनः देखा जाए तो यदि वह घर पर ही रुका होता तब कुछ और ही घटता। किसी भी प्रकार से इसकी भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो भी हम करते हैं उस कार्य में हम अपना योगदान १०० प्रतिशत दें। जब नियति की बात आती है तो मैं आपको एक बात बता सकता हूँ कि यदि आपमें कुछ ऐसा है जो आप संसार को दे सकें, कोई प्रतिभा, कौशल, उपहार आदि तब प्रकृति आपसे वह कार्य करा ही लेगी। हम में से प्रत्येक में स्वाभाविक रूप से अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त करने की जन्म से प्रेरणा होती है।

चाहे कुछ प्राप्त हो या न हो, हम तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक हम प्रयास न करें। हमें प्रयास तो करना ही चाहिये। यही वह सब है जो हम कर सकते हैं और यही हमारी प्रजाति की उल्लेखनीय प्रगति का आधार है।

इस परिकल्पना के साथ प्रारंभ करें कि आप अपना जीवन रूपांतरित कर सकते हैं आप स्वयं पर विजय पा सकते हैं और अपना भविष्य लिख सकते हैं। यदि आपने किसी कार्य को करने का संकल्प ले लिया तब उसे पूर्ण करने के लिये अपना सर्वस्व दें। चाहे परिणाम कुछ भी हो यात्रा का हर एक क्षण ही स्वयं में लाभप्रद है। किसी और प्रकार से क्यों जिएं?

शांति।
स्वामी