यह मई १९८६ का समय था। मैं ६ १/२ वर्ष का था व अभी अभी अपने विद्यालय की द्वितीय कक्षा में उन्नीत हुआ था। सब कुछ बहुत रसहीन था। मेरी कक्षा के सभी पीरियड एक ही अध्यापिका लेती थीं। प्रतिदिन घर जा कर मुझे वह सब जो कक्षा में हर विषय में पढ़ाया जाता, वह पुनः लिखना होता था। यही हमारा गृहकार्य होता था। हर दिन, प्रतिदिन। उदाहरण स्वरूप, यदि मैंने कक्षा में गणित के ५ प्रश्न व अंग्रेजी में ५ वाक्य किए हैं तो मुझे घर जाकर वैसे का वैसा पुनः करना होता था।

कुछ सप्ताह तक तो मैंने ऐसा ही किया किंतु शीघ्र ही मेरा उत्साह क्षीण हो गया। अपने को अध्यापिका से अधिक चतुर समझते हुए मैंने सोचा कि उनके आदेश का पालन करने का कोई लाभ नहीं क्योंकि जो काम मैं कक्षा में करता था और जो घर आकर करता, उसमें मात्र “कक्षाकार्य” व “गृहकार्य” इन दो शब्दों का ही तो अंतर था। यदि मैं अपनी कॉपी के बाएँ कोने में लिखे “कक्षाकार्य” शब्द को “गृहकार्य” में परिवर्तित कर दूँ तो वही मेरा गृहकार्य हो जाएगा।

इस दुर्बोध अनुभूति के पश्चात मैंने जान लिया कि मुझे घर आ कर पढ़ना नहीं पढ़ेगा। जैसे ही मैं घर पहुँचता, मैं अपनी कॉपी खोलता, ‘कक्षा’ मिटा कर ‘गृह’ लिख देता, और गृहकार्य सम्पन्न। जब कभी मेरे माता-पिता पूछते कि मैंने अपना गृहकार्य समाप्त किया या नहीं, तो मैं पूर्ण विश्वास से अपने सिर हाँ में हिलाते हुए अपनी कॉपी की और इशारा करता। सम्पूर्ण एक माह तक यह युक्ति अति सफल सिद्ध हुई। और तब, वही हुआ जो अवश्यंभावी था।

“सब अपनी कॉपी आंकलन के लिए जमा करें”, अध्यापिका ने कक्षा को सूचित किया।
मैंने ध्यान न देने का प्रयास किया किंतु वह एक छोटी सी कक्षा थी। मैंने कहा कि मैं कॉपी घर में भूल आया हूँ व अगले दिन अवश्य ले आऊँगा। मुझे आशा थी कि वह भूल जाएंगी, किंतु ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने पुनः मेरी कॉपी मांगी और मुझे देनी पड़ी।

“यह क्या है?” कॉपी के पन्ने खोलते हुए वह बोलीं, “यह तो गृहकार्य” की कॉपी है। तुम्हारी कक्षाकार्य की कॉपी कहाँ है?”
उन्हें लगा कि शायद मैंने कक्षाकार्य व गृहकार्य की दो अलग कॉपी बना रखी हैं।
“मैं वह घर पर ही भूल आया”, मैंने झूठ बोल दिया। “कल मैं वह ले आऊँगा।”
ऐसा कह कुछ चिंतामुक्त, कुछ डरा सा मैं अपनी जगह पर बैठ गया। अगला दिन आया – न मैं बीमार था, न ही तेज़ बिनरुके वर्षा थी, किसी प्रसिद्ध नेता की हत्या भी नहीं हुई थी, मेरे पेट में कोई दर्द न था, मेरा सिर भी ठीक था, तब मेरे पास विद्यालय न जाने का कारण ही क्या था! मैं जाना तो नहीं चाहता था किंतु मुझे जाना पड़ा।

“तुम्हारी कॉपी कहाँ है?” मेरे कक्षा में आते ही अध्यापिका ने पूछा, मानो वह मेरी कॉपी न होकर उनके बोनस का चेक थे जिसके लिए वे इतनी आतुर थीं।

मैंने इधर-उधर देखा, अपने बैग में कॉपी ढूँढने का नाटक भी किया, किंतु अध्यापिका को समझ आ रहा था।

“यहाँ आओ”, उन्होंने आदेश दिया।
मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था। मैं अपना सिर झुकाये, धीरे धीरे चलता हुआ उनके समीप पहुँचा और नीचे ही देखता रहा। मैंने देखा नीचे फर्श पर धूल के कुछ कण थे व फर्श की दरार में चाक का एक छोटा से टुकड़ा फंसा हुआ था।

“तुम्हारी कॉपी कहाँ है?”, वह चिल्लाईं। स्पष्टरूप से वह मुझसे खिन्न व परेशान थीं।
“वह मेरे पास नहीं है।”
“क्या मतलब मेरे पास नहीं है?”

मैंने उन्हें बताया कि कैसे मैं पिछले एक माह से ‘कक्षा’ मिटा कर ‘गृह’ लिखता आ रहा था। मैं उनसे क्षमा प्रार्थना करने ही वाला था कि धाड़!! उन्होंने मेरे गाल पर एक चांटा जड़ दिया।

मैं सन्न रह गया, मेरे चारों ओर सब कुछ अदृश्य सा हो गया।

वह अति शक्तिशाली चोट थी, एक गूंज भरा थप्पड़ जो इतना अप्रत्याशित था कि मेरे संभल पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। मेरा बायाँ गाल दर्द के दंश से जलने लगा। मुझे कभी भी चाँटा नहीं पड़ा था और मुझे इस बात का किंचित भी अनुमान नहीं था कि उससे इतना अधिक दुखता है। कक्षा में एकदम सन्नाटा छा गया। मैं सिर नीचे किए ही वहाँ खड़ा रहा और लज्जा का भाव मेरे उदास से चेहरे पर पुत गया। मुझे लगा मैं एक अवज्ञाकारी लड़का हूँ।

चाहे बच्चा जितना भी सबल अथवा विद्रोहात्मक प्रतीत क्यों न हो, वास्तव में शारीरिक आघात बच्चे के आत्म विश्वास का पूर्ण रूप से नाश कर देता है।

अध्यापिका ने मेरी डायरी में एक लंबा नोट लिखा कि कैसे मैं न केवल अनुत्तरदायी व असत्यभाषी था, बल्कि मैंने बेईमानी भी की और कभी अपना गृहकार्य नहीं किया। (स्पष्टरूप से ‘कक्षा’ को ‘गृह’ बदल देना गृहकार्य हो जाना नहीं कहलाता)। मुझे इस नोट पर अपने पिताजी के हस्ताक्षर करवाने का आदेश मिला।

वह दिन बहुत देर से समाप्त हुआ, मैं घर पहुँचा और अपनी माताजी से विनती की कि पिता जी के स्थान पर वे उस नोट पर हस्ताक्षर कर दें। ऐसा करने से स्थिति कुछ सरल हो जाएगी, मैंने उनसे कहा। किन्तु उन्होंने विनम्र भाव से मना करते हुए कहा कि जब बात मेरी शिक्षा की हो तो वे मेरे पिताजी से कुछ छुपाना नहीं चाहेंगी। कुछ और बात होती तो शायद वह सोचतीं, परंतु यह नहीं।
“तुम केवल सारी बात उन्हें सच्चाई से बता देना”, उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा।

एक दब्बू से बछड़े की भांति मैं अपने पिताजी के सम्मुख गया और विद्यालय में जो कुछ हुआ सब उन्हें बता दिया। मैंने उन्हें कहा कि मैं अपना गृहकार्य नहीं कर रहा था जिसके लिए मुझे खेद है। मैंने उन्हें हस्ताक्षर हेतु वह नोट दिखाया।

“क्या तुम वास्तव में लज्जित हो?” उन्होंने पूछा, “कहीं तुम हमारी इस बातचीत से बचने के लिए तो ऐसा नहीं कह रहे न?”
“मैं वास्तव में लज्जित हूँ,” मैं बुदबुदाया।
“क्या तुम वचन देते हो कि पुनः ऐसा नहीं करोगे?” उन्होंने मुझे कुछ प्रेम से देखा, अपने समीप किया और मेरे सिर पर हाथ फेरा।
“जी, पापा”
“इस बार मैं हस्ताक्षर कर देता हूँ”, उन्होंने मुझे प्यार भरी झिड़की दी, “किंतु दुबारा कभी भी बेईमानी नहीं करना। यदि तुम्हारा मन कभी गृहकार्य करने का न हो तो कोई बात नहीं। तुम बस मुझे बता दो। असत्य और बेईमानी कोई विकल्प नहीं होता।”
मैंने सिर हिलाया। उन्होंने मुझे कोई लंबा भाषण नहीं सुनाया, मुझे सदाचार का पाठ भी नहीं पढ़ाया। बस इतनी ही बात हुई।

“यदि आपके सामने कोई समस्या आए तो कृपया मुझे बुलाएँ”, मेरे पिताजी ने अध्यापिका को लिखा, “किंतु आप कभी भी मेरे बच्चे पर फिर से हाथ नहीं उठाएंगी। आप उसे मारेंगी नहीं। कभी भी नहीं।”

अगले दिन मैं सिर उठा कर विद्यालय पहुँचा। मेरी अध्यापिका उस उत्तर को पढ़ कर सकपका गईं, मुझसे कुछ नहीं कहा, और मुझे अपने स्थान पर जाकर बैठने को कहा। उस दिन मेरे पिताजी द्वारा बोले शब्द न केवल विश्रांति व आश्रयदायक थे अपितु वास्तव में वे शब्द मेरे जीवन में सत्य एवं निर्भयता लाने के बीज स्वरूप थे। मुझे यह ज्ञात हुआ कि मैं अपने विचार व त्रुटियाँ उनके साथ साझा कर सकता हूँ। यह समझ आना कि वे दंडित करने के स्थान पर, मेरे द्वारा कुछ गलत समझने पर या कोई भूल हो जाने पर मुझे समझने का प्रयास करेंगे, मेरा मनोबल बढ़ाने की दिशा में यह एक मजबूत स्तम्भ बन गया।

जब हम जन्मते हैं तो बहुधा माता-पिता ही हमारे आदर्श होते हैं। निःसंदेह माता-पिता की भूमिका निभाना संभवतः संसार का सबसे कठिन कार्य है (एक पति अथवा पत्नी की भूमिका से भी कहीं अधिक कठिन)। तथ्य यही है कि माता-पिता का दूसरों के प्रति, अपने बच्चों के प्रति (व एक दूसरे के प्रति) व्यवहार ही वह अकेला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मौलिक तत्व है जो उनके बच्चों की मूल नैतिकता को प्रभावित करता है। बच्चे सदा ध्यान से देखते हैं।

यहाँ मैं ऐसा सुझाव नहीं दे रहा कि माता-पिता को अपने बच्चों को सदा छुईमुई की तरह रखना चाहिए (यह भी उनके पालन पोषण में उतनी ही बड़ी रुकावट बन सकता है)। जब आवश्यकता हो तब आपको दृढ़ भी होना होगा। बात केवल यह है कि ऐसा परिवार जहां सत्य को प्राथमिकता दी जाती है; जहां आपस में खुले मन से बातचीत होती है; जहां बच्चों को हर उस कार्य के लिए भाषण नहीं दिया जाता जो माता-पिता की अपेक्षानुसार नहीं होता; ऐसे परिवार में अधिक प्रेम व सौहार्द होना स्वाभाविक है। ऐसे परिवारों में पले-बढ़े बच्चे एक आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्ति के रूप में बढ़े होंगे। ऐसे बच्चे ही करुणाशील युवा व महान मार्ग-दर्शक बनते हैं।

एक विद्यार्थी ने बहुत परिश्रम से पूरी रात जागकर प्राणी-विज्ञान की परीक्षा की तैयारी की। प्रातः परीक्षा के लिए पहुँचने पर वह देखता है कि अध्यापक ने परीक्षा लेने का एक नया अप्रत्याशित ढांचा तैयार किया हुआ था। वहाँ पक्षियों के बहुत से पिंजरे रखे थे। उन्हें इस प्रकार से ढका गया था कि आप केवल उनके पैर ही देख पाएँ। यह हर छात्र की अलग अलग होने वाली मौखिक परीक्षा थी।

“आप को पक्षी के पैर जांच कर उसका नाम बताना होगा।” अध्यापक ने सूचित किया।

वह छात्र तो व्यथित हो गया क्योंकि उसने ऐसी स्थिति की अपेक्षा ही न की थी। वह परीक्षा में बुरी तरह फेल हो गया और बाहर जाने के लिए द्वार की ओर लपका।

“ठहरो,” अध्यापक ने पुकारा, “तुम्हारा नाम क्या है? मुझे अंकित करना है।”
“आप बताइये श्रीमान!” छात्र पीछे घूमा, अपनी पैंट ऊँची कर पैर दिखाते हुए चिल्लाया। “मेरे पैरों को देखो और मेरे नाम का अनुमान लगा लो!”

मुझे नहीं लगता कि पढ़ने में कम रुचि का पूरा दोष हम अपने बच्चों पर थोप सकते हैं, चूंकि हमारी वर्तमान शिक्षा-प्रणाली ही त्रुटिपूर्ण है। इसका ढांचा एक औद्योगिक समाज के लिए तैयार किया गया है न कि रचनात्मक के लिए। यह आपको एक औसत विचारक बनाने कि दिशा में कार्यरत है ताकि आप औसत समाज के लिए उपयोगी हों। यह समरूपता को बढ़ावा देता है न कि अन्वेषण को। आपकी खोज, आविष्कार और प्रतिभा इस दुनिया के मानकों के अनुसार ही होनी चाहिए। अपने विद्यालय में मैंने जो कुछ भी पढ़ा था उसमें से ८०% से अधिक का मैंने अपने वास्तविक जीवन में कभी भी उपयोग नहीं किया। यह समय एवं कर्म-शक्ति की अत्यधिक अपव्ययता है। इसीलिए इस तथ्य में कोई आश्चर्य नहीं कि हम पहले की अपेक्षा कहीं अधिक विचलित व उद्विग्न रहते हैं चूंकि हम वह सब पढ़ रहे हैं जो हमारे लिए रुचिकर नहीं, वह जीविका अपनाए हुए हैं जो हम नहीं चाहते, ऐसा जीवन जी रहे है जिसे हम संभवतः घृणा ही करते हैं।

इसमें से अधिकांश को टाला जा सकता है यदि बच्चों को उपयुक्त समय पर पीठ पर एक थपकी मिल जाये, अध्यापक से प्रोत्साहन के कुछ शब्द, अपने माता पिता से समविचार का दृष्टिकोण, कुछ करुणा और कण मात्र समानुभूति प्राप्त हो जाये। केवल इतना ही चाहिए एक औसत मस्तिष्क को विलक्षण विचारक में रूपांतरित करने हेतु। भाई-बहन, साथी-मित्र, धर्म – इनसे अधिक जो दो भिन्न व्यक्ति किसी बच्चे के जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव डालते हैं वे हैं माता-पिता एवं अध्यापकगण। इतना कि कभी कभी उनकी भूमिकाएँ परस्पर बदली जा सकती हैं।

कभी कभी माता-पिता की भूमिका निभाते समय परिस्थितियां अत्यंत जटिल हो सकती हैं और आप बच्चों पर हाथ भी उठा सकते हैं, इत्यादि। मैं नहीं चाहता कि यदि ऐसा हो जाये तो आप ग्लानि में डूब जाएँ। यदि बच्चे गलतियाँ कर सकते हैं तो कभी माता-पिता से भी कोई गलती हो सकती है। बस अपना दिल बढ़ा करें, अपनी भूल स्वीकार करें व पुनः पूर्व की ही भांति स्नेहमयी बन जाएँ।

चिल्लाने से अथवा डांट-डपट कर आप अपनी बात सिद्ध नहीं कर सकते। अंततः वह प्रेम ही है जो किसी को परिवर्तित कर सकता है। आप दृढ़ रहते हुए भी प्रेम प्रदर्शित कर सकते हैं। यदि आप प्रेम बाँटने के ही इच्छुक हैं व धैर्यशील हैं, तो वे लौट आएंगे। ऐसी होती है प्रेम की क्षमता और मेरी दृष्टि में एक अच्छे पालन-पोषण व देखभाल का सत्त्व भी यही है। कोई भी अन्य व्यक्ति एक स्नेहमय माता-पिता का स्थान नहीं ले सकता।

कृपया सब सहज में लें। भले भूल कैसी भी हो, वह दुनिया का अंत तो नहीं। यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे सत्यवादी एवं निर्भीक बनें, तो उसके अनुकूल वातावरण बनाएँ।

शालीन रहें, स्नेहमयी बने रहें। चूंकि वह जो प्रेम के फलस्वरूप जन्म है उसे केवल प्रेम के द्वारा ही रूपांतरित किया जा सकता है।

एक अन्य विषय पर मैं आप को एक सुखद समाचार देना चाहूँगा। मैं अपनी प्रथम उपन्यास “थी लास्ट गैम्बिट ” (अंतिम चाल) प्रकाशित करने जा रहा हूँ। हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित यह कहानी एक बालक एवं उसके शतरंज के शिक्षक की है। मैं आशा करता हूँ कि आप को यह पुस्तक पसंद आएगी। यह किताबचा व किंडल दोनों ही रूप में उपलब्ध है और आप इन्हें यहाँ प्राप्त कर सकते हैं –

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स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Seed of Fearlessness