कुछ दिन पूर्व एक नियमित पाठक द्वारा निम्न प्रश्न पूछा गया। यह एक लंबा कथन है व उत्तम प्रश्न पूछा गया है –

“यदि यह विश्वास क़ी राम अथवा कृष्ण अथवा क्राइस्ट अथवा अन्य किसी रूप में ईश्वर इस धरती पर अवतरित हुए थे, यह आपको शांति की अंतः यात्रा में सहायक होता हो; यदि यह विश्वास सत्य व करूणा के मार्ग में आगे बढ़ने में आपको सहायक होता हो; यदि यह विश्वास आपको एक बेहतर व्यक्ति बनाता हो व आपको इस दुनिया को और बेहतर बनाने की ओर प्रेरित करता हो, तो अवश्य ही आपको यह विश्वास बनाए रखना चाहिए…”
प्रभु, उपरोक्त आपका कथन है। मेरा इस विषय में एक प्रश्न है। मेरे मतानुसार सत्य एक ही हो सकता है, कुछ भी उचित होगा या अनुचित, सूखा होगा या गीला, यह सत्य है। जब आप यह कहते हैं कि अपने अंतःकरण की शांति हेतु हमें उसी रूप को मानना चाहिए जिसमें हमारा मन लगे, यह भिन्न लोगों के लिए भिन्न क्यों होना चाहिए? हम यह केवल अपने मन को शांत करने के लिए करते हैं। किंतु यदि कोई सत्य है तो वह एक ही रूप में होना चाहिए, अनेक रूपों में नहीं।

प्रभु, मेरी धारणा यह है कि भिन्न भिन्न लोग ईश्वर के भिन्न भिन्न रूपों को मानते हैं चूँकि उन्हें ऐसा बताया गया है अथवा जो उनके माता पिता उन्हें सिखाते हैं वह आदत बन जाती है, फिर विश्वास बन जाता है। किंतु जिसका अनुभव नहीं किया उसे मानना सही नहीं, जो अनुभव आपने किया है। मेरा मत है कि सत्य एक ही हो सकता है और हर किसी को उसे मानना व उसका अनुगमन करना चाहिए। और अलग अलग लोगों की अलग अलग धारणाएँ एक ही में सिमट जानी चाहिए और वही सच होना चाहिए। मैं चाहूँगा कि आप इस पर प्रकाश डालें व इसे समझने में मार्ग-दर्शन दें। मैं नही चाहता की सब यह सोचें की रूप भिन्न हैं चूँकि मेरी यह सोच है कि मैं सत्य को जानना चाहता हूँ व देख कर मानना चाहता हूँ और तब एक रूप, एक मुख अथवा एक प्रतिरूप रखना सत्य होगा।

मैं जानता हूँ मैं बहुत अधिक माँग रहा हूँ और यहाँ कोई छोटा-मार्ग नहीं है, अतः मैं इस पर कार्य कर रहा हूँ। कृपया हमारा मार्ग-दर्शन करें।

आपके प्रश्न का सही रूप से उत्तर देने के लिए मैं इसको विभाजित कर रहा हूँ। मेरी समझ के अनुसार, आप पूछ रहे हैं कि –

परम-सत्य क्या है? परम-स्वरूप; केवल एक सत्य?

रूप एक स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं है। यह दृष्टि व चेतन भाव का मिश्रण है। यदि कोई नेत्रहीन है तो वह कोई भी रूप नहीं देख सकता। और यदि कोई अचेतन अवस्था में है, तब भी वह किसी भी रूप की परिकल्पना नहीं कर सकता। आप सोचें कि आठ व्यक्तियों का समूह एक गुलाब का फूल देख रहा है। सभी आठ व्यक्ति भिन्न भिन्न धर्म, संस्कृति व भिन्न पृष्ठभूमि से हैं। आप प्रत्येक व्यक्ति से यह जानने का प्रयत्न करें कि उनके लिए गुलाब की क्या उपयोगिता है और गुलाब देख कर उनके मन में क्या क्या भाव आ रहे हैं। मैं नहीं जानता कि वे क्या उत्तर देंगे किंतु यह तय है कि हमें प्रत्येक व्यक्ति से एक भिन्न उत्तर ही मिलेगा।

आपने केवल एक ही सत्य के विषय में कहा है – अच्छा या बुरा, सूखा या गीला। यही तो वह विचार है जिससे हमें ऊपर उठना है। यह द्वन्द्व हैं जो एक अनुबंधित मन (आस पास के वातावरण से एकत्रित संस्कारों द्वारा ढका हुआ मन) की अभिव्यक्ति हैं। बाह्य-दृश्य प्रपंच एक दूसरे पर निर्भर हैं व अनुबंधित हैं। किसी ऐसे व्यक्ति को फोन करने का विचार करें जो दुनिया के दूसरे भाग में है, जहाँ समय १२ घंटे पीछे चल रहा हो। आप रात के आठ बजे बात कर रहे हैं किंतु उस व्यक्ति के वहाँ सुबह के आठ बजे हैं। आप उसे कहते हैं कि यह रात का समय है व आसमान में तारे चमक रहे हैं। उधर दूसरा व्यक्ति आपको बताता है कि आज तो सूर्य चमक रहा है व आकाश बिल्कुल साफ है। दोनों में से कौन सत्य कह रहा है? कोई नहीं, कोई एक, या दोनों? ऐसी ही अन्य सभी सच्चाइयों का वास्तविक स्वभाव / विवरण समझ पाना व उन सब से ऊपर उठ जाना ही आत्म-साक्षात्कार है।

केवल एक ही परम-स्वरूप कैसे हो सकता है? रूप एक बाहरी तथ्य / दृश्य-प्रपंच है और आपका ‘स्व’ ऐसे सभी तथ्यों से अभिन्न है। इसीलिए मेरा यह कहना है कि यदि किसी भी एक रूप में विश्वास करना आपको अपने सत्य के अन्वेषण में सहायक होता हो, तब वहीं से आरंभ करना उचित है। जब आप यह मानते हैं कि आपकी खोज ही केवल परम खोज है तो स्मरण रखें कि वह परम खोज है ही नहीं। क्योंकि यदि आप अभी तक ऐसी धारणा बनाए हुए हैं तो यह दर्शाता है कि अभी आप द्वारा सत्य का अन्वेषण होना बाकी है।

मुझसे यह पूछना कि केवल एक सत्य बताएँ या परम स्वरूप बताएँ, इसका तात्पर्य यह है कि आप अपनी स्वयं की धारणा के अनुरूप ही उत्तर चाह रहे हैं। यह आत्म-अन्वेषण की यात्रा है, आत्म-अनुबंधन की नहीं। सभी धर्मों के महानतम महापुरूषों ने सदा पथ-प्रदर्शन ही किया है। उनके द्वारा प्रदर्शित पथ पर पग बढ़ाना एक आरंभ मात्र है। किसी अन्य की विचार धारा का दास क्यों बना जाए? गंतव्य तक पहुँचने के लिए शांति, धैर्य, प्रयत्न, सतत प्रयास व श्रद्धा आवश्यक हैं। जो कोई मत आप में यह पाँच भाव जगाता हो उसी को अपना प्रारंभिक बिंदु मान लेना उचित है। शंकराचार्य अद्वैत के प्रबल प्रस्तावक थे। अद्वैत से अभिप्राय है कि ईश्वर और मैं एक ही हैं। तथापि, इसके साथ साथ उन्होंने द्वैत भाव के अनेकों सुंदर भक्ति-गीतों की भी रचना की, जिसमें ईश्वर के साकार रूप की स्तुति गायी गयी है। दोनों में से क्या सही है? दोनों ही सही हैं।

आने वाले सप्ताहों में कुछ और लेख प्रकाशन हेतु तैयार हैं जिनमें आप इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी पाएँगे।

शांति।
स्वामी