ऐसा कहा जाता है कि आत्म-साक्षात्कार के उपरांत जब बुद्ध अपने परिवार से भेंट करने पहुंचे, तब उनका स्वागत पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया। उनके पिता ने, जो वहाँ के राजा थे, बुद्ध का सत्कार एक राजकुमार की भांति किया जो कभी उनके पुत्र हुआ करते थे। मंत्रीगण व राज परिवार के सभी सदस्यों ने अति आदर सहित उनका पूर्ण भाव पूर्वक अभिनंदन किया। उनका अपना पुत्र, राहुल, भाग कर उनके समीप आया और उनके भुजापाश में बंध गया। सम्पूर्ण सात वर्ष तक उसने अपने पिता के विषय में बहुत कुछ सुना था और उनसे मिलन की प्रतीक्षा अति आतुरता पूर्वक कर रहा था। रजनी ओबेसीकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘यशोधरा’ का एक प्रसंग मैं यहाँ वर्णित कर रहा हूँ –

यशोधरा, राहुल की माता, वहाँ उपस्थित नहीं हुई।
राजा ने यशोधरा के लिए बुलावा भेजा किन्तु उसने उत्तर दिया, “यदि मैं किसी भी रूप से योग्य हूँ, तो सिद्धार्थ स्वयं आएंगे और मुझसे भेंट करेंगे।”

तथागत ने सभी सगे संबंधियों से भेंट के उपरांत पूछा, “यशोधरा कहाँ है?”
और, जब उन्हें बताया गया कि उसने आने से इंकार कर दिया है, वे तत्क्षण उठे और उसके कक्ष की ओर चल पड़े।

“मैं स्वतंत्र हूँ,” तथागत ने अपने शिष्यों शारीपुत्र व मुद्गलायन से कहा, जिन्हें उन्होंने राजकुमारी के कक्ष की ओर जाते हुए अपने साथ आने से रोक दिया था। “किन्तु राजकुमारी अभी स्वतंत्र नहीं हुईं हैं। मुझे इतने दीर्घकाल तक स्वयं से दूर पा, वह अभी तक अत्यंत पीड़ा में हैं। जब तक उनके दर्द को मार्ग नहीं दिया जाएगा, उनका हृदय इसी प्रकार विह्वल रहेगा। यदि वह तथागत को स्पर्श करें, आप उन्हें रोके नहीं।”

यशोधरा अपने कक्ष में बैठी थीं, उनके वस्त्र अति साधारण थे व सिर केश विहीन था। जब बुद्ध अंदर पहुंचे, तो प्रेम कि प्रचुरता से वह इस कदर लबालब थीं जैसे एक मुँह तक भरे घट में से निरंतर प्रवाहित हो रहा नीर; अपना प्रेम वह संभाल ही नहीं पा रहीं थीं। इस तथ्य को विस्मरित कर कि जिस व्यक्ति को वह प्रेम करती थीं वह अब बुद्ध हो गए हैं – राजाओं के भी अधिराज, सम्यक सत्य के उपदेशक – यशोधरा ने उनके चरण पकड़ लिए और अति भावुकता पूर्वक रुदन करने लगीं।

तथापि, यह स्मरण होते ही कि सुयोधन, शाक्य सम्राट एवं बुद्ध के पिता, भी वहाँ उपस्थित हैं, उन्हें संकोच अनुभव हुआ और वह उठीं और अति मर्यादित रूप से वहाँ से कुछ दूर जा कर बैठ गईं।

सम्राट राजकुमारी की ओर से क्षमा प्रार्थना के स्वर में बोले, “यह सब उसके अति गहन प्रेम व स्नेह के परिणामस्वरूप हुआ है; उसका प्रेम एक अस्थाई भाव नहीं है। विगत सात वर्षों में जब उसके पति उससे दूर थे, जब उसने सुना कि सिद्धार्थ ने अपना शीर्ष केश रहित कर लिया है तो इसने भी ऐसा ही किया; जब सुना कि उन्होंने इत्र व आभूषण आदि का प्रयोग त्याग दिया है तो इसने भी उनका प्रयोग करने से मना कर दिया। अपने पति की ही भांति यह भी केवल निर्धारित समय पर, मिट्टी के बर्तन में ही भोजन लेती। उन्हीं की भांति इसने भी सुंदर बिछौने व ऊंचे बिस्तर इत्यादि त्याग दिये और जब अन्य राजकुमारों ने इसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो इसने उत्तर में कहा कि वह अब भी सिद्धार्थ की ही है। अतः, इसे क्षमा करें।”

हमारे जीवन-संघर्ष का अधिकांश भाग दुख को दूर रखने व खुशियों के संरक्षण पर की केन्द्रित रहता है। यदि जीवन से हमारी अपेक्षाएँ पूर्ण हो जाती हैं तो हम प्रसन्न रहते हैं, अन्यथा उदास। हमारी नकारात्मक भावनाओं को और अधिक भयावह बनती है हमारी असमर्थता – उनको उसी समय उचित दिशा न दे पाना जब वह उत्पन्न होती हैं। हम असहाय महसूस करते हैं, रुदन करते हैं, क्रोधित हो जाते हैं; हम ऐसा करना नहीं चाहते, तथापि यह सब होता है। मैंने जिस कथा का संदर्भ लिया है उसमें दो वाक्य विशेष रूप से वर्णनयोग्य हैं –

“जब तक उसके दुख को मार्ग नहीं दिया जाएगा, उसका हृदय विह्वल रहेगा,” और, “यह उसके अति गहन प्रेम व स्नेह के परिणामस्वरूप हुआ है, उसका प्रेम एक अस्थाई भाव से कहीं ऊपर है।”

किसी व्यक्ति या प्रसंग से हम भावनात्मक रूप से जितना गहराई से जुड़े होती हैं, उतनी अधिक पीड़ा होती है सब कुछ बिखरने की स्थिति में। जिस प्रकार नदिया की धारा स्वयं अपना मार्ग निर्मित करते हुए आगे बढ़ती है, उसी प्रकार दुख भी अपना मार्ग खोजता चलता है। आप नदी का मार्ग पुन: निर्मित कर सकते हैं, किन्तु उसे स्थायी रूप से रोक नहीं सकते। कालांतर में, यदि वह पूर्णत: सूख ही न जाये, तो उसे किसी दूसरी नदी में अथवा सागर में समाहित होना ही होता है। इसी प्रकार, दुख का भी किसी अन्य भावना में समायोजन आवश्यक है, अन्यथा वह कभी समाप्त नहीं होता। चूंकि, अधिकांश अन्य भावनाओं से विपरीत, दुख कोई अस्थाई भाव अथवा ज्वार भाटे की तरह आने जाने वाला नहीं होता। वह प्रेम के गहनतम उद्भव स्थल से ही अवतरित होता है। दर्द की धारा तो बस कृतज्ञ भाव की धारा के संग ही जुड़ सकती है। जब कोई अपना जिसे आप अथाह प्रेम करते हों, आपके जीवन से दूर हो जाता है तो यह अत्यंत कष्टकारी होता है। और, जब तक आप किसी अन्य को उसी गहराई से प्रेम नहीं कर पाते, तब तक आप उस निकटतम के बिछोह के दर्द से ऊपर नहीं उठ पाते, जो कभी आपकी जिंदगी का हिस्सा था।

या तो आपका सौभाग्य किसी ऐसे व्यक्ति को पा लेता है जिसे आप अन्तःकरण की गहराई से प्रेम कर पाएँ, अथवा आप अपना ध्यान किसी दूसरी ओर लगाना सीख जाते हैं। अपने दुख से बाहर आने के लिए प्रायः अन्य विकल्प नहीं होता। वह समय के साथ ही कम होता है। दुख के आविर्भाव के कारण को बदल दो अथवा तो स्वयं को प्रेम से सराबोर कर दो। किन्तु किसी भी स्थिति में, स्वयं को दुखी रहने का दोषी कभी मत मानो, चूंकि दर्द को कोई भी स्वयं नहीं बुलाता है। दर्द एक विकल्प नहीं भाव है। और, दुखी रहने के आभास से दुखी रहना, निरर्थक है। यह आपको और अधिक अनुतापी बना देता है। इसके विपरीत, जब कोई भाव आप पर हावी हो तो उसे स्वीकार करें व उसे उसकी दिशा में बह जाने दें। उस संघात (असर) को धीरे धीरे हल्का होने का समय दें।

यहाँ मैं चेतावनी का एक शब्द कहना चाहूँगा – इसको बहने का मार्ग देने का यह तात्पर्य नहीं कि आप उस पर चिंतन करें अथवा उस विषय को लेकर चिंतित रहें। वास्तव में, दुख के बारे में सोचते रहने से उसका मार्ग और अधिक विस्तृत होता जाएगा। जहां आपको दुखी महसूस करने में स्वयं को दोषी नहीं मानना, वहीं, साथ साथ, स्वयं को धीरे धीरे अन्य सकारात्मक विचारों व कृतज्ञभाव की ओर मोड़ने का यत्न भी करना है। ऐसा करने से आपको अपने मन को दुख से बाहर लाने में सहायता मिलेगी।

एक शिष्य ने गुरु से पूछा, “गुरुदेव, मुझे क्रोध बहुत आता है। मैं विक्षिप्त सा हो जाता हूँ। इसके लिए मैं क्या करूँ?”
“अ…..आ…..” अपनी लंबी श्वेत दाड़ी को सहलाते हुए गुरु बोले, “तुम्हारे क्रोध की भयानकता को समझने हेतु मुझे उसे देखना होगा। अभी मेरे लिए क्रोधित हो।”
शिष्य तिरछी नजर से बोला, “मैं उसे अभी कैसे आपको दिखाऊँ? ऐसा नहीं है कि मैं किसी भी समय क्रोधित हो सकता हूँ।”
“अच्छा,” गुरु ने कहा, “यदि तुम जब चाहो तब अपना क्रोध नहीं दिखा सकते तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि यह तुम्हारा वास्तविक स्वभाव नहीं है। इसके उद्भव बिन्दु तक पहुँचो और तब इस पर नियंत्रण पाओ।”

विषाद और हर्ष, दुख और प्रसन्नता की ही भांति, एक ही स्थान से उपजते हैं – वह है हमारा मन। हम इन्हें अपने हृदय में महसूस करते हैं, किन्तु इनका उदय मन से ही होता है। हमारी भावनाएं सागर की लहरों के समान होती हैं – अनवरत बहती व कभी पृथक न होने वाली लहरें। उसी सागर में जहां आप अमूल्य मोती व मणि-माणिक्य प्राप्त करते हैं, वहीं आप श्वेत शार्क व भयंकर ह्वेल जैसे जीव भी पाते हैं। मन रूपी सागर में, जीवन रूपी समुद्र में, हमारी भावनाएं सदा सर्वदा उपस्थित रहती ही हैं – जटिल व एक दूसरे से जुड़ी। हमेशा, हर पल प्रसन्न अनुभव करना अथवा सदा उदास ही रहना – यह असंभव है। जब हम अपने आंतरिक जगत में डुबकी लगाते हैं तो हमारी भेंट हर प्रकार की भावनाओं से होती है।

समुद्री जीवों की ही भांति, हमारी भावनाओं की भी एक तय समयावधि होती है। विश्रांति बनाए रखने के लिए उन्हें स्वीकार करें। जिस क्षण आप अपने अन्तःकरण में समाहित भावों के साथ सामंजस्य बना लेते हैं, तब आप स्वतः एक शांत स्थिति में पहुँच जाते हैं। और, सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाये? सजग रहें। कृतज्ञ रहें। प्रेम एवं कृतज्ञ भाव – यही दुख के अंतिम पड़ाव हैं।

प्रार्थना भी सहायक होती है। कैसे? यह फिर कभी के लिए।

शांति।
स्वामी