मैं ही क्यों? जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच, यह प्रश्न प्राय: सभी के समक्ष उत्त्पन्न होता है। इनमें से कुछ उत्तर की खोज में स्वयं को विस्मरित कर देते हैं, वहीं कुछ अन्य, प्रश्न में ही खो जाते हैं। अनेकानेक अवसरों पर, आपने स्वयं भी यह देखा होगा कि सज्जन व्यक्तियों के जीवन में घोर विपादाएँ आती रहती हैं, जबकि धृष्ट व्यक्ति एक संपन्न जीवन का आनंद लेते हैं। यह भी असामान्य नहीं कि ऐसे व्यक्ति जो अपने स्वास्थ्य के प्रति अति सतर्क रहते हैं, उन्हें असाध्य व्याधियाँ घेर लेती हैं। अनेक बार तो वे व्यक्ति जिन्होंने जीवन-पर्यंत अपने शरीर का हर संभव दुरूपयोग किया, वे भी नौ दशक तक एक स्वस्थ जीवन जीते हुआ देखे जा सकते हैं। कुछ ऐसे होंगे जिन्होंने कभी व्यभिचार के विषय में सोचा तक नहीं, उन्हें जीवन साथी बिना किसी ठोस कारण के अकेला छोड़ दे। कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो सदा उचित राह पर ही चला, किंतु उसे जीवन में अकेलापन व तिरस्कार ही मिला – भावनात्मक व शारीरिक दोनों स्तर पर, और अनेक बार आर्थिक स्तर पर भी।

इन सब विरोधाभासों को कैसे समझा जाए? एक उपयुक्त उत्तर तभी प्राप्त होता है जब प्रश्न भी उपयुक्त हो। “मैं ही क्यों?” – इस प्रकार की नकारात्मक सोच रख कर किसी विषय पर विचार न करके, आपको अपने आदर्श व्यक्ति के जीवन का परीक्षण करते हुआ यह कहना चाहिए – ‘मैं क्यों नहीं?’ अथवा ‘मैं यह कैसे हो सकता हूँ?’ यदि आप अपनी योग्यताओं का अपरिमित विस्तार करना चाहें, तो आपको प्रकृति माँ की शरण लेनी होगी। वह प्रकृति जो सदा दिव्य ऊर्जा से संपन्न रहती है व आपको देने के लिए जिसके पास असीम भंडार है – आपके आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु। किंतु इससे पूर्व कि प्रकृति आपको कुछ प्रदान करे, आपको स्वयं प्रकृति के साथ व्यक्तिगत सामंजस्य स्थापित करना होगा – जो पूर्णत: प्रकृति का ही समरूप हो।

यदि आप प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करें तो आपको ज्ञात होगा कि प्रकृति के चक्र में कोई संघर्ष नहीं। वह सब जो अनुकूल है, प्रकृति उसे सहर्ष स्वीकार कर लेती है, और प्रतिकूल पदार्थों को वह अपने विकास चक्र से बाहर कर देती है। उचित समय पर रोपा गया बीज ही अंकुरित होता है, शेष समय वह विनष्ट हो जाता है। आप प्रकृति को एक कृत्रिम पदार्थ दें जैसे पौलिथीन, और देखें कैसे वह न उसे ग्रहण और न विनष्ट ही करेगी, प्रकृति केवल उसे अस्वीकार कर देगी। अपना व्यक्तिगत प्राकृतिक सामंजस्य स्थापित करने से पूर्व आपको कुछ समय स्वयं के परीक्षण में लगाना होगा। जानें व विवेचना करें कि आपके लिए अनुकूल क्या है व प्रतिकूल क्या है। यह सुनिश्चित करें कि ऐसा क्या है जो आपको असहमति की दिशा में धकेलता है व कौन से घटक उचित कार्य करने में आपके सहायक होते हैं। आपको विवेचना करनी होगी कि वह क्या है जो आप में उत्साह की लहर उत्त्पन्न करता है व क्या निराशा का अंधकार। चूँकि इन सब में प्रभावित व्यक्ति आप ही हैं, अत: यह बौद्धिक प्रक्रिया पूर्णत: आप पर ही केंद्रित है। कृपया अतिशय विलासितापूर्ण मार्ग की और कदम न बढ़ाएँ और न ही दूसरों का व्यवहार परिवर्तित करने का प्रयत्न करें। यहाँ आप ही वह विषय, वस्तु, निमित्त, व परिणाम हैं जिस पर हमारा संपूर्ण ध्यान है। एक बार आप अपने व्यक्तित्व को समझने की ओर अग्रसर हो गये तो, भले ही अभी बौद्धिक स्तर पर, आप समन्वय हेतु तैयार हैं।

प्रकृति की भाँति, आप भी केवल वही ग्रहण करें जो आपको दिव्यता की ओर प्रेरित करे, अन्य को अस्वीकार कर दें। एक बीज यदि असमय रोप दिया जाए तो वह अंकुरित न हो कर, मिट्टी में ही समा जाता है, इसी प्रकार आप भी असमय मिली उचित जानकारी व ज्ञान को अपने में समाहित करना सीखें। प्रकृति अपने में समाए बीज का कोई निशान नहीं छोड़ती – इसी को समाहित करना, क्षमा करना व भूल जाना कहते हैं। आप को सदा स्मरण रहना चाहिए कि प्रकृति की ही भाँति, आप में भी कभी शिकायत का भाव नहीं आने पाए। प्रकृति से प्रेरणा लेकर, आपको भी किसी घटना या प्रसंग के समय, उसे स्वीकार करना, समाहित करना अथवा अस्वीकार करना आना चाहिए। केवल यही तीन चयन संभव हैं। जब तक आप स्वयं न चाहें, अन्य कोई आपको दुखी नहीं कर सकता।

दुर्भाग्यवश, यही सिद्धांत हर सकारात्मक भावना पर भी सटीक बैठता है – जब तक आप स्वयं प्रसन्न न रहना चाहें, अन्य कोई आपको हर्षित नहीं कर सकता। प्रकृति सब के लिए समान रूप से विद्यमान है, किंतु यह अपनी ही प्रणाली द्वारा संचालित होती है। तथापि, स्मरण रखें कि यह एक बौद्धिक प्रक्रिया मात्र है; यह आपको गंतव्य तक नहीं पहुँचाएगी। हाँ, यह आपको विश्रान्ति व आनंद प्राप्ति के सुखद मार्ग पर प्रशस्त कर देगी। एक बार परम सत्य का साक्षात्कार होने के उपरांत, यह सब एक विद्वान के लिए विद्यालय की प्रथम कक्षा की समान लगेगा।

इसी बौद्धिक प्रक्रिया का भाग मान कर, प्रकृति से तादात्मय बनाते हुए, आप निम्न में से एक भूमिका का चयन कर सकते हैं। एक ही भूमिका में आप जितना रहेंगे, उस भूमिका को निभाने की आपकी योग्यता उतनी ही विकसित होती जाएगी। कभी कभी भूमिका का बदलाव आवश्यक होता है, तो कभी सुविधा मात्र। ठीक ही तो है, भले ही आप सी.ई.ओ. क्यों न हों, बोर्ड के समक्ष आपकी प्रस्तुति अनिवार्य है। अथवा, आप निर्देशक हैं तथापि, जीवन साथी के सम्मुख आपका मूल्यांकन अवश्य होगा। यहाँ मैं उन चार भूमिकाओं का उल्लेख कर रहा हूँ। विवेचन करें कि आपकी वर्तमान भूमिका क्या है, तत्पश्चात, वहाँ से अपनी यात्रा प्रारंभ करें –

पश्चातापी (याचक)

एक पश्चातापी की भूमिका निभाते लोगों की कोई कमी नहीं। अनुताप में डूबे ऐसे व्यक्ति सदा प्रकृति के समक्ष झोली फैलाए रखते हैं। माँगने से तो केवल कौड़ियाँ ही मिलती हैं, और उसके लिए भी मनुष्य को न्यूनतम स्तर तक झुकना पड़ता है। आत्म-ग्लानि के अति नारकीय मार्ग पर चलते हुए, ऐसा व्यक्ति सदा शिकवे-शिकायतें ही करता रहता है। स्वयं के प्रति एक विभ्रमित दृष्टिकोण लिए वह यह नहीं समझ पाता कि उसमें भी सकारात्मक जीवन जीने की क्षमता विद्यमान है। सदा याचक बने रहना ऐसे व्यक्ति का प्रमाण-चिन्ह बन जाता है और वह सदा अप्रसन्न रहता है। उसने मानो प्रयत्न न करने का निश्चय कर लिया है (यह मानते हुए कि शायद पहले कभी उसने ऐसा किया हो)। एक सीमा के बाहर कोई इनकी सहायता नहीं कर सकता। जब वे स्वयं इस भूमिका को छोड़ने का निर्णय लेते हैं तब ही वे ऊँचा उठने को तैयार हैं।

याचक सदा इसी विचार में रहता है कि – “मैं ही क्यों”? उसकी धारणा है कि जो सफल हैं वे धोखा-धड़ी अथवा भाग्य के अनुदान से सफल हैं। एक ध्यान देने योग्य बात – कोई भी यह भूमिका वास्तव में निभाना नहीं चाहता और जो निभा रहें हैं उनके हृदय में घोर निराशा व पश्चाताप है, इस हद तक कि वे सहायता भी अस्वीकार कर देते हैं। बहुत ही कम प्रसंगों में, किसी के सम्मुख प्रारब्ध वश यह भूमिका निभाने की विवशता प्रस्तुत होती है। ईश्वर या प्रकृति – दोनों का वास्तव में एक ही अभिप्राय है – कभी भी ऐसे याचक की सहायतार्थ नहीं आते (कुछ पौराणिक गाथाओं को छोड़ कर)। यदि आप डूब रहे हैं व तैरने में अक्षम हैं, तो भले आप दिन ढले तक याचना करते रहें, कोई ईश्वर प्रकट होने वाले नहीं। हाँ, आप प्रकृति (ईश्वर) की सहायता के पात्र हो सकते हैं यदि कष्ट के समय उनका आवाहन करने की कला आप जानते हों।

जितने भी महान योगी, तपस्वी, परम-भक्त व दिव्य पुरुष हैं, उनके जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग आए जब उन्होंने स्वयं के तपबल द्वारा प्राणी मात्र की सहायतार्थ प्रकृति का सहयोग प्राप्त किया हो, न कि याचना द्वारा। प्रार्थना को याचना, अथवा याचना को प्रार्थना नहीं मान लेना चाहिए। एक ऐसी प्रार्थना जिसके साथ उचित प्रयास व उच्चतम भाव न जुड़े हों, वह याचना बन जाती है। प्रार्थना द्वारा इच्छित परिणाम अवश्य मिल सकते हैं, यदि कुछ विशेष संघटकों को पूरा किया जाए। इस पर मैं फिर कभी चर्चा करूँगा, यह एक अति सुंदर व उत्कृष्ट विषय है जिसकी व्याख्या में मुझे अति हर्ष होगा। पुन: अपने विषय पर आते हुए, चाहे कैसी भी विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों, कृपया याचक की भूमिका से बचें। इसमें केवल अपयश ही है। इसके स्थान पर, निम्न में से एक का चयन करें –

परितापी (श्रमिक)

बहुत से लोग इसी भूमिका में होते हैं। जीवन में जो कुछ भी उन्हें प्राप्त है उसे वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं – चाहे वह धर्म, दर्शन, नियम, शिक्षा, तौर-तरीके, रिश्ते-नाते, अथवा अन्य कुछ भी हो। अधिकतर श्रमिक व्यक्ति बिना कोई प्रश्न किए, सब कुछ अपना लेगा। ऐसे व्यक्ति अपना स्वयं का सत्य जानने का साहस तक नहीं करते, न ही किसी बदलाव के इच्छुक होते हैं। अपनी कृत्रिम आरामदायक स्थिति को ही उन्होंने अपना सुरक्षा घेरा बना लिया है। उनके लिए इस भौतिक जगत की नश्वरता अथवा इसकी सत्यता का कुछ औचित्य नहीं। उनके लिए यह सब अर्थहीन है। उनके पास रहने को घर (भले ही किराए का), खाने को भोजन व अन्य उपभोग का साजो सामान उपलब्ध है। सेवा निवृत होने तक वह नित्य प्रति काम पर उपस्थित होते रहेंगे, घर जाएँगे, भोजन करेंगे, अपने जीवन साथी संग यथासंभव संभोग करेंगे, एवं एक धर्म का अनुकरण करते रहेंगे। यहाँ विडंबना यह है कि श्रमिक की ही भूमिका में संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देना अनुपयुक्त नहीं। कुएँ के मैढक को क्या अंतर पड़ता है कि बाहर अथाह सागर हिलौरे मार रहा है! श्रमिक प्रवृत्ति के मनुष्य प्रकृति के महान सहयोगी हैं। प्रकृति बहुधा उनका ध्यान रखती है, चूँकि वे अपने भाग का कार्य समुचित ढँग से संपूर्ण कर रहे हैं। अत: जब तक वह अपने कार्य में निष्ठापूर्वक लगे रहेंगे, तब तक उन्हें यथायोग्य अधिकृत सहयोग प्राप्त होता रहेगा। इस भूमिका में कुछ भी आकर्षक अथवा रोचक नहीं होता। श्रमिक व्यक्ति जीवन को समग्र रूप से न जी कर, मात्र समय काट रहा है। जिस दिन उसे जीवन की विपुलता व समग्रता का आस्वादन मिलेगा, अथवा प्रकृति की ओर से आए किसी उचित किंतु क्रूर प्रतीत होने वाले प्रसंग से सामना होगा, उस दिन वह अपनी गहन निद्रा त्याग कर, उठ खड़ा होगा। तब वह इस भूमिका को अस्वीकार कर देगा। प्राय: हर व्यक्ति अपने जीवन काल में एक बार अवश्य इस भूमिका को निभाता है। कुछ इस सुखद भूमिका से बँध जाते हैं वहीं कुछ अन्य स्वच्छंद विचरण का मार्ग चयन करते हैं। इस भूमिका से बाहर आने वाले, निम्न में से कोई एक भूमिका अपनाते हैं –

समकक्ष (वैयक्तिक)

जीवन के किसी मोड़ पर, अपने अंत:करण के स्वर सुनते हुए, श्रमिक व्यक्ति, स्वयं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न करता है – क्या जीवन जीने की कोई उन्नत शैली है? इस प्रकार का वैचारिक मंथन, आगे की यात्रा का प्रारंभ है। श्रमिक की भूमिका से भिन्न, वैयक्तिक भूमिका में वह अपनी नव-निर्मित विशिष्ट वैचारिक पद्धति सबल करने लगता है। वह स्वयं का दृष्टिकोण विकसित करने लगता है व बिना विचार किए कुछ नहीं अपनाता। उसे प्रश्न करना आ जाता है – एक ऐसा गुण जिसे वह धीरे धीरे पोषित करता रहता है। उसके जीवन में श्रमिक की अपेक्षा कहीं अधिक रोचकता व क्रियाशीलता है। किंतु यह एक अस्थाई भूमिका है। अपने अटल निश्चय के बल पर वह उच्च्तम श्रेणी तक पहुँच जाएगा, अथवा पुन: श्रमिक की भूमिका में गिर जाएगा। सकारात्मक तथ्य यह है कि पुन: श्रमिक बनने पर भी अब वह पहले जैसा नहीं होगा। वह सर्वश्रेष्ठ की पंक्ति में रहेगा। वैयक्तिक भूमिका में व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसके हर कार्य में प्रकृति सहयोग देगी, चूँकि यहाँ सर्वश्रेष्ठ ही शेष है। अब वह श्रमिक मक्खी बने रह कर संतुष्ट नहीं बल्कि रानी मक्खी बनना चाहता है। वैयक्तिक भूमिका में वह अधिक हर्षित रहता है। उसे आभास होता है कि सभी रूकावटें स्वत: हटती जा रही हैं – ऐसा विशेष रूप से तब होता है जब वह मार्ग पर प्रभुद्धता पूर्वक, अविचल भाव से चलता रहता है। जब, जहाँ, जैसा उचित हो; तब, वहाँ, उसी प्रकार – स्वीकार, समाहित, समायोजित अथवा परित्याग करता रहता है। भविष्य में ऐसे साधक का सम्मान अधिपति के रूप में होता है।

सम्राट (अधिपति)

सम्राट ने अपने सत्य का अन्वेषण कर, उस पर अधिपत्य स्थापित कर लिया है। उसे पूर्णत: ज्ञात है कि मात्र अथक शारीरिक परिश्रम द्वारा असाधारण परिणाम प्राप्त नहीं होते। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति में विभिन्न घटक व सशक्त तत्व अपनी अपनी भूमिका का निर्वाहन करते हैं – उनमें से अनेक अपारदर्शी, अव्यक्त, अकथनीय व अबोधगम्य रहते हैं। ऐसे अधिपति ने प्रकृति के साथ तारतम्य स्थापित कर लिया है, प्रकृति संग एक गठजोड़ कर लिया है। प्रकृति भी अपनी दिव्यता ऐसे महान अधिपति में संसाधित कर देती है, प्राणीमात्र के हित में कार्य करने हेतु उसका चयन कर लेती है, जिससे वह संपूर्ण विश्व कल्याण हेतु सेवा कार्य कर सके। ऐसा अधिपति न केवल ईश्वर द्वारा चयनित माध्यम होता है, बल्कि वह स्वयं प्रकृति का समरूप हो जाता है। उसके सभी कार्य पवित्र चित्त द्वारा उपजे विचारों को ब्रह्मांड में संप्रेषित करने मात्र से संभव होने लगते हैं, उसकी दिव्यता का आयाम सर्वत्र व्याप्त होता है। उसकी वाणी से निकला प्रत्येक शब्द गर्भ-गृह से आती दिव्य ध्वनि बन जाता है व श्रोताओं के हृदय को गहराई तक भेदने में सक्षम होता है। उसने अपना वास्तविक स्वरूप जान लिया है। परम-ज्ञान की गंगा स्वत: उसके अंतस से बह निकलती है। ईश्वर की सर्वोच्च दिव्य सत्ता – मानव हृदय – का वह सम्राट हो जाता है।

ऐसा अधिपति बनने के मूल घटक क्या हैं? हालाँकि आध्यात्मिक विषयों को संक्षिप्त रूप से कहना मेरे लिए रूचिकर नहीं, तथापि संक्षेप में इस प्रश्न का उत्तर यहाँ प्रस्तुत है –

१. नैतिकता : मनसा-वाच्या-कर्मणा (विचार, वाणी व कर्म) हर स्तर पर पूर्ण नैतिकता का आचरण

२. वैराग्य : भौतिक जगत के सुखों से उपरामता

३. मार्ग : एक मार्ग का चुनाव – प्रारंभ में भक्ति अथवा ज्ञान मार्ग

४. श्रद्धा : चयनित मार्ग के प्रति संपूर्ण समर्पण

५. प्रमाण : स्वयं के प्रथम दृष्ता अनुभव पर आधारित प्रामाणिक दृष्टिकोण अपनाना, मात्र बौद्धिक जानकारी नहीं

६. तापस (तप) : अतिशय धैर्य व प्रबुद्धता द्वारा मार्ग पर सुदृढ़ रहना, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए

७. समाधि : परम-सत्य का साक्षात्कार

८. अनुभव : मार्ग पर प्रशस्त रहना जब तक अनुभव की पुनरावृत्ति में सक्षम न हो पाएँ

९. तुरीय : उस दिव्य अनुभूति को अंत:करण में समग्र रूप से समाहित कर पाना व जीवन-क्रम को उस अनवरत बहती दिव्य अमृत धारा के संग आगे बढ़ाना

१०. समर्पण : अपना संपूर्ण जीवन प्राणी मात्र के कल्याण हेतु समर्पित कर देना जिससे अन्य साधक मार्ग दर्शन पा सकें

बाँटने का सुख अन्य सभी सुखों से ऊपर होता है।

शांति।
स्वामी