लगभग बीस सप्ताह पूर्व, हमने आत्म-रूपान्तरण के मार्ग पर अपनी यात्रा प्रारंभ की। मैंने उल्लेख किया कि आत्म-रूपान्तरण की यात्रा में चार विभिन्न स्तरों पर स्वयं को रूपांतरित करने की प्रक्रिया सम्मिलित होती है, वे हैं – मानसिक, भावनात्मक, नैतिक एवं शारीरिक। सम्पूर्ण शुद्धिकरण, उपरोक्त चारों स्तरों को समझना व पूर्णत: परिवर्तित करना , इनके बिना दिव्यता की उत्कृष्त्तम स्थिति प्राप्त करना असंभव है। मैंने अपने लेख मानसिक परिष्कार से आरंभ किए। हमने आपकी एकाग्रता, संकल्प शक्ति व ज्ञान को सशक्त करने की विभिन्न प्रक्रियाओं की विवेचना की। ध्यान में आने वाले चार प्रमुख व्यवधानों में से तीन की विवेचना हम कर चुके हैं । आज मैं मानसिक परिष्कार की व्याख्या के अंतर्गत ध्यान के चतुर्थ व्यवधान की विवेचना के उपरांत इस श्रंखला को सम्पन्न कर रहा हूँ।

साधारण वस्तु-स्थिति

मान लें कि आप सम्पूर्ण दृढ़ता व सतर्कता पूर्वक, ध्यान के लिए बैठते हैं। कुछ समयोपरांत आप बेचैनी महसूस करने लगते हैं, आप हिलने डुलने का या अपने सत्र को समाप्त करने का तीव्र आवेग अनुभव करने लगते हैं। आपके द्वारा अपने मन को शांत कर, बेचैनी पर नियंत्रण पा लेने के कुछ समय बाद, एक प्रकार के आलस्य व नीरसता का भाव आप पर छाने लगता है। बहुत से लोग इस स्थिति को गलती से विश्रांति अथवा ध्यान के एक अच्छे अनुभव का नाम देते हैं, यह एक त्रुटिपूर्ण विभ्रांति है। किन्तु, उन्नत ध्यान योगी, सतर्क रहते हुए, इस व्यवधान को पार करने हेतु सावधानी पूर्वक मानसिक प्रयास करते हैं। जैसे जैसे आप एक ऐसी सतर्क मानसिक स्थिति, जो न नीरसता और न बेचैनी से भरी हो, बनाते हुए ध्यान में आगे बढ़ते हैं, तब विचारों में उलझने की एक स्वाभाविक प्रवृति उत्पन्न हो जाती है। शीघ्र ही आप स्वयं को किसी एक विचार में डूबा, अथवा एक के पश्चात दूसरे विचार में उलझा पाते हैं।

उदाहरणस्वरूप, संभवतः आपको किसी अरुचिकर संवाद का स्मरण आ सकता है; और इस तथ्य को विस्मरित कर कि आप ध्यान में बैठे हैं, आप मानसिक रूप से उस बातचीत का अनुसरण करने लगते हैं। आप सोचने लगते हैं कि आप को ऐसा कहना चाहिए था, अथवा आपको इस प्रकार से प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी; वह व्यक्ति कितना कृत्घन, ओछा, अशिष्ट व गलत था, इत्यादि। उत्तम ध्यान योगी अपने प्रमुख विचार से कभी भटकते नहीं। वे, तत्क्षण, नए विचार को वहीं त्यागने में समर्थ होते हैं व उस विचार-शृंखला को वहीं विराम दे देते हैं। अब वे बेचैन नहीं; नीरस नहीं; व विचारों में भी नहीं उलझ रहे; तथापि इसका यह तात्पर्य नहीं कि अब उनकी ध्यान प्रक्रिया पूर्णत: त्रुटिरहित है। अभी आपको एक अन्य व्यवधान का ध्यान रखना होगा।

एक सूक्ष्म किन्तु सशक्त दोष

एक तरह से यह सर्वाधिक विशाल विघ्न है। यह सबके भीतर होता ही है, एक प्रतिबंधित मन की सहज प्रकृति। यह उस समय भी आप में विद्यमान होती है जब आप निद्रा में होते हैं जिसके द्वारा स्वप्न आते हैं । जब आप तीन व्यवधानों को पार करते हुए ध्यान में दृढ़ता से आरूढ़ रहते हैं, तब आपके अतीत के विभिन्न प्रतिबिंब आपको अपने मानस पटल पर उभरते हुए दिखाई देंगे। वे आपको कदाचित असंगत लगें। जब आप अपनी ध्यान की वस्तु पर एकाग्र होने का पुनः प्रयास करते हैं, आप पाते हैं कि आपकी स्मृति में कैद विभिन्न प्रतिबिंब आपके मानस पटल पर हलचल मचाने लगे हैं। ध्यान के क्षणों में आपके मानसिक पटल पर विभिन्न वस्तुएँ, उपकरण, कारें, घर, भवन, आइसक्रीम, भोजन, व्यक्ति, पशु-पक्षी, अथवा तो ऐसी अन्य तस्वीरें उभरती रहती हैं। आप किसी प्रकार के विचारों में नहीं उलझ रहे, न ही आप कोई मानसिक संवाद कर रहे हैं, किन्तु ये प्रतिबिंब लगातार आपके मानसिक पटल पर कौंधते रहते हैं। वे आपकी ध्यान करने की क्षमता को गंभीर रूप से बाधित कर देते हैं।

प्रतिबिंब – बहती हवा

किसी भी स्थान में, भले ही वहाँ कोई भी वस्तु न रखी गई हो, तथापि वहाँ वायु तो अवश्यमेव विद्यमान होती है। और, वायु भले ही कितनी भी निष्क्रिय प्रतीत हो, तथापि उसमें गति होती है। अतः, एक तरह से वायु सर्वव्यापी है। केवल निर्वात (रिक्तता) में , संभवतः, यह वस्तुस्थिति न हो। किन्तु, रिक्तता एक कृत्रिम स्थिति है, वह प्राकृतिक अवस्था नहीं है। इसी प्रकार, मन का विचारों, बेचैनी व उदासीनता से रिक्त होने की अवस्था में भी, उसमें स्मृति तो बनी ही रहती है। वस्तुतः, यह आपके विश्लेषणात्मक कौशल व बुद्धिमत्ता का मूल है। आप भौतिक विज्ञान के एक नोबल पुरुस्कार विजेता हो सकते हैं, अथवा तो कैलकुलस के महान ज्ञाता, तथापि,स्मृति के अभाव में, एक अचेत अवस्था में, आप मात्र तीन तक गणना करने में भी असमर्थ हैं। तो क्या यह स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता कि गहन ध्यान के द्वारा, जैसे जैसे आप अपनी मानसिक छापों को मिटाते हुए, नई मानसिक ऊंचाइयों की ओर बढ़ते हैं, तब आपको दिव्य ज्ञान व दिव्य चेतना की प्राप्ति होने लगती है?

कारण

आपकी स्मरण शक्ति ही सभी प्रतिबिंबों का मूल स्रोत है। आप यदि केवल एक बार भी कुछ देखते अथवा सुनते हैं तो वह सदा के लिए आपकी स्मृति में एकत्र हो जाता है। वह भले एक विशाल जलपोत अथवा सागर में डूबती एक छोटी सी सुई हो – दोनों स्मृति में रहते हैं – सदा सर्वदा के लिए। कृत्रिम रूप से एक रिक्त स्थान (निर्वात) बनाने के समान ही, आप ऐसे प्रतिबिंबों को विभिन्न उपायों द्वारा दबा सकते हैं, किन्तु वह अल्पकालिक उपाय है। आपके द्वारा अपने वास्तविक एवं चिरस्थाई स्वरूप का बोध भला किसी कृत्रिम व अल्पकालिक उपाय पर किस प्रकार निर्भर हो सकता है! मेरे विचार में, स्मृति को पूर्णत: मिटाना संभव नहीं। हाँ, उसे इस स्तर तक परिशुद्ध अवश्य किया जा सकता है कि वे बिम्ब जो आपके मानसिक पटल पर कौंधते रहते हों, वे अन्य विचार अथवा भाव के उपजने का माध्यम होने में अक्षम रहें। ऐसा परिमार्जन, भावनात्मक एवं मानसिक परिष्कार द्वारा संभव है। मैं आने वाले समय में इस पर विस्तार से चर्चा करूंगा। जब आप अपने सभी आंतरिक घावों को भरने देते हैं, तभी आप मानस पटल पर उभरते विभिन्न बिंबों से स्वयं को अप्रभावित रख पाते हैं।

समाधान

तो, यदि आप किसी आंधीपूर्ण स्थिति में फंस जाएँ, ऐसे में आप क्या करेंगे? आप संघर्ष द्वारा अथवा विपरीत जा कर उसे परास्त नहीं कर सकते। आप केवल यह कर सकते हैं कि स्वयं को ढाँक लें, उस हवा का सामना न कर, बस उसे स्वीकार मात्र कर लें। बिल्कुल इसी प्रकार से, उन कौंधते बिंबों के विरुद्ध प्रतिक्रिया करने की कोई आवश्यकता नहीं। आप केवल सतर्कता व विश्रांति, प्रयास व प्रशमन के संतुलन द्वारा स्वयं को ढक लें। शीघ्र ही प्रतिबिम्ब स्वतः मिटने लगेंगे। जैसे जैसे आप ध्यान में दृढ़ता बनाए रख कर आगे बढ़ते हैं, व सतर्कतापूर्वक अपने ध्यान की वस्तु पर ही पुनः पुनः केन्द्रित होते रहते हैं, अन्य बिम्ब स्वतः ही हल्के हो कर मिटने लगते हैं। और, जैसे जैसे आप अपने मानसिक छाप परिशुद्ध करते चलते हैं, वैसे वैसे आप अशांत करने वाली, लुभावनी, अथवा उत्सुकता भरी आकृतियों को कम, और कम देखते हैं। उनका प्रभाव नगण्य, व उनकी पुनः स्मृति हल्की होने लगती है। तत्पश्चात, आप ध्यान मार्ग पर एक सुबोधगम्य अनुभव के अधिकारी हो जाते हैं।

इसी के साथ “मानसिक परिवर्तन” पर मेरे विभिन्न निबंधों का यहाँ समापन होता है। आगे आप सब के लिए एक पूर्णत: नवीन – एक मौलिक रचना – का शुभारंभ होगा। वह है –“भावनात्मक रूपान्तरण”।

मेरे अपने इष्ट – मेरे प्रथम गुरु – के प्रति प्रणाम व कृतज्ञभाव, जिनकी कृपा से यह उद्गार संप्रेषित हो पाये।

शांति।
स्वामी