“मुझे प्रबोधन की प्राप्ति कैसे हो?” किसी ने मुझसे एक दिन पूछा। “क्या आप मुझे कुछ गहन अनुभव नहीं प्रदान कर सकते? मैं अपने जीवन में आमूल परिवर्तन चाहता हूँ।”

मुझसे बहुत से उत्साही जिज्ञासु बहुधा इस प्रकार के प्रश्न करते हैं। वे किसी राम-बाण की खोज में हैं, कोई रहस्मय सत्य जो उनकी सारी समस्याओं का समाधान कर देगा (आध्यात्मिक व सांसारिक)। जबकि कई व्यक्ति सततः व्यक्तिगत प्रयास का महत्त्व समझते हैं, अधिकतर व्यक्ति तुरंत समाधान की खोज में हैं। प्रस्तुत है आद्य शक्ति द्वारा रचित एक उद्धरण जो मेरे विचारों को प्रतिबिंबित करता है।

अधिकतर जिज्ञासु अपनी मुक्ति का सम्पूर्ण दायित्व स्वयं नहीं लेते, परंतु वे किसी विशाल अनंत्य आध्यात्मिक अनुभव की प्रतीक्षा करते रहते हैं जो उन्हें संपूर्णतः वहाँ पहुँचा दे। मुक्त कर देने वाले इसी अंतिम अनुभव की खोज ही अनियंत्रित आध्यात्मिक उपभोक्तावाद को जन्म देती है जिसमें साधक एक गुरू से दूसरे गुरू तक भटकता रहता है, प्रबोधन की खोज में, जैसे कि वह मिठाई की दुकान से मिठाईयाँ खरीद रहा हो। यही आध्यात्मिक व्यभिचार ही बड़ी शीघ्रता से प्रबोधन की खोज को एक विशेष अनुभव की खोज में परिवर्तित कर रहा है। हालांकि बहुत लोगों को वास्तविकता में बड़े प्रबल अनुभव हुए हैं अधिकतर स्थितियों में यह व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा प्रगाढ़ रूपांतरण लेकर नहीं आता जो कि प्रबोधन की अभिव्यक्ति है।

प्रबोधन के विषय में एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि वह एकदम से होगा। ऐसा नहीं है। इसे अर्जित करना पड़ता है तथा जीवन में अमल करना पड़ता है। कभी-कभी मुझे साधकों को यह समझाने में बड़ी कठिनाई होती है कि सच्चा प्रबोधन कोई अचानक से हो जाने वाला विशेष क्षण नहीं है। यह जीवन भर के अनुभवों और साधनाओं की पराकाष्ठा है जिसके परिणामस्वरूप महान अंतर्दृष्टि का उदय होता है। मैं उन्हें इस सोच के लिए दोषी नहीं मानता कि किसी गुरू के जादुई स्पर्श से या संभवत: किसी आकाशीय विद्युत के प्रहार से उन्हें प्रबोधन की प्राप्ति होगी। शायद इसलिए भी कि कईं आध्यात्मिक पुस्तकों में इस प्रकार के संस्मरण प्रचुरता में हैं। यहाँ तक कि मैंने भी अपने संस्मरण में कुछ इसी प्रकार से परिभाषित आध्यात्मिक अनुभवों को साझा करके अनजाने में यही इंगित कर दिया हो। इसी प्रकार बोधि वृक्ष के तले बुद्ध के प्रबोधन को भी असाधारण महत्व की एकाकी घटना के रूप में दर्शाया जाता है। ऐसा बिल्कुल भी न था।

ऐसे अनुभव को समझने और उस पर प्रकाश डालते समय हम उस प्रयास को अनदेखा कर देते हैं जो उस अवस्था तक पहुँचने में लगा। एक क्षण के लिए प्रबोधन को नोबेल पुरस्कार जीतने के समान मान कर चलिए। हम मात्र अन्य नोबेल विजेताओं से भेंट करके इस पुरस्कार को जीत नहीं सकते और यह हमें निश्चित ही इसलिए नहीं दिया जायेगा क्योंकि हम इसके इच्छुक हैं। किसी उद्देश्य के प्रति आजीवन समर्पण के पश्चात या किसी असाधारण कार्य की उत्पत्ति करके, और यह मान कर कि सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हों, हो सकता है कि समिति आपके नामांकन के विषय में सोचे और प्रदान कर दे। इसमें कोई शंका नहीं कि नोबेल पुरस्कार जीतने से आपके जीवन और जीवनशैली में एक स्तर तक बदलाव आएगा। आप और भी कई लोगों को प्रेरित करेंगे। परंतु इससे अधिक कुछ भी न होगा। यह आपके संबंधों में सुधार नहीं लाने वाला, यह आपकी शारीरिक बीमारियों इत्यादि को भी ठीक नहीं करने वाला। ये चुनौतियाँ तो रहेंगी ही।

किसी तैयारी या तत्परता के बिना कोई भी आध्यात्मिक अनुभव शायद ही रूपांतरण ले आए। और यदि कोई अनुभव आपमें किसी प्रकार के स्थाई रूपांतरण को प्रेरित नहीं करता, चाहे वह रूपांतरण कितना ही नगण्य क्यों न हो, तो अंततः इस अनुभव का महत्व कुछ भी नहीं रह जाता। जब आप पथ पर तत्परतापूर्वक दृढ़ता से चलते रहते हैं तो जीवन के कई अनुभव, सीख, पाठ, आपको अपना जीवन भिन्न प्रकार से जीने की बुद्धिमत्ता देते हैं। इस प्रकार से भिन्न कि परमानंद की स्थिति को बनाए रखना और भी सुगम हो जाता है। किंतु याद रहे कि ऐसा नहीं कि यदि आपको बोध की प्राप्ति हो गयी है तो आप दर्द का अनुभव नहीं करेंगे या फिर आपके जीवन में जो कुछ भी हो रहा है उसमें आप सदैव आनंदित ही होंगे।

भारत के प्रख्यात कार्टूनिस्ट आर.के.लक्ष्मण (१९२१-२०१५) ने अपने यात्रावृत द डिस्टोर्टेड मिरर में एक अनुच्छेद लिखा है।

लोग मेरे व्यवसाय को लेकर उत्सुक रहते हैं और हर प्रकार के प्रश्न पूछकर अपना संदेह दूर करने का प्रयास करते हैं। हाल ही में एक महिला ने मुझसे पूछा “क्या आप अपने कार्टून का चित्रांकन स्वयं करते हैं?”। मैंने उत्तर दिया, “हाँ मैं स्वयं करता हूँ।” फिर उन्होंने पूछा, “और कार्टून के शब्द? क्या आप उन्हें भी स्वयं ही लिखते हैं?”। “निस्संदेह” मैंने कहा। “और कार्टून की कल्पना? अब यह मत कहियेगा कि वह भी आप स्वयं ही सोचते हैं?”

एक प्रश्न है जो कम ही पूछा जाता है परंतु वह मुझे गहरे आत्म परीक्षण में ले जाता है। वह है “जब आप चारों ओर देखते हैं, तो क्या आपको सभी कुछ हास्यजनक लगता है?”

अन्य व्यक्तियों को जो चिंताएं सताती हैं उनकी पहुँच से परे एक कार्टूनिस्ट किसी निरंतर आमोद-प्रमोद से भरी हुई मोहक दुनिया में नहीं रहता। प्याज की बदलती कीमतें मुझे भी उतना ही प्रभावित करती हैं जितना कि एक अध्यापक को प्रसन्न या उदास करती हैं। इसी प्रकार कर से मुझे निराशा होती है। माइक पर उबाने वाले व्यक्ति और ट्रैफिक जाम मुझे पागल कर देते हैं। निश्चित ही एक चिकित्सक जीवन को सदैव ज़ुकाम, खांसी, एलर्जी या श्वास नली में सूजन के रूप में नहीं देखता। मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि सिनेमा के एक नायक में इतनी तो समझ होगी कि कैमरे के दायरे से बाहर भी जीवन, सुखद दृश्यों, सेक्स, नाच गाने और केचप वाले खून से भरा नहीं होगा। फिर क्यों एक कार्टूनिस्ट को अपने चारों ओर जीवित हास्यचित्र देखने चाहिए और अपने चारों ओर मन बहलाने वाले वार्तालाप सुनने चाहिए? तो मैं स्वयं को इस आत्मावबोधन से दिलासा दिलाता हूँ कि जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण उतना ही साधारण है जितना कि पास में खड़े हुए व्यक्ति का जो कि, चीनी और मिट्टी के तेल की कतार में खड़ा है।

प्रबोधन भी कुछ ऐसा ही है। इसका यह अर्थ नहीं कि आप कभी भी पीड़ित नहीं होंगे या अपने चारों ओर होने वाली हर घटना से सदैव अप्रभावित रहेंगे। वह सभी कुछ जो हमारे कर्मों, जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण व अभिवृत्ति पर आधारित है, हमें उस का अनुभव करना ही होगा। आपमें जो एकमात्र परिवर्तन आता है वह यह कि आप आध्यात्मिक रूप से और उन्नत हो जाते हैं, आप और भी लचनशील व दयालु हो जाते हैं। जीवन आपको किस प्रकार की कठिनाई देता है वह नहीं बदलता किंतु आप उसका कैसे सामना करते हैं या उससे कैसे बचते हैं यह बदल जाता है। जब यह सब उत्कृष्टता की सीमा तक बढ़ जाता है तो, आप एक तरह से स्वतंत्र हो जाते हैं, अत्यंत स्वतंत्र। यह संसार आपके विषय में क्या सोच रहा है वह आपको किस प्रकार देख रहा है इन सबसे कम चिंतित। दूसरे शब्दों में आप अपने ही कार्टून का चित्रण करते हैं अपने ही शीर्षक लिखते हैं और दूसरों की कल्पना और विश्वास से परे स्वयं की विचारधारा भी लेकर आते हैं।

जैसा कि प्रसिद्ध ज़ेन वाक्य है, “प्रबोधन के पूर्व लकड़ी काटो, पानी ले आओ। प्रबोधन के पश्चात लकड़ी काटो, पानी ले आओ।”

“जीवन मुक्त” अथवा एक प्रबुद्ध व्यक्ति होने का यह अर्थ नहीं कि आप अपने कर्त्तव्यों से मुक्त हो जाते हैं। जैसा कि एकनाथ ईश्वरन ने कहा है प्रबोधन किसी के द्वारा अपने जीवन में किये गये अच्छे कर्मों का पुरस्कार नहीं है। यह मात्र किसी का जीवन के प्रति दृष्टिकोण है जो कि व्यवहारिक समझ से अर्जित किया जाता है। यदि आप प्रबोधन का अभिप्राय समझना चाहते हैं तो इसे जीवन जीने की एक विधि के रूप में देखें। सदाचरण की प्रतिबद्धता, अपना जीवन एक ढंग से जीने का संकल्प और अपने जीवन को उस प्रकार जीना जो आपको शोभा दे।

मुक्ति का तात्पर्य एवरेस्ट पर्वत के शिखर पर यशस्वी झंडा गाड़ना नहीं है वरन यह परिश्रम एवं सावधानी से की गयी वह यात्रा है जो कई दुर्गम पदयात्राओं से होते हुए जाती है, रास्ते में पड़ाव डालते रुकते हुए, सहयात्री से मिलते जुलते हुए, दम भरने वाले सुंदर दृश्यों में तल्लीन होते हुए, चुनौतियों का आभारी होकर, आप जहाँ हैं वहाँ आनंद मनाते हुए। पूरी यात्रा में आप अपने भीतर केंद्रित किंतु लक्ष्य हेतु प्रतिबद्ध रहते हैं।

जब आपको यह बोध हो जाता है तो आपका जीवन सुख व कल्याण से घिर जाता है। आप समझ जाते हैं कि यहाँ कोई भी क्षण अंधकारमय नहीं है तथा आप तो पहले से ही प्रबुद्ध हैं। इसे अनुभव करने हेतु आपको मात्र एक विशेष प्रकार से जीवन जीना है। फिर आप अपनी इस खोज पर हँसते हैं कि व्यर्थ ही आप जीवन को इतनी गंभीरता से देख रहे थे। जैसा कि थिच नाट हान ने कहा है –

जब मैं सोचता हूँ कि कैसे मैं स्वर्गिक आनंद को जन्म मरण के क्षेत्र से बाहर समझता था तो मुझे हँसी आती है। जन्म एवं मृत्यु के संसार में ही रहस्यमयी सत्य का प्राकट्य होता है। परंतु यह हँसी ऐसे व्यक्ति की हँसी नहीं जिसे अचानक से कोई निधि मिल गयी हो, न ही यह उस व्यक्ति की हँसी है जिसने कुछ जीत लिया हो। वास्तव में यह उस व्यक्ति की हँसी है, जिसने किसी वस्तु को बड़े कष्ट झेलते हुए बड़े समय तक ढूँढ़ा और एक सुबह उसे वह वस्तु अपने कोट की जेब में ही मिल गयी।

एक धार्मिक व्यक्ति ने अपने नये घर के लिए आशीष प्राप्त करने हेतु एक भिक्षुक को आमंत्रित किया। भिक्षुक ने नम्रतापूर्वक यह कहते हुए मना कर दिया कि वे व्यस्त हैं।
“परंतु, आप क्या कर रहे हैं?” व्यक्ति ने आग्रहपूर्वक पूछा।
“कुछ भी नहीं।”
यह सोचकर कि संभवत: उस दिन भिक्षुक का मन नहीं होगा वह चला गया और पुनः दूसरे दिन फोन किया “क्या आप आज मेरे घर को आशीर्वाद देने आ सकते हैं?”
“क्षमा करें,” भिक्षुक ने कहा, “मैं व्यस्त हूँ।”
“और आप क्या कर रहे हैं?”
“मैं कुछ भी नहीं कर रहा” भिक्षुक ने उत्तर दिया।
“किंतु कल भी आप यही कर रहे थे” व्यक्ति ने कहा।
“बिल्कुल,” भिक्षुक ने उत्तर दिया। “मेरा कार्य अभी पूरा नहीं हुआ।”

प्रबोधन भी एक चलते रहने वाली प्रक्रिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ परिवर्तनकारी क्षण होंगे जो आपमें एक स्थायी बदलाव ले आएं। किंतु उस परिवर्तन के साथ जीवन के हर क्षण को जीने हेतु सावधानी, सजगता इत्यादि की आवश्यकता है। यही प्रबोधन है।

यही सब कुछ है। यह जीवन। अति सुंदर। इसे जियें। इसे प्रेम करें। स्वयं के लिए, दूसरों के लिए इसे हँस कर जियें। यही सब कुछ जानने योग्य है। अन्य सब कुछ के बिना भी जीवन चल सकता है।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Enlightenment